बढ़ती अर्थव्यवस्था के बूते भारत में हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल (एचएनआई) की संख्या और साथ ही साथ उनके निवेश में अच्छा खासा इजाफा हुआ है। किसी आम निवेशक की तरह एचएनआई भी रियल इस्टेट, शेयर, कमोडिटी, आर्ट, मुद्राएं एवं म्यूचुअल फंड आदि में निवेश करते हैं। हांलाकि उनको तुलनात्मक रूप से अधिक प्रतिफल मिल भी सकता है और नहीं भी पर वो बेहतर सेवाएं और बेहतर सूचनाओं की प्राप्ति जरूर पाते हैं। जैसे की यदि आप किसी बैंक के एचएनआई कस्टमर हैं तो मुमकिन है कि आपको बैंक जाने की जरूरत ही न पड़े। बैंक अधिकारी आपके घर आकर आपका काम करेंगे और यदि आप बैंक गए भी तो आपके लिए एक एक्सक्लूसिव कमरा होगा और आपके लिए एक तय रिलेशनशिप अफसर होगा।

एचएनआई यूं तो संख्या में कम होते हैं  पर उनका निवेश भारी भरकम होता है। यह वित्तीय संस्थानों को (जहां एचएनआई निवेश करना चाहते हैं) काफी आकर्षित करता है। दरअसल वित्तीय संस्थानों के लिए कम व्यक्तियों द्वारा दिए गए बड़े धन की तुलना में अधिक व्यक्तियों द्वारा दिए गए कम धन का परिचालन करना अधिक फलदायी होता है। यही वजह है कि संस्थाएं अपने  एचएनआई ग्राहकों को विशेष सुविधाएं और यहां तक कि विभिन्न कांसिआर्ज सेवाएं भी उपलब्ध कराती हैं। इन सेवाओं में मूवी टिकट, हेल्थ चेकअप, इनफॉरमेशन सर्विसेज, डिस्काउंट ऑफर आदि शामिल हैं। हैदराबाद स्थित एसबीआई का करोड़पति  ब्रांच तो अपने ग्राहकों को एयरपोर्ट पिकअप से लेकर गेस्टहाउस में रुकवाने जैसी सुविधा तक देता है। खैर यदि आप किसी म्यूचुअल फंड के एचएनआई ग्राहक हैं तो आपको इन सारी सेवाओं से महरूम रहना पड़ सकता है।

यूटीआई म्यूचुअल फंड के रीजनल हेड, (उत्तर-पर्व) संदीप नौटियाल बताते हैं कि अन्य वित्तीय संस्थानों की तरह म्यूचुअल फंड कंपनियों को भी अपने क्लाइंट पोर्टफोलियो में अधिक से अधिक एचएनआई ग्राहकों को रखना पसंद है। उनके मुताबिक एमएफ कंपनियां इन ग्राहकों को बैंकों की तर्ज पर विशेष सेवाएं नहीं पहुंचा सकती है। उनके मुताबिक एमएफ कंपनियों को ऐसा करने के लिए पर्याप्त रूम नहीं है। बैंक ग्राहकों से 4.0 फीसदी पर डिपोजिट लेते हैं और 12.0 से 14.0 फीसदी पर आम ग्राहकों को कर्ज देते हैं। उनके अनुसार बैंक इसी स्प्रेड में से, जो कि काफी होता है, सेवाएं उपलब्ध कराती है। दूसरी तरफ म्यूचुअल फंड में ग्राहक का तकरबीन पूरा का पूरा धन स्कीम के उद्देश्य के अनुसार निवेश कर दिया जाता है। एमएफ का ध्येय यही रहता है कि ग्राहक को अधिक से अधिक कमाई कराई जाए। कंपनियां इसके एवज में कुछ परिचालन शुल्क लेती हैं। हां, आम ग्राहकों की तुलना में फंड कंपनियां अपने एचएनआई ग्राहकों को इस शुल्क में थोड़ी छूट जरूर देती हैं। यही छूट एचएनआई ग्राहकों को बेहतर प्रतिफल प्रदान कर देती है।

म्यूचुअल फंड में एचएनआई

भारतीय म्यूचुअल फंड जगत के इक्विटी स्कीमों की श्रणी में एचएनआई (जैसा एम्फी ने बताया है) की होल्डिंग आज बढक़र 20 फीसदी तक हो चुकी है जबकि इन ग्राहकों की संख्या (फोलियो) 3.7 लाख से भी अधिक की है। यही नहीं इसके अलावा बैलेंस्ड फंड और गोल्ड ईटीएफ में भी एचएनआई की भागीदारी अच्छी खासी है। यूं तो भारतीय म्यूचुअल फंड संगठन, एम्फी ने एचएनआई को परिभाषित नहीं किया है पर गणना के लिए वो 5 लाख रुपय से अधिक का निवेश करने वाले ग्राहक को एचएनआई मानती है।

किसी म्यूचुअल फंड में कोई भी ग्राहक चाहे वो कोई व्यक्ति हो, एचयूएफ हो, कंपनी हो, ट्रस्ट हो और वह इंस्टीट्यूशनल या फिर किसी रिटेल स्कीम में ही निवेश करता है। सामान्य तौर पर एक व्यक्ति दोनों में से किसी भी स्कीम में निवेश कर सकता है। हां जरूरी है कि वो स्कीम के न्यूनतम निवेश जरूरत को पूरा करे। इंस्टीट्यूशनल स्कीम जो खास तौर पर कॉरपोरेट और संस्थानों को आकर्षित करने के लिए डिजाइन की जाती हैं उसमें न्यूनतम निवेश जरूरतें काफी अधिक होती है (5 करोड़ रुपये तक)। वहीं रिटेल स्कीम, जिसमें रिटेल निवेशक निवेश करते हैं उनकी न्यूनतम निवेश जरूरत काफी कम होती है (सामान्यत: 5000 से 10000 रुपये)। मजेदार बात यह है कि तकरीबन सभी फंड हाउस के पास ऐसी इंस्टीट्यूशनल और रिटेल स्कीमें हैं जो एक जैसे ही पोर्टफोलियो में निवेश करती है और तकरीबन एक जैसा ही प्रतिफल लाती है। अब प्रश्न उठता है कि किसी एचएनआई ग्राहक दोनों में किस स्कीम में निवेश करना चाहिए?

कहां हो एचएनआई का निवेश?

विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यदि एक व्यक्ति एचएनआई के तौर पर निवेश करता है तो उसे इंस्टीट्यूशनल प्लान में ही निवेश करना चाहिए। जेआरजी सिक्योरिटीज के फायनेंसियल प्लानिंग हेड, संजीव कुमार के मुताबिक इंस्टीट्यूशनल योजनाओं में प्रबंधन की लागत (एक्सपेंस रेशियो), किसी रिटेल योजना से कम बैठती है। यह मुख्यत: कम अपफ्रंट और फंड हाउस द्वारा वितरक को दिए गए कम कमीशन  के कारण होती है। रिटेल योजनाओं के लिए कमीशन अधिक देना पड़ता है। कुमार के अनुसार, यही वजह है कि कम लागत के कारण ही इंस्टीट्यूशनल प्लान के रिटर्न अधिक होते हैं।

अब न्यूनतम निवेश जरूरत किसी इस्टीट्यूशनल प्लान में 1 करोड़ रुपये से 5 करोड़ रुपये की होती है। यदि कोई इंस्टीट्यूशनल योजना रिटेल की तुलना में 0.2 फीसदी भी बेहतर रिटर्न देती है तो, जो सुनने में अधिक न लगे, तो भी यह अच्छा खासा अंतर पैदा कर सकता है। यह अंतर दरअसल एक बड़ी राशि होगी। उदाहरण के लिए यदि आप एक करोड़ रुपये का निवेश कर रहे हैं किसी रिटेल स्कीम में जो 20 फीसदी का प्रतिफल देती है तो आपका लाभ होगा 20 लाख रुपये। वहीं यदि यह निवेश किसी इंस्टीट्यूशनल स्कीम में हुआ और वो 20.02 फीसदी का रिटर्न दे रही है तो उसका प्रतिफल 20.02 लाख रुपये का होगा। इस प्रकार समान राशि को इंस्टीट्यूशनल स्कीम में लगाए जाने पर उसे 20000 रुपये की अतिरिक्त कमाई होगी।

इधर वित्तीय सलाह फर्म, राइट हराइजन के सीईओ और फाउंडर अनिल रीगो एक और वजह से भी इंस्टीट्यूशनल स्कीम में निवेश करने की सलाह देते हैं। रीगो के मुताबिक यदि एक व्यक्ति एक तय राशि से ऊपर निवेश करता है तो वह खुद-ब-खुद एचएनआई श्रेणी के योग्य हो जाता है। यह समझदारी होगी कि ऐसे व्यक्ति किसी इंस्टीट्यूशनल स्कीम में पैसे लगाएं। इंस्टीट्यूशनल स्कीमों में पैसे लगाकर वो सेवाओं का बेहतर नियंत्रण और बेहतर सूचनाओं की प्राप्ति कर सकते हैं। वो बताते हैं कि एक इंस्टीट्यूशनल निवेशक, कोई प्रोपराइटर, पार्टनरशिप फर्म या कॉरपोरेट बॉडी हो सकती है। जबकि एक इंडिविजुअल या एचयूएफ (हिंदू अविभाजित परिवार) रिटेल निवेशक होता हैं। यहां यह ध्यान में रखना चाहिए कि इंस्टीट्यूशनल निवेशकों के ऊपर लागू होने वाले कर नियम रिटेल निवेशकों के ऊपर लागू होने वाले नियमों से अलग होते हैं। ग्राहक ध्यान रखें कि एचएनआई ग्राहकों को कोई अतिरिक्त कर रियायत नहीं दी जाती है।

यदि आप एक एचएनआई निवेशक हैं

एचएनआई के लिए निवेश योग्यता अधिकांशत: रिटेल निवेशक के जैसी ही होती है। दोनों का लक्ष्य अधिक से अधिक लाभ की प्राप्ति होती है। रीगो के मुताबिक यदि निवेश पर घाटा होता है तो यह एचएनआई ग्राहकों के लिए अधिक खतरनाक होगा क्योंकि उनका निवेश बड़ा होता है। यही वजह है कि निवेश को डाइवर्सिफाई करने की जरूरत और भी ज्यादा हो जाती है। ऐसे निवेशकों को जोखिम प्रबंधन के साधन जैसे सिस्टेमैटिक ट्रांसफर का सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करना चाहिए। किसी भी फंड को लेने के लिए उसकी अवधि जरूर जानें। वो सलाह देते हैं कि यदि किसी एचएनआई को एक साल से कम अवधि के लिए निवेशित रहना है तो लिक्विड फंड का चयन करना चाहिए। लिक्विड फंड वैसे म्यूचुअल फंड स्कीम होती हैं जिनका निवेश मनी मार्केट प्रतिभूतियों में होता है। दूसरी तरफ कुमार की सलाह है कि किसी फंड का चयन करते वक्त जोखिम और रिटर्न के अलावा उस स्कीम का कॉर्पस (साइज) व फंड मैनेजर का प्रदर्शन जरूर देखना चाहिए। जितना अधिक फंड साइज होगा, फंड की स्थिरता भी उतनी अधिक होगी। यदि फंड का साइज छोटा है इसका मतलब है कि फंड कुछ ही निवेशकों पर टिका है। वो सलाह देते हैं कि एक एचएनआई को कम से कम 500 करोड़ रुपये के एसेट का प्रबंधन करने वाली स्कीमों में ही निवेश करना चाहिए।

 

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