इक्विटी और डेट इंस्ट्रूमेंट्स के अलावा फंड मैनेजर किसी फंड के प्रबंधन के लिए डेरिवेटिव्स का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इन इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल निवेश पोर्टफोलियो को हेज करने के लिए किया जाता है। हेजिंग वो तरीका है जिससे जोखिम को कम या समाप्त करने का प्रयास किया जाता है। डेरिवेटिव्स वैसे उत्पाद होते हैं जिनका मूल्य किसी इंस्ट्रूमेंट्स में अंतर्निहित होता है।

इनका होता है इस्तेमाल सबसे ज्यादा इस्तेमाल में लाया जाने वाला डेरिवेटिव्स फ्यूचर्स और ऑप्शंस है।

फ्यूचर्स: एक फ्यूचर्स यानी वायदा सौदा फंड मैनेजर को वो सहूलियत प्रदान करता है कि वो एक प्रतिभूति या इंडेक्स को, किसी निश्चित भाव पर, भविष्य की तिथि में डिलिवरी (प्राप्त करने) के लिए खरीद सा बेच सके।

ऑप्शंस: एक ऑप्शन फंड मैनेजर को वो विकल्प प्रदान करता है कि वो किसी प्रतिभूति या इंडेक्स को पहले से तय किसी भाव पर खरीद या बेच सके।

स्वैप: स्वैप के जरिए फिक्स दरों के डेट को फ्लोटिंग दरों में बदला जा सकता है। इंटेरेस्ट रेट स्वैप का इस्तेमाल ब्याज दर के जोखिम को समाप्त करने के लिए किया जाता है।

निवेशक को जानकारी

डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल फंड मैनजर द्वारा इसलिए भी किया जा सकता है कि वो पोर्टफोलियो को पुन: संतुलित कर सकें या उसकी हेजिंग कर सके। सेबी के नियम साफ बताते हैं कि फंड को अपने ऑफर डॉक्यूमेंट में या फिर एडेनडम (परिशिष्ट) में यह बताना होगा कि वो स्कीम के प्रबंधन के लिए डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल करेगा। साथ ही म्यूचुअल फंड को इन डेरिवेटिव्स के इस्तेमाल, उनके प्रतिफल और स्कीम के जोखिम के बारे में भी समझाना होगा।

 

प्रबंधन से जुड़े नियम

प्रतिभूति नियामक का म्यूचुअल फंड संबंधी नियम एसेट मैनेजमेंट कंपनियों के निवेश नीतियों को सीमित करता है। सेबी (म्यूचुअल फंड) रेगुलेशंस, १९९६ के ये नियम निवेशक के हितों की रक्षा करने के लिए ही लागू किए गए हैं।

सेबी की नीतियां इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि बनाई गई हैं कि:

फंड में आवश्यकतानुसार डाइवर्सिफिकेशन का न्यूनतम स्तर हो।

फंड की संपत्ति का इस्तेमाल किसी और हित को पूरा करने के लिए न हो रहा हो।

सेबी के नियम यह साफ कहते हैं कि म्यूचुअल फंड कर्ज लेकर उस राशि को पोर्टफोलियो की प्रतिभूतियों को खरीदने के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। बुरी स्थितियों में जहां रिडेमप्शन मांग को पूरा करने के लिए राशि की जरूरत होगी और फंड मैनेजर को लगता है कि प्रतिभूतियों को बेचना उचित नहीं होगा वहीं एक म्यूचुअल फंड कर्ज ले सकता है। इस प्रकार के कर्ज की भी सीमा है:

फंड कुल संपत्ति के २० फीसदी से अधिक कर्ज नहीं ले सकता है।

कर्ज की अवधि ६ महीने से अधिक नहीं हो सकती है।

इस कर्ज को केवल तरलता की जरूरतों को पूरा करने के लिए (लाभांश या रिडम्पशन के भुगतान की खातिर) ही लिया जा सकता है।

वैसे फंड जो निवेश के लिए कर्ज लेते हैं उन्हें हेज फंड्स कहा जाता है। भारत में इस प्रकार के कर्ज को प्रोत्साहित इसलिए नहीं किया जाता, क्योंकि यह निवेशकों के जोखिम को बढ़ा देता है। जब किसी पोर्टफोलियो का मूल्य उस कर्ज को जिसे अभी चुकाया नहीं जा सका है, से भी कम हो जाता है तो फंड के दिवालिया होने का जोखिम बढ़ जाता है। इन स्थितियों में फंड के नेट एसेट वैल्यू (एनएवी) के नीचे जाने का भी खतरा बना रहता है।

अब कुछ सवाल।

क्या फंड उन प्रतिभूतियों में निवेश कर सकता है और यदि कर सकता है तो कितना? एक म्यूचुअल फंड किसी एक प्रतिभूति में अधिकतम कितना निवेश कर सकता है? एक म्यूचुअल फंड स्कीम में कम से कम कितने निवेशक होने चाहिए? क्या किसी निवेशक के स्कीम में कुल हिस्सेदारी की भी कोई सीमा है? म्यूचुअल फंड के अगले अंक में हम फंड के प्रबंधन के इन्हीं नियमों पर चर्चा करेंगे। आपको सुनने में यह आश्चर्यजनक लगे पर म्यूचुअल फंड किसी एक स्कीम के निवेश को वहां से निकाल कर दूसरे स्कीम में भी लगा सकते हैं ।

 

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