• जिला मजिस्ट्रेटों को डिफाल्टर ऋणधारक की गिरवी रखी
  • प्रावधान की प्रकृति ‘अनिवार्य’ नहीं बल्कि ‘निर्देशात्मक’ है
  • सरकारी अधिकारियों के स्तर पर हुई देरी का नुकसान बैंकों को नहीं उठाने दिया जा सकता

नई दिल्ली। बैंकों और वित्तीय संस्थानों को राहत देते हुए उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि जिला मजिस्ट्रेटों को डिफाल्टर ऋणधारक की गिरवी रखी परिसंपत्तियां कुर्क करने का अधिकार देने वाले सरफेसी कानून के प्रावधान की प्रकृति ‘अनिवार्य’ नहीं बल्कि ‘निर्देशात्मक’ है। न्यायालय ने कहा कि सरकारी अधिकारियों के स्तर पर हुई देरी का नुकसान बैंकों को नहीं उठाने दिया जा सकता।

उल्लेखनीय है कि वित्तीय परिसंपत्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन एवं प्रतिभूति हितों का प्रवर्तन (सरफेसी) कानून की धारा-14 जिला मजिस्ट्रेट को किसी ऋणधारक के चूक करने पर गिरवी रखी गयी परिसंपत्ति को कुर्क कर 30 दिन के भीतर संबंधित बैंक या वित्तीय संस्थान को देनी होती है। इस अवधि को लिखित कारण देने के बाद 60 दिन तक बढ़ाया जा सकता है।

शीर्ष अदालत के समक्ष इस प्रावधान की प्रवृत्ति अनिवार्य होने या निर्देशात्मक होने का सवाल आया था। साथ ही उसे इस बात पर भी फैसला लेना था कि यदि जिला मजिस्ट्रेट 60 दिन के भीतर भी ऋणधारक की रेहन रखी संपत्ति कुर्क कर बैंक या वित्तीय संस्थान को सौंपने में विफल रहता है तो क्या इसका खामियाजा बैंकों और वित्तीय संस्थानों को भुगतना होगा।

न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव, हेमंत गुप्ता और अजय रस्तोगी की पीठ ने इस मामले में केरल उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए इन प्रावधानों को ‘निर्देशात्मक’ प्रकृति का बताया।

केरल उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि यदि इस प्रावधान को निर्देशात्मक के बजाय अनिवार्य कर दिया तो इसका कर्ज देने वाली संस्था पर विपरीत प्रभाव होगा। साथ ही यह परिसंपत्ति पर कब्जा करने की प्रक्रिया मे भी देरी करेगा।

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