जब कभी शेयर बाजार (Share Market) में मंदी का दौर शुरू होता है, निवेश के लिए मन ललचाने लगता है। शेयर बाजार (Stock Market) को लेकर भय और लालच की यह मन:स्थिति बहुत हद तक रिटेल निवेशकों तक सीमित है।

म्यूचुअल फंड (Mutual Fund) के फंड मैनेजर्स (Fund Manager), एचएनआई  के पोर्टफोलियो (NHI portfolio) मैनेजर्स और विदेशी संस्थागत निवेशकों के वेल्थ मैनेजर्स इस तरह की मनोदशा से मुक्त होते हैं। इसके पीछे दो प्रमुख वजहें हैं- निवेश की रकम उनकी अपनी नहीं होती है, इसलिए निवेश राशि से उनका जज्बात नहीं जुड़ा होता है। साथ ही, निवेश का निर्णय लेने की प्रक्रिया वैयक्तिक नहीं बल्कि सामूहिक होती है।

इस प्रक्रिया में विश£ेषकों की टीम के साथ-साथ मशीन भी शरीक होते हैं। एक उदाहरण लीजिए। यदि किसी एफआईआई (FII) के वेल्थ मैनेजर (wealth Manager) ने तय कर लिया कि जिस देश का औद्योगिक उत्पादन दर पांच फीसदी से कम, जीडीपी (GDP) छह फीसदी से कम और करेंसी डॉलर (Dollar) के मुकाबले लगातार तीन महीने डिपे्रसिएट करे, वहां के शेयर बाजार (Share Market) में पैसा नहीं लगाना है और निवेश की राशि को बाजार से निकाल लेना है।

यदि ये तीनों शर्तें एक साथ पूरी हो रही हों तो वह वेल्थ मैनेजर (wealth Manager) बिना हिचकिचाए सेल आर्डर दे देगा। उसका एल्गोरिदमिक ट्रेङ्क्षडग मशीन उसके निर्णय को पलक झपकते एक्जीक्यूट भी कर देगा। संभव है इस प्रक्रिया में उसे नेट लॉस हो पर उसका यह निर्णय भावनात्मक नहीं बल्कि पूर्व निर्धारित सूचकांकों के आधार पर होगा। स्टॉप लॉस लेवल को नीचे की ओर खिसकाते जाना, बिना टार्गेट प्राइस सेट किए हुए ट्रेडिंग करना, शेयर की कीमत में भारी गिरावट को खरीद का आधार बनाना और बेवजह एवरेजिंग में जुटे रहना निवेश के मामले में भावना के हावी होने के सूचक हैं।

इन दिनों बैंकिंग के शेयर (Banking share) सही कीमत पर मिल रहे हैं। कई बैंकों के फंडामेंटल काफी अच्छे हैं। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमत में गिरावट और पेट्रोल की कीमत (petrol price) में भारी बढ़ोतरी से तेल विपणन कंपनियों की स्थिति भी मजबूत होती दिख रही है।

टेलीकॉम कंपनियों (telecom companies) के वैलुएशन भी आकर्षक हैं। कोल इंडिया (coll India) और आईएफसीआई (IFCI) भी आपको अपनी ओर खींच रहे होंगे। यदि आप अच्छे शेयर छांटने में कामयाब रहे तो आने वाले एक साल में आप पच्चीस फीसदी तक के रिटर्न की उम्मीद तो कर ही सकते हैं।

शर्त यह कि आप पूरी जानकारी के बाद ही शेयर (Share) चुनें और निवेश (Invest) की निरंतर निगरानी करें। यदि आपने पच्चीस फीसदी का टार्गेट सेट किया है तो टार्गेट पूरा होने के बाद प्रॉफिट (Profit) जरूर बुक कीजिए। यदि आप निवेशक नहीं बल्कि ट्रेडर हैं तो अपने तकनीकी विश्लेषकों की राय जरूर मानिए।

बिना तकनीकी विशलेषण के ट्रेडिंग (trading) करना आग से खेलने के समान है। कोई भी तकनीकी विश£ेषक हमेशा सही नहीं होता है। इसलिए दस अलग अलग लोगों से परामर्श करने की जगह एक कुशल विश£ेषक की राय पर यकीन करें। आम तौर से वे ब्रोकिंग हाउस (Broking house) जिनके अपने म्यूचअल फंड (Mutual fund) एएमसी भी हैं, विश्लेषकों की पूरी टीम रखते हैं। ऐसे ब्रोकिंग हाउस के विश्लेषकों के परामर्श को आधार बनाया जा सकता है। आप ऐसी उम्मीद न करें ये आपके लिए फ्रंट रनिंग जैसा अपराध कर डालेंगे, पर जिस विश£ेषण के आधार पर वे स्वयं निर्णय लेने जा रहे हैं उसकी जानकारी होने से आप बेहद लाभान्वित होंगे। ब्रोकर छांटते वक्त केवल ब्रोकिंग की दर को न देखें बल्कि उसकी रिसर्च एक्सपर्टीज को भी परखें।

 

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