काले धन पर लगाम लगाने के लिए पांच सौ और हजार के नोटों को वापस लेने का फैसला अचानक नहीं हुआ है. सरकार इसकी तैयारी पिछले छह महीने से कर रही थी. हालांकि इसकी भनक किसी को नहीं थी। बताया जाता है कि सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से काफी पहले ही कह दिया था कि वह 50 और 100 रुपए के नोट ज्यादा से ज्यादा तादाद में छापे।

उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक इस योजना की जानकारी सिर्फ चार लोगों को ही थी. पहले- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दूसरे- वित्त मंत्री अरुण जेटली और सरकार व आरबीआई के एक-एक अफसर. इनके अलावा किसी को भी, यहां तक कि काले धन की जांच कर रही एसआईटी (विशेष जांच दल) के अध्यक्ष जस्टिस एमबी शाह को भी इस योजना का जरा भी अंदाजा नहीं था। एक प्रमुख समाचार पत्र से बातचीत में जस्टिस शाह कहते हैं, ‘हमें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि ऐसा कुछ होने वाला है। लेकिन जो भी हो, यह बेहद साहसिक और अच्छा कदम है। मुझे खुशी है कि इससे काले धन को चलन से पूरी तरह बाहर करने का अत्यंत जटिल काम एक ही झटके में हो गया है।’

शाह के मुताबिक जिन लोगों ने घर पर ही नकदी की शक्ल में काला धन जमा कर रखा है, वे न तो उसे जमा कराने के लिए और न ही उसे छोटे नोटों में तब्दील कराने के लिए बैंकों का रुख करेंगे। वे कहते हैं, ‘इस तरह सरकार का यह एक ही कदम इस मामले में काफी लंबी दूरी नापने वाला है। एसआईटी इससे 100 फीसदी संतुष्ट है।’

नरेंद्र मोदी सरकार ने केन्द्र की सत्ता संभालते ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक 2014 में ही जस्टिस शाह की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन कर दिया था। उसके बाद से अब तक एसआईटी सुप्रीम कोर्ट को कई रिपोर्टें सौंप चुकी है। इस बारे में जस्टिस शाह बताते हैं, ‘हमने कई अनुशंसाएं की हैं. इनमें से एक यह है कि लोगों के लिए घरों में नकदी रखने की सीमा 10-15 लाख तक सीमित होनी चाहिए। चुनावों में कालेधन का इस्तेमाल रोका जाना चाहिए.’

एक अनुमान के मुताबिक, देश में इस वक्त करीब 17 लाख करोड़ रुपए के नोट चलन में हैं। इनमें 500 और 1,000 के नोटों की कुल कीमत 13.6 लाख करोड़ के आसपास है। यानी करीब 80 फीसदी मुद्रा इन्हीं बड़े नोटों की शक्ल में बाजार में चल रही है। इसे वापस लेना सरकार और बैंकों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण साबित होने वाला है।

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