…और जब एक बेसहारा ने पौधों को बना लिया अपने जीने का सहारा !

Preety tyagi: The extraordinary story of a simple woman from Meerut!

बात एक पुरानी फिल्म के गीत की दो लाइनों से शुरू करते हैं,

तुम बेसहारा हो तो किसी का सहारा बनो, तुमको अपने आप ही सहारा मिल जाएगा।।


अनुरोध फिल्म की गीत की ये लाइनें अपने आप में बड़ा मतलब समेटे हुए हैं। इस गीत की लाइनों को सार्थक किया मेरठ की महिला प्रीति त्यागी ने। जब वह अपने जीवन के झंझावतों से अकेले जूझ रही थी, ऐसे में उसने पेड़ पौधों में अपना जीवन तलाशने की कोशिश की और इन्हीं पेड़ पौधों ने प्रीति को जीवन के उतार चढ़ावों और कठिन से कठिन घड़ी में संबल प्रदान किया। चलिए खुलासा डॉट इन में हम आज इन्हीं प्रीति त्यागी की जबानी जानते हैं कि कैसे पेड़ पौधे उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गए और ये पौधे कैसे आज भी उनके जीवन में आने वाली तकलीफों में उनके साथ खड़े हुए।

मेरा जन्म मेरठ के ही एक गांव माछरा में हुआ। पिता खेतिहर किसान थे और मां घर के साथ साथ गांव की प्रधानी का काम भी देखती थीं। न जाने क्यों बचपन से ही मुझे पेड़ पौधों से बहुत लगाव था। मैं जब भी अपने पिता के साथ खेतों पर जाती तो अक्सर घंटों अपलक उन बड़े बड़े वृक्षों को बैठे देखती रहती। कई बार तो पिता भी मेरी इस हरकत पर खूब हंसते। किसी को क्या पता था कि यही पेड़ पौधे मेरे आने वाले जीवन में मेरे सबसे बड़े साथी होने वाले हैं।

मेरी प्रारंभिक शिक्षा मारछा में ही हुई। इसके बाद स्नातक की पढ़ाई मेरठ से की। उसी दौरान मेरी मुलाकात मेरठ के ही एक लड़के से हुई। मेरी उम्र उस समय सिर्फ 18 साल थी। हम दोनों ने लव मैरिज कर ली। शुरुआती दौर में सब ठीक ठाक चला लेकिन किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था। अचानक मेरी खुशनुमा जिंदगी को जैसे किसी की नजर लग गई। मेरे पति को किसी कारणवश जेल हो गई। 2007 में जब मेरे पति को जेल हुई तब तक मेरे तीन बच्चे हो चुके थे।

Preety tyagi: The extraordinary story of a simple woman from Meerut!
प्रीति त्यागी अपने हाथ में छोटा सा पौधा लिए हुए।

पति के जेल चले जाने के बाद तो जैसे मेरे ऊपर अचानक मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा। चूंकि मेरे विवाह से मेरे परिवार वाले नाखुश थे और ससुराल से भी मदद की कोई खास उम्मीद नहीं थी, ऐसे में मेरे जीवन का एक एक दिन पहाड़ की तरह कटने लगा। शुरुआत में मैंने एक स्कूल में तीन हजार रुपए महीने पर पढ़ाना शुरू किया, लेकिन मरे बच्चे बड़े हो रहे थे और उनकी पढ़ाई लिखाई के लिए मुझे ज्यादा पैसों की जरूरत थी। कुछ रिश्तेदारों ने मदद की लेकिन वो नाकाफी थी। इसीलिए मैंने स्कूल की नौकरी छोड़कर एक कंपनी में नौकरी ज्वाइन की।

जहां भी नौकरी शुरू करती तो शुरू शुरू में तो बॉस का रवैया ठीक रहता लेकिन जैसे जैसे उन्हें पता चलता कि महिला अकेली है, वे किसी न किसी तरह फायदा उठाने की कोशिश करते, इस चक्कर में मैंने कई नौकरियां बदलीं। अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ अकेली रहती इसलिए किसी से यह सब कहने की हिम्मत भी न जुटा पाती, क्योंकि हमारे समाज में सब अकेली औरत को ही दोष देते हैं। मैं अपने जीवन से करीब करीब हताश हो चुकी थी।

कभी कभी अपने किए हुए पर पछतावा होता। मुझे लगता कि शायद मैंने घरवालों की मर्जी के खिलाफ प्रेमविवाह करके गलती की। सब कोई मुझसे नाराज थे चाहें वो मेरे परिवार वाले हों, रिश्तेदार हो या मेरे ससुराल वाले। मुझे हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा नजर आता।

अपने इस हताशा और निराशा के दौर में मैं कई बार पार्कों में अकेली जा कर बैठ जाती और मन ही मन बड़े बड़े वृक्षों से बात करती, ये बड़े बड़े वृक्ष मुझे बड़ी दिलासा देते। उन्हें देखकर मुझे लगता कि कैसे ये वृक्ष, गर्मी, सर्दी और पतझड़ बर्दाश्त करके भी खड़े रहते हैं। जहां पतझड़ का मौसम इनके सारे पत्ते सुखाकर जमीन पर गिरा देता है वहीं, बंसत में वापस इन पेड़ों पर हरे पत्तों की कलियां फूटने लगती हैं। मुझे लगता शायद मेरे जीवन का पतझड़ भी कभी खत्म हो और बसंत मेरे जीवन में वापस आ जाए।

सन् 2011 आते आते मेरी आर्थिक स्थिति और खराब हो गई, मेरे पास अपने बच्चों की फीस जमा करने के पैसे तक नहीं थे। नतीजतन मेरे बच्चों को घर बैठना पड़ा। मैंने जिस भी दरवाजे पर उम्मीद से दस्तक दी, मुझे हर जगह से ठोंकरें ही नसीब हुईं। मैं हर तरफ से हार थक गई थी, जब जब निराश होकर रोने लगती तो बच्चे आकर मुझसे लिपट जाते कि “मम्मा हम हैं आपके साथ”। मैं अपने बच्चों की फीस जमा करने के लिए किसी से उधार मांगती तो लोग मेरा फायदा उठाने की कोशिश करते। मेरे घर में खाने का एक निवाला तक न था। मैं खुद तो भूखीं रह भी लेती पर अपने छोटे छोटे बच्चों का क्या करूं यही सोचकर इस दौर में मैं जिंदगी से इतनी हताश हो गई कि मैंने आत्महत्या तक की कोशिश की। लेकिन शायद ऊपर वाले के यहां भी मेरे लिए कोई जगह नहीं थी।

Preety tyagi: The extraordinary story of a simple woman from Meerut!
प्रीति त्यागी पार्कों में अपने बच्चों के साथ काम करते हुए।

इसी दौरान मेरे एक रिश्तेदार की मदद से मैंने टिफिन सप्लाई का काम शुरू किया और टिफिन सर्विस का नाम रखा अंजलि कैंटीन। मैं रोज तीस तीस लोगों का खाना खुद बनाती और फिर टिफिन दे कर आती। पूरा दिन इसी काम में निकल जाता। मेरे छोटे छोटे बच्चों ने इस काम में मेरी बहुत मदद की। वो कभी सलाद काट देते, तो कभी टिफिन पैक कर देते। कुछ दिन तो यह काम ठीक ठाक चला पर फिर यह बंद हो गया। एक पुरानी कहावत है “कर्महीन खेती करे, बैल मरे सूखा पड़े”। चूंकि टिफिन सर्विस लेने वाले अधिकतर स्टूडेंट थे और महीने भर तो वे लोग टिफिन लेते रहते और पैसे देने के समय गोल हो जाते। इस काम में भी मुझे सिर्फ नुकसान ही हाथ लगा।


मुझपर कर्जे का बोझ दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा था, इस दौर में मेरी हालात इतनी खराब हो गई कि मुझे अपना घर तक छोड़ना पड़ा और मैंने एक किराए का घर लिया। मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि जीवन किस दिशा में लेकर जाने वाला है। बड़े होते बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, मकान का किराया हर महीने मुंह बाए खड़े रहते और मेरे पास आमदनी का कोई जरिया नहीं जिससे में मकान का किराया तो दूर की बात बच्चों को दो जून का भरपेट खाना भी खिला सकूं।

जब मेरे जीवन के अनगिनत परेशानियां का पता मेरे मायके वालों को चला तो शायद उन्हें मुझ पर दया आ गई। उन्होंने आना जाना शुरू कर दिया और मेरी थोड़ी बहुत मदद भी करने लगे। तभी मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे सलाह दी कि प्रीति तुम इतने बुरे दौर से गुजर रही हो अगर तुम थोड़ी हिम्मत करो तो प्राधिकरण में ठेकेदारी का काम कर सकती हो। इस भरी दुनिया में मेरे पास हिम्मत के अलावा और कुछ बचा ही कहां था। उनका सुझाव मुझे अच्छा लगा। लेकिन ठेकेदारी की शुरुआत करने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। तब मैंने अपने पिताजी से इस विषय में बात की। चूंकि उन्हें पता था कि मुझे बचपन से ही पेड़ पौधों से बहुत लगाव है इसीलिए उन्होंने इस काम में मेरी मदद करना स्वीकार्य किया।

मेरे पापा ने अपनी प्रॉपर्टी पर मुझे एक फर्म बनाकर दी और काम शुरू करने के लिए तीस हजार रुपए भी दिए। मैंने इस छोटी सी राशि से अपना काम शुरू किया और पार्कों में पेड़ पौधे लगाने का काम शुरू किया। इस काम ने मुझे बहुत सुकून प्रदान किया। वैसे भी बचपन से ही मुझे पेड़ पौधे से बहुत लगाव था और इस काम में तो मेरा मन खूब रमने लगा। असल में पेड़ पौधे ही तो थे जो मेरे हर दुख में, सुख में, हर अच्छे और खराब समय में मेरे साथ थे, जिनसे मैं अपने मन की हर वो बात कह पाती जो दुनिया के सामने कहने में मुझे संकोच होती।

धीरे धीरे मुझे प्राधिकरण से काम मिलने लगा। सबसे पहला काम मुझे करीब डेढ़ लाख रुपए का मिला। काम तो मिल गया पर उसे करने के लिए जो जरूरी संसाधन होने चाहिए वो मेरे पास नहीं थे। जब कुछ पुराने ठेकेदारों से मदद मांगी तो सबने अंगूठा दिखा दिया। मरती क्या न करती मैं अपने मजदूरों के साथ खुद काम में जुट जाती। चूंकि इस तरह के काम का कोई पहले अनुभव नहीं था तो दफ्तर में लोग बात बनाते कि “कितने दिन टिकेगी, बहुत आए हैं इस जैसे ! देखना जल्दी ही भाग जाएगी”। लेकिन मैं डटी रही, मेरे पास कोई दूसरा चारा भी कहां था। जब मजदूरों से काम कराने के पैसे नहीं होते तो मेरे तीनों बच्चे भी मेरे साथ काम में जुट जाते।


पार्कों में काम करने के दौरान देखती कि मेरे बच्चे भी धीरे धीरे मेरी तरह पेड़ों से प्यार करने लगे हैं। उन्हें भी अब पेड़ पौधों में अपना परिवार दिखाई देता है। मेरे बच्चे जब बड़े मन से पेड़ पौधों का काम करते तो यह बात मेरे मन को बहुत तस्सली देती।

कहते हैं न कि अच्छा दोस्त बहुत किस्मत से मिलता है, मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। जब मैंने प्राधिकरण में पेड़ पौधों का काम शुरू किया तो मेरी मुलाकात छवि मित्तल से हुई। छवि में मुझे अपनी दोस्त और बहन दोनों मिल गए। ये अलग बात है कि वो मेरी ही तरह प्राधिकरण में पौधों के काम के लिए आईं थी, लेकिन उनका मेरा साथ ऐसा हुआ कि वो मेरे जीवन के हर सुख दुख में खड़ी होने लगी। मैं किसी भी तरह की परेशानी में छवि से सलाह लेती और वो भी एक बहन की तरह हर सुख दुख में मेरा साथ देतीं।

धीरे धीरे मुझे प्राधिकरण से पेड़ लगाने का काम मिलने लगा था, जिंदगी की गाड़ी भी जैसे तैसे पटरी पर लौटने लगी। एक दिन मेरी बेटी कांव्याजलि ने मुझसे अचानक एक सवाल पूछा “ मां ये लोग बारिश के दिनों में इतने सारे पेड़ लगाते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और फिर इन पेड़ों की तरफ कोई ध्यान नहीं देता। कुछ दिनों बाद इन्हीं लोगों की गाड़ियों तले यह पेड़ कुचल जाते हैं। क्या हम इसके लिए कुछ नहीं कर सकते।” मैं बहुत देर तक अपनी बिटिया की बात पर सोचती रही, लेकिन मैं कर भी क्या सकती थी। मैं खुद एक किराए के मकान में रहती थी।


मेरा मन तो बहुत था कि हम भी कुछ पेड़ लगाएं और उनकी देखरेख करें लेकिन हमारी तत्कालिक आर्थिक स्थिति हमें इसकी इजाजत नहीं देती थी। असल में सरकार जो पेड़ लगवाती है उनमें से 90 प्रतिशत पेड़ या तो मर जाते हैं या बिना देखरख के खराब हो जाते हैं। ये अलग बात है कि सरकारी कागजों में खराब होने वाले पेड़ों का प्रतिशत सिर्फ दस ही होता है। मगर वास्तविक स्थिति तो यह है कि एनजीओ और सरकारी विभाग जिन पेड़ों को लगवाते समय समय तरह तरह की फोटो खिंचवाते हैं, बाद में इन पेड़ों की देखरेख की कोई व्यापक व्यवस्था नहीं होती।

धीरे धीरे पेड़ पौधों को लगाने और उनकी रखरखाव की इच्छा मेरे मन में बलवती होती गई जिसके फलस्वरूप मैंने अपनी बेटी काव्यांजलि के नाम से एक एनजीओ का रजिस्ट्रेशन करवाया। मैंने अपने जीवन का एक ही लक्ष्य बनाया है सबको पर्यावरण के प्रति जागरूक करूं और जहां तक संभव हो न सिर्फ पेड़ पौधे लगाएं बल्कि उनकी रक्षा भी करें।

इसी के तहत प्राधिकरण के साथ मिलकर मुझे जहां भी काम मिलता मैं वहां अपनी तरफ से पचास पेड़ लगाती हूं और उनकी देखरेख भी करती हूं। मैंने मेरठ के आसपास के लोगों से अपील भी की कि यदि कोई भी व्यक्ति पेड़ लगवाना चाहता हैं और उनकी सेवा करना चाहते हैं तो वह मुझसे संपर्क कर सकता है। मैं न सिर्फ उनके यहां पेड़ लगाऊंगी, बल्कि उनके यहां लगाए गए पेड़ की समय समय पर देखभाल भी करती रहूंगी।

असल में इन वृक्षों ने मुझे बहुत कुछ दिया है, मेरी हर मुसीबत के वक्त बस यही थे जो मेरे साथ थे, आज मैं जो भी हूं कहीं न कहीं, किसी न किसी तरीके से इन पेड़ पौधों ने मेरे जीवन के उतार चढ़ाव भरे रास्तों पर मेरा साथ दिया है। अब मेरी बारी है कुछ करने की। मैं जल्दी ही अपने आसपास के क्षेत्रों में पचास हजार पौधे लगाने का अभियान शुरू कर रही हूं। मेरी लोगों से अपील है कि वो अगर अकेले हैं, उन्हें लगता है कि इस भरी दुनिया में कोई नहीं है उनका तो आप भी अपने आसपास एक पेड़ लगाएं और उसकी देखभाल करें। मैं दावा करती हूं कि एक पेड़ आपका जीवन भर साथ देगा और इसके बदले में यह आप से कुछ नहीं मांगता।

 

 

Read all Latest Post on खासखबर khaskhabar in Hindi at Khulasaa.in. Stay updated with us for Daily bollywood news, Interesting stories, Health Tips and Photo gallery in Hindi
Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए khulasaa.in को फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें
Title: preety tyagi the extraordinary story of a simple woman from meerut in Hindi  | In Category: खासखबर khaskhabar

Next Post

Viral Video: 6 साल की बच्ची ने YouTube से कमाए 55 करोड़ रुपए

Wed Sep 4 , 2019
कमाने की कोई उम्र नहीं होती, पर मात्र YouTube वीडियो अपलोड कर करोड़ों कमा लेना चौकाता है । हालाँकि बड़े बड़े ब्राण्ड व कंपनियां YouTube से पैसे कमा रहे हैं, परन्तु जब बात हो 6 साल की बच्ची के करोड़ों कमा लेने की बात हो तो अचम्भा होता है, मगर […]
6-Year-Old YouTube Star Known for Toy Reviews Buys Property Worth Rs 55 Crores6-Year-Old YouTube Star Known for Toy Reviews Buys Property Worth Rs 55 Crores

All Post


error: खुलासा डॉट इन khulasaa.in, वेबसाइट पर प्रकाशित सभी लेख कॉपीराइट के अधीन हैं। यदि कोई संस्था या व्यक्ति, इसमें प्रकाशित किसी भी अंश ,लेख व चित्र का प्रयोग,नकल, पुनर्प्रकाशन, खुलासा डॉट इन khulasaa.in के संचालक के अनुमति के बिना करता है , तो यह गैरकानूनी व कॉपीराइट का उल्ल्ंघन है। यदि कोई व्यक्ति या संस्था करती हैं तो ऐसा करने वाला व्यक्ति या संस्था पर खुलासा डॉट इन कॉपी राइट एक्त के तहत वाद दायर कर सकती है जिसका सारे हर्जे खर्चे का उत्तरदायी भी नियम का उल्लघन करने वाला व्यक्ति होगा।