आज टाटा संस किसी पहचान के मोहताज नही है | नमक, चाय, स्टील, कार-ट्रकों, मोबाइल से लेकर कंप्यूटर सॉफ्टवेयर तक, हर जगह टाटा संस का साम्राज्य फैला हुआ है | जब भी कोई नया व्यक्ति टाटा संस के साम्राज्य से जुड़ता है तो उसे एक वाक्य बताया जाता है, जो है – ‘हम किसी न किसी रूप में हर भारतीय की जिंदगी का हिस्सा हैं|’

इस साम्राज्य के संस्थापक थे – जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा | सर स्टैनले रीड, जो कि 1907 से 1923 तक टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एडिटर रहे, ने जमशेदजी  जी के बारे में कहा था, ‘सिर्फ एक ही शख्स था जिसने हौसले के साथ भविष्य को देखा और जिसने बाकियों से अलग, पूर्ण अर्थव्यवस्था पर विचार किया. ये थे, जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा |’ जमशेदजी ने स्टील उत्पादन इकाईयाँ, जल विद्युत (हाइड्रो-इलेक्ट्रिक) ऊर्जा का उत्पादन, भारतीय विज्ञान संस्थान व होटल ताज महल के रूप में भारत को ऐसी उपलब्धियाँ दी है जिनके लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा |

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इनका जन्म सन् 3 मार्च 183  में गुजरात के छोटे से कस्बे नवसेरी में पारसी पादरियों के खानदान में हुआ था |  इनके पिता जी का नाम नुसीरवानजी व उनकी माता जी का नाम जीवनबाई था। इनकी पत्नी का नाम हीरा बाई दबू था |

इन्होने एल्फिंस्टन कॉलेज से 1858 में स्नातक की डिग्री प्राप्त कर अपने पिता के व्यवसाय की जिम्मेदारी अपने कंधो पर ले ली। पिता ने कारोबार के विस्तार हेतु उन्हें हांगकांग भेज दिया और यही से जमशेदजी के व्यापारिक जीवन की शुरुवात हुयी |

ये वो वक़्त था, जब दुनियाभर में कपास की मांग तेज़ से बढ़ रही थी और व्यापारी इसमें दाव लगाकर या तो रातों-रात अमीर हो रहे थे या फिर कपास रूपी सट्टे में बर्बाद हो रहे थे | हर कोई कपास के व्यापार में हाथ आजमाना चाहता था, जमशेदजी के पिता भी ऐसा ही चाहते थे इसलिए उन्होंने जमशेदजी को किस्मत आजमाने हेतु इंग्लैंड भेज दिया था क्योंकि उस वक़्त  लंदन एक बहुत बड़ा बाज़ार हुआ करता था | शुरुआती दिनों में उन्होंने कपास की दलाली में बिताये और उसके बाद एक जूट मिल मलिक बनने में |

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कुछ समय पश्चात बॉम्बे में हिंदुस्तान की पहली कपास की फैक्ट्री लगाई गयी जिसके संस्थापक कावसजी नाना भाई डावर थे | इस कपास की फैक्ट्री के स्थापित होने के बाद मानो जैसे बॉम्बे व अहमदाबाद के आसपास मिलें स्थापित करने की होड़ सी मच गयी | मगर जमशेदजी और उनके पिता ने भीड़ से अलग फैक्ट्री खोलने के लिए एक ऐसी जगह चुनी जहाँ कपास के खेत भी थे और नर्मदा नदी का पानी भी था, वो जगह थी जबलपुर | जगह के चुनाव के बाद वहां की सरकार को फैक्ट्री लगाने के लिए आवेदन भेजा गया | परन्तु सरकार की सहमति के अतिरिक्त एक अन्य समस्या वहां जमशेदजी का इंतजार कर रही थी, दरअसल उस जगह पर  एक प्रसिद्ध साधु रहता था, जिसके भक्तों ने फैक्ट्री के विरोध में सरकार व जमशेद जी को धमकी दी कि अगर साधु महाराज को यहाँ से हटाया गया तो ये जगह दंगे  वाले क्षेत्र में तब्दील हो जाएगी | अत: इन दंगो का जन्म न हो ये सोचकर जमशेदजी ने फैक्ट्री के लिए नागपुर का चयन किया |

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1 जनवरी, 1877 को रानी विक्टोरिया हिंदुस्तान की रानी घोषित हुईं और जमशेदजी ने इसे सही मौका मानकर रानी विक्टोरिया के नाम पर नागपुर में ‘इम्प्रेस्स मिल’ की स्थापना की, इम्प्रेस्स का मतलब ‘महारानी’ होता है | शुरुवात के दिनों में कुछ मुश्किल हालातो से गुजरने के बाद 1881 में ‘इम्प्रेस्स मिल’ ने 16 % का लाभांश दिया और कुछ ही समय में यह मध्य प्रान्त की सबसे बड़ी मिलों में से एक बन गई |

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आज के वक़्त में जिस ‘प्रोफेशनल कल्चर’ की बात की जाती है, उस वक़्त इसकी कल्पना करना भी मुश्किल था | जमशेदजी का व्यक्तित्व अन्य फैक्ट्री मालिको से बहुत भिन्न था | वो  कारखाने के श्रमिकों का पूरा ध्यान रखते थे | भारत की फैक्ट्रियों में प्रोविडेंट फण्ड, दुर्घटना बीमा स्कीम और पेंशन फण्ड की शुरुवात व मिलों में वातायन (वेंटिलेशन) और उमस से बचने के उपाए जैसी सुविधाये सर्वप्रथम इन्होने ही शुरू की थी | जमशेदजी अपने यहाँ करने वाले श्रमिको की इतनी चिंता करते थे कि इंग्लैंड में ‘फैक्ट्रीज एक्ट’ के लागू होने से ही पहले जमशेदजी श्रमिको के हक़ में होने वाले सुधारो को हिंदुस्तान में स्थित अपनी फैक्ट्रीयों में अमल में ले आये थे | मजदूरों को बेहतर काम के बदले इनाम या मैडल देनी की शुरुवात भी जमशेदजी की ही सोच की उपज थी और तो और अपने कर्मियों के रहने के लिए उन्होंने आवास की सुविधा उपलब्ध करायी | जमशेदजी का मानना था कि  आर्थिक स्वतंत्रता ही राजनीतिक स्वतंत्रता का आधार है |

उन दिनों अच्छे यूरोपियन होटलों में स्थानीय भारतीयों का प्रवेश वर्जित था, जमशेदजी ने यूरोपियन होटलों के मालिको की इस दमनकारी नीति का करारा जवाब देते हुए होटल ताजमहल का निर्माण करवाया, जिसके निर्माण में 4,21,00,000 रुपये का खर्चा आया था | होटल ताजमहल दिसम्बर 1903 में बनकर तैयार हुआ था। 1892 में उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए प्रयास शुरू कर दिए और उन्होंने मेधावी छात्रों के लिए छात्रवृति कोष की स्थापना की |

11 मई 1904 को जमशेद जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया ।

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