आम निवेशकों को ऑनलाइन ट्रेडिंग की सुविधा उपलब्ध कराए जाने के बाद से निवेश की दुनिया में खासा बदलाव देखने को मिला है क्योंकि इस सुविधा की वजह से ऐसे लोगों ने भी शेयर बाजार का रुख किया है जो शायद इसके बारे में कभी सोचते भी नहीं।  कारोबारियों और निवेशकों को ऑनलाइन ट्रेडिंग की सुविधा देने वाले ब्रोकर उन्हें अपने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर खुद से शेयरों व सूचकांकों में खरीद-बिक्री करने की सहूलियत मुहैया कराते हैं। हालांकि शेयरों की खरीद-बिक्री के अन्य तरीके- जैसे टेलीफोन के जरिए ब्रोकर को खरीद-बिक्री का निर्देश देना, ब्रोकर के कार्यालय में जा कर इस तरह का निर्देश देना आदि- अब भी काफी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आम कारोबारी ऑनलाइन ट्रेडिंग को आसान समझता है। इस जरिए से ट्रेडिंग में आसानी तो होती ही है, इसके अलावा जो बात किसी कारोबारी को इसकी ओर आकर्षित करती है वह है खुद से अपने सौदे को पूरा करने पर आने वाला मजा। लेकिन शेयरों की ऑनलाइन ट्रेडिंग के दौरान आम कारोबारी या निवेशक ऐसी कई तरह की गलतियां कर बैठता है जो वह आम तौर पर नहीं करता।

गलतियां भी होती हैं तेज गति से

बड़ी संख्या में नए निवेशक इस भ्रम में ऑनलाइन ट्रेडिंग की शुरुआत करते हैं कि इस सुविधा की मदद लेते ही वे किसी खास निवेश कौशल के बगैर ही शेयर बाजार से भारी कमाई करने लगेंगे। ऐसी मानसिकता को तेजी के बाजार में खास तौर पर बढ़ावा मिलता है। दरअसल ये कारोबारी अक्सर यह भूल जाते हैं कि ऑनलाइन ट्रेडिंग ने शेयर बाजार के कारोबार की मूलभूत बातों में कोई बदलाव नहीं किया है। स्मार्ट ट्रेडिंग के तरीके अभी भी वही हैं, इस सुविधा ने इस काम में महज  थोड़ी आसानी ला दी है। ये कारोबारी यह तो याद रखते हैं कि इस सुविधा से बाजार में तेजी से प्रवेश किया जा सकता है, लेकिन ये लोग यह भूल जाते हैं कि इसके जरिए गलतियां भी तेजी से होती चली जाती हैं।

अनावश्यक रूप से अधिक सौदे

ऑनलाइन ट्रेडिंग की सुुविधा की वजह से बाजार में सौदे करना महज एक क्लिक भर से संभव हो जाता है। यह स्थिति कारोबारियों को अनावश्यक रूप से अधिक सौदे करने के लिए प्रेरित करती है। वे यह सोचने लगते हैं कि बाजार से अधिकतम लाभ लेने के लिए उन्हें हमेशा बाजार में बने रहना होगा। ऐसे में ये लोग आसानी से एक्टिव ट्रेडिंग सिन्ड्रोम के शिकार बन जाते हैं जो अक्सर इन्हें काफी महंगा पड़ता है। दरअसल ये लोग यह भूल जाते हैं कि फायदा बड़ी संख्या में सौदे करने पर नहीं बल्कि सही सौदे करने पर होता है। इसके अलावा ये लोग बिना किसी योजना के कारोबार में कूद जाते हैं। उदाहरण के तौर पर यह देखा गया है कि वे इस उम्मीद में शेयर बटोरते जाते हैं कि दिन में किसी भी समय यह शेयर वापसी कर सकता है। लेकिन इस प्रक्रिया में दिन भर के दौरान ये लोग काफी सारा नुकसान बटोर लेते हैं। चाहे यह ऑनलाइन ट्रेडिंग हो या फिर ऑफलाइन ट्रेडिंग, कोई भी सौदा शुरू करते समय कारोबारी को हमेशा यह पता होना चाहिए कि वह इस सौदे को कब खत्म करेगा।

उत्पादों के बारे में जानकारी का अभाव

नए कारोबारी शुरुआत में इस बात के बावजूद काफी अधिक ट्रेडिंग करने की कोशिश करते हैं कि बहुत सारी चीजों के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं होता है। दरअसल ऑनलाइन ट्रेडिंग की सुविधा हाथ में आते ही वे हर उस ट्रेडिंग प्रॉडक्ट को आजमाने की कोशिश करते हैं जो उपलब्ध होता है। ओपन इंट्रेस्ट के बारे में भले ही उन्हें कुछ पता न हो, वे कॉल और पुट ऑप्शन में हाथ डालने की कोशिश करते हैं। यही नहीं, कुछ लोग तो हास्यास्पद रूप से फ्यूचर्स में निवेश करने लगते हैं।

विशिष्ट सुविधाओं का जाल

स्टॉक एक्सचेंजों द्वारा ट्रेडिंग के लिए उपलब्ध कराए गए वित्तीय उत्पाद तो अपनी जगह हैं, ब्रोकर अपनी ओर से बनाए गए विशिष्ट सुविधाओं की पेशकश करता रहता है। उदाहरण के तौर पर एक ऐसी ही सुविधा के तहत मार्जिन क्लाइन्ट मोड के अधीन कोई ट्रेडर सौदा कर शेयर ले सकता है और उसके लिए आवश्यक पूंजी टी+5 दिनों में ला सकता है। इस सुविधा के तहत 14 से 25 फीसदी मार्जिन के जरिए सौदा किया जा सकता है और बाकी फंड लाने के लिए समय दिया जाता है। यदि उसको लगता है कि वह ऐसा नहीं कर सकेगा, तो वह टी+5 के भीतर सौदा काट सकता है। ऑनलाइन ट्रेडिंग का इस्तेमाल करने वाले कारोबारी कई बार इस तरह के जाल में फंस जाते हैं और अपनी पूंजी गंवा बैठते हैं।

रियल टाइम प्राइस की अनुपलब्धता

ब्रोकर द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के धीमेपन सहित विभिन्न कारणों से अधिकांश ऑनलाइन ट्रेडर रियल टाइम प्राइस नहीं देख पाते। इसकी वजह से वे किसी शेयर विशेष या सूचकांक विशेष में   हो रहे कारोबार की वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ रह जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि उनके सौदे कम अपडेटेड कीमतों पर आधारित होते हैं। फलस्वरूप उन्हें अपने कारोबार में नुकसान उठाना पड़ता है।

सौदे करने की जल्दीबाजी

शेयरों में ऑनलाइन ट्रेडिंग करने वाले नौसिखिए अक्सर सौदे करने में जल्दीबाजी करते हैं। जैसे ही बाजार खुलता है, वे सौदे डालने के लिए तैयार रहते हैं। सौदे करने की इस जल्दीबाजी में ये ट्रेडर दरअसल गलत स्टॉप लॉस और टार्गेट प्राइस लगा देते हैं, जिसकी वजह से इन्हें खासा नुकसान हो जाता है।

इसके अलावा ये निवेशक यह बात भूल जाते हैं कि शुरुआती घंटे में शेयरों की कीमत में खासा उतार-चढ़ाव रहता है। उन्हें चाहिए कि वे कीमतों में स्थिरता आने के बाद सौदे करें। ऐसा देखा गया है कि अनुभवी निवेशक दिन के दूसरे हिस्से में कारोबार करते हैं ताकि बेहतर (स्थिर) कीमतों पर सौदे कर सकें।

सुविधाओं के बारे में कम जानकारी

ऑनलाइन ट्रेडिंग करने वाले अधिकांश नौसिखिए ट्रेडर असल में उन सुविधाओं के बारे में अच्छी तरह जानते भी नहीं जो उनके ब्रोकर के ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होती हैं। ऐसे में कई बार ऐसी स्थितियां आ जाती हैं जब वे ऑनलाइन ट्रेडिंग करते समय फंस जाते हैं और अच्छी-खासी पूंजी गंवा बैठते हैं। आइए इससे संबंधित एक उदाहरण देखते हैं। जब कोई ट्रेडर अपना ऑर्डर देने के लिए ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म खोलता है तो उसके सामने दो विकल्प होते हैं- मार्केट ऑर्डर और लिमिट ऑर्डर। चूंकि ट्रेडर को इस बारे में कुछ खास पता नहीं होता, ऐसे में वह इसमें डिफॉल्ट विकल्प को अपना लेता है जो दरअसल मार्केट ऑर्डर होता है।

इस गलती का उस ट्रेडर को खासा खामियाजा भुगतना पड़ता है क्योंकि मार्केट ऑर्डर के तहत दिए गए ऑर्डर को तुरंत ही स्टॉक एक्सचेंज को भेज दिया जाता है और वहां पर स्टॉक एक्सचेंज के ऑर्डर बुक से मिलान कर बेहतरीन उपलब्ध कीमत के साथ उसका मिलान कर दिया जाता है और सौदा हो जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि उस ट्रेडर का उस सौदे की कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं होता। ऐसे में इस बात की संभावना काफी अधिक होती है कि वह अपेक्षाकृत अधिक कीमत पर शेयरों की खरीद करेगा। दूसरी यदि वह अपने पोर्टफोलियो के शेयर बेच रहा है, तो इस बात के काफी अधिक आसार होते हैं कि उसे अपेक्षाकृत कम कीमत हासिल हो। ऐसे में कारोबारियों को चाहिए कि वे कभी भी मार्केट ऑर्डर का विकल्प न अपनाएं। दरअसल उन्हें लिमिट ऑर्डर का विकल्प अपनाना चाहिए क्योंकि इस विकल्प को अपनाने पर कारोबारी का उस सौदे की कीमतों पर नियंत्रण रहता है।

एक अन्य उदाहरण देखें तो मार्जिन प्लस ऑर्डर के तहत फ्रेश ऑर्डर, कवर एसएलटीपी ऑर्डर, कवर प्रॉफिट ऑर्डर जैसे विकल्प ट्रेडर को उपलब्ध होते हैं। जब ट्रेडर इन ऑर्डर के फर्क को समझे बिना ऑर्डर पेश करता है तो उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ जाता है।

ब्रोकर/ आरएम से दूरी घातक

ऐसा देखा गया है कि ऑनलाइन ट्रेडर समय के साथ अपने सारे सौदे खुद से पूरे करने लगते हैं और इसके लिए ब्रोकर/ रिलेशनशिप मैनेजर की सहायता लेना जरूरी नहीं समझते। लेकिन यह आदत कई बार काफी भारी पड़ जाती है जब इंटरनेट कनेक्शन धोखा दे देता है और वह किसी सौदे के बीच में ही अटक जाता है। दरअसल वे इस बात को दरकिनार कर देते हैं कि उन्हें ऑनलाइन ट्रेडिंग करने के दौरान भी रिलेशनशिप मैनेजर की सेवा भी लेते रहनी चाहिए। इससे न केवल सौदे को पूरा करने में मदद मिलेगी, बल्कि ट्रेडर किसी सौदे में होने वाले संभावित घाटे से भी बच जाएगा।

 

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