अमिताभ पाराशर

इस साल ऑस्कर अवार्ड के लिए भारतीय प्रविष्टि के तौर पर इसी फ़िल्म के चुनाव के लिए गठित ज्यूरी ने जब शुजीत सरकार की चर्चित और आलोचकों की पसंद ‘ऊधम सिंह’ को न चुन कर एक छोटी सी तमिल फ़िल्म कुझंगल को चुन लिया गया तो कई लोगों को हैरानी हुई. अपनी नाराज़ पत्नी को वापस लेने के लिए एक ग़ैर ज़िम्मेदार पत्नी पीड़क के संघर्ष यात्रा और इस दौरान उसके बेटे से उसके सम्बंध पर आधारित कहानी है इस फ़िल्म की.

इस चुनाव पर ऊँगली उठाने वाले भी अब मानने लगे हैं कि शुजीत सरकार की महँगी फ़िल्म के मुक़ाबले इस छोटी सी तमिल फ़िल्म के चांस ज़्यादा हैं. ख़ैर, इस फ़िल्म के मुक़ाबले दुनिया भर से आयी हुई कई महत्वपूर्ण फ़िल्में दौड़ में हैं. देखा जाय क्या होता है.

दो तीन साल पहले असमिया भाषा की एक फ़िल्म चर्चा में थी. फ़िल्म का नाम था ‘आमिस’. फ़िल्म, अमेरिका के एक बड़े फ़िल्म फ़ेस्टिवल (ट्राइबेका फ़िल्म फ़ेस्टिवल) में रिलीज़ हुई थी. फिर यह हिंदुस्तान आयी तो आलोचकों ने तो फ़िल्म की तारीफ़ के पुल बाँध दिए. हालाँकि, कई ऐसी फ़िल्में होती हैं जो फ़िल्म आलोचकों और दर्शकों को एक साथ पसंद आती हैं लेकिन इस फ़िल्म की ख़ासियत यह थी कि इसे एक अजूबे विषय वाली फ़िल्म बताया गया. फ़िल्मकार अनुराग कश्यप ने ट्वीट करके लोगों को बताया था कि इस तरह की फ़िल्म हिंदुस्तानी दर्शकों ने आजतक देखी नहीं है.

ख़ैर, तो इस फ़िल्म की कहानी क्या है ? कहानी कुछ ऐसी है कि एक युवक, एक शादीशुदा लेकिन पति से नौकरी की वजह से अलग रह रही डॉक्टर के सम्पर्क में आता है. दोनों में दोस्ती होती है. युवक के दिमाग़ में महिला को प्रभावित करने का खेल चल रहा है. हालाँकि औरत के दिमाग़ में ऐसा कुछ नहीं है. दोनों की रुचियाँ, ख़ासकर खानपान को लेकर एक सी हैं. दोनों मांसाहार के प्रेमी हैं. युवक, औरत को प्रभावित करने के लिए लगभग हर उपलब्ध माँस को ख़ुद पका कर लज़ीज़ तरीक़े से पेश करता है, कई बार अपने हाथों से बनाकर भी . औरत बड़े चाव से खाती है. दोनों में लगाव बढ़ता है. एक समय ऐसा आता है जब युवक ने सभी क़िस्म के माँस उस औरत को खिला दिए हैं. अब नया खिलाने को कुछ नहीं है. तो, एक दिन वह युवक, उस औरत को अपने ही शरीर का माँस काटकर और पका कर खिलाता है. इसके आगे भी कहानी है लेकिन यहाँ बताना ज़रूरी नहीं.

तो, कहानी का चौंकाने वाला कथ्य यह है कि प्रेम पाने के लिए युवक अपने शरीर का माँस पकाकर उस औरत को खिलाता है जिससे वह इकतरफ़ा प्रेम करता है. संदेह नहीं, कि इस तरह के कथानक वाली कोई फ़िल्म पहले कभी यहाँ, हिंदुस्तानी सिनेमा में दिखी नहीं.
इस फ़िल्म ‘आमिस’ के लेखक निर्देशक भास्कर हज़ारिका हैं. उनके हिसाब से यह उनकी मौलिक कहानी है.

लेकिन पिछले दिनों तीन साल पहले पुस्तक मेले से ख़रीदी एक किताब ‘ सिंध की लोक कथाएँ पढ़ रहा था.! इसमें एक कहानी है, ‘सुहिणी मेहार’! यह दरअसल सुहिणी (युवती) और मेहार (युवक) की प्रेम कहानी है. मेहार रोज़ नियत समय पर अपनी प्रेमिका सुहिणी से मिलता था. वह रोज़ रात सुहिणी के लिए पकी हुई मछलियाँ लाता. दोनों प्रेम से खाते और प्रेम करते. एक दिन ज़ोर का तूफ़ान आया. मछुआरे मछलियाँ फाँस ना सके. वह अपनी प्रेमिका के पास ख़ाली हाथ कैसे जाता. सो, उस दिन उसने अपनी जाँघ चीर कर गोश्त निकाला, उसे पकाया और सुहिणी के पास ले आया !

यहाँ, इस सिंधी लोक कथा का हवाला इसलिए नहीं दिया ताकि हम भास्कर हज़ारिका की ‘आमिस’ की कथा के मौलिक होने पर संदेह जारी कर सकें. बल्कि इसका मक़सद सिर्फ़ यह बताना है कि लोक कथाओं में, मौलिक कहानियों की कमी का रोना रोने वाले हिंदी सिनेमा के लिए कितना मसाला छुपा हुआ है.

ख़ैर, अगर बात बॉलीवुड की करें तो कहना ना होगा कि हाल के वर्षों में कुछ लेखकों, अभिनेताओं और हिंदी फ़िल्मकारों ने ऐसे विषयों को छूने और उनपर फ़िल्में बनाने की कोशिशें की हैं जो अभी तक अछूत माने जाते थे. इसपर ज़्यादा अंदर जाने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन जो ग़ौर करने वाली बात है, वो यह कि इसी दौरान ग़ैर हिंदी सिनेमा, ख़ासकर दक्षिण भारतीय में हिंदी सिनेमा के मुक़ाबले कई गुना अधिक प्रयोगधर्मी हुआ है.

हम यहाँ नहीं कह रहे कि इस दौर से पहले हिंदी या ग़ैर हिंदी सिनेमा ने विषय और शैली को लेकर प्रयोग नहीं किए हैं. बल्कि ये कहना चाह रहे हैं कि हाल में कथ्य और शैली को लेकर जिस तरह का काम देखने को मिल रहा है, वह पहले नहीं दिखा. मेरे हिसाब से इसके दो तीन बड़े कारण हैं. पहला बड़ा कारण तकनीक का सस्ता होना है. फ़िल्में बनाना पहले के मुक़ाबले काफ़ी सस्ता हुआ है. कैमरा और एडिटिंग से जुड़े मशीन और तकनीक सस्ते हुए हैं. अब आप छोटे कैमरे और अपने लैप्टॉप का इस्तेमाल करके भी फ़िल्म बना सकते हैं. लोग बना भी रहे हैं. दूसरी बात, अंतरराष्ट्रीय सिनेमा तक आम लोगों की पहुँच है. फ़िल्म समारोहों और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्ज़ पर उपलब्ध दुनिया भर की फ़िल्मों की सहज उपलब्धता ने नवोदित फ़िल्मकारों को बताया है कि दुनिया में किस किस तरह के फ़िल्में बन रही हैं.

तीसरी और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अच्छी फ़िल्मों के लिए पूरा विश्व एक बड़ा बाज़ार बन गया है. हाँ, यहाँ, शर्त यह है फ़िल्म अच्छी हो और दुनिया उसे अच्छी फ़िल्म माने ना कि फ़िल्मकार ख़ुद उसे अच्छी फ़िल्म मानता रहे..जैसा कि अक्सर होता है. ख़ासकर हिंदुस्तान में जहाँ हर दूसरा फ़िल्मकार अपने को महानता के बिलकुल क़रीब पाता है.

अब आप देखिए, एक अच्छी फ़िल्म बनाकर दक्षिण कोरिया के फ़िल्मकार बोंग जून हो ने क्या कमाल किया. ऑस्कर अवार्ड के इतिहास में पहली बार हुआ कि किसी विदेशी भाषा की फ़िल्म को बेस्ट फ़िल्म का अवार्ड मिला. ‘पारासाइट’ नाम की इस फ़िल्म में (यह फ़िल्म ऐमज़ान प्राइम पर उपलब्ध है) समाज में मौजूद वर्ग संघर्ष और आर्थिक असमानता के ज़रिए मानवीय मूल्यों और रिश्तों की कहानी मनोरंजक तरीक़े से कही गयी. इस फ़िल्म ने प्रतिष्ठित कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में सर्वोच्च पुरस्कार बटोरे थे . फिर उसके बाद दुनिया के सबसे बड़े फ़िल्म पुरस्कार समारोह में सबसे बड़ा सम्मान ले लिया.

ये जानिए कि ऑस्कर अवार्ड या कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल सिर्फ़ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं होते कि वे बहुत बड़े फ़ेस्टिवल और अवार्ड होते हैं. बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण होते हैं कि यहाँ अवार्ड पाने वाली फ़िल्मों के लिए एक बड़ा बाज़ार खुल जाता है. इन फ़िल्मों का बिज़नस कई गुणा बढ़ जाता है.

यह भी ग़ौर करिए कि अगर कहानी में दम हो, कहानी ऐसी हो जिसकी यूनिवर्सल अपील हो, तो फिर आज का दौर यह है कि आप किसी अच्छी फ़िल्म को दबा नहीं सकते. जैसा कि हमारे यहाँ प्रतिभाओं को दबाने का रिवाज है. लेकिन फ़िल्मों के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता.

आमतौर पर हम देखते हैं कि हिंदुस्तानी फ़िल्मकार अपनी फ़िल्मों की मार्केटिंग ठीक ना होने का रोना रोते हैं. ख़ासकर, जब ऑस्कर जैसे अवार्ड की बात होती है. वे कहेंगे, अरे क्या करें, फ़िल्में तो हम सही बनाते हैं लेकिन हमारी मार्केटिंग ठीक नहीं है. यह बहुत कुछ खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे जैसा मामला है. जैसा कि पहले कहा, आज के दौर में अच्छी फ़िल्म को दबाना सम्भव नहीं है. चाहे वह दुनिया के किसी कोने में बनी हो.किसी भाषा में बनी हो.

आप देखिए कि असम की ही एक महिला फ़िल्मकार ने विलेज रॉकस्टार्स और बुलबुल केन सिंग जैसी बिलकुल छोटी (बजट पंद्रह लाख से भी नीचे) फ़िल्में बनायी और दुनिया भर के नामी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में उन फ़िल्मों को लेकर घूमी. कुछ साल पहले भारत की तरफ़ से विलेज रॉकस्टार्स को कि विदेशी भाषा के ऑस्कर अवार्ड्स के लिए आधिकारिक एंट्री के तौर पर भेजा गया था . लेकिन फ़िल्म को कोई अवार्ड नहीं मिला. यहाँ अवार्ड ना मिलने का कारण यह नहीं था की हिंदुस्तानी फ़िल्मकारों की मार्केटिंग कमज़ोर है बल्कि कारण यह था कि उस साल इस असमिया भाषा की फ़िल्मों के मुक़ाबले कई मज़बूत विदेशी फ़िल्में भी ऑस्कर अवार्ड के लिए मैदान में थीं.

तो, यह भी एक फ़ैशन जैसा हो गया है यह कहना कि हमारी फ़िल्में मार्केटिंग और बजट की कमी की वजह से मारी जाती हैं. ऐसा बिलकुल नहीं है. असली बात यह है कि आप पूरी दुनिया के सामने कौन सी ऐसी मौलिक चीज़ कहते या दिखाते हैं जो उन्होंने इससे पहले देखा नहीं है. ‘पारासाइट’ ने यह काम किया है. दुर्भाग्य से भारतीय या हिंदी सिनेमा अभी तक यह काम नहीं कर सका है.

अंत में : हाल के कुछ वर्षों में, एक फ़िल्म जो ऑस्कर अवार्ड के बिलकुल क़रीब पहुँच गयी थी, वह थी रितेश बत्रा की ‘लंच बॉक्स’. दुनिया के कई फ़िल्म समारोहों में इस फ़िल्म को लोगों ने पसंद किया. लेकिन भारत की तरफ़ से ऑस्कर प्रविष्टि के तौर पर भेजने वाली समिति ने इस फ़िल्म को आपसी राजनीति और अज्ञानता की वजह से भेजा ही नहीं !

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