Bird Flu: the spread of diseases from animals and birds to humans : कोरोना वायरस का प्रकोप जारी रहने के दौरान ही कई राज्यों में बर्ड फ्लू फैलना वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों के बदलते रूप को बयां करता है। दुनिया कोविड के पहले से भी कई बीमारियों से जूझ रही थी। इन बीमारियों में दिखने वाली अहम प्रवृत्ति पशुओं एवं पक्षियों से इंसानों को होने वाले संक्रमण में तीव्र वृद्धि की है। तकनीकी तौर पर ‘जूनोटिक’ यानी पशुजन्य कही जाने वाली ये बीमारियां अमूमन संक्रामक, काफी हद तक जानलेवा और देखरेख में मुश्किल होती हैं। अधिक चिंताजनक यह है कि जूनोटिक बीमारियां फैलाने वाले अधिकांश पशु-पक्षी इंसानों की खाद्य शृंखला का हिस्सा हैं। पशु-पक्षियों और उनके मांस के सेवन से पैदा होने वाली बीमारियों को मोटे तौर पर खाद्य-जनित जूनोटिक बीमारी कहा जाता है।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) कहता है कि हरेक चार में से तीन नए संक्रामक रोग जूनोटिक श्रेणी के ही हैं और किसी-न-किसी रूप में जानवरों से संबंधित हैं। पशु-पक्षियों से इंसानों तक बीमारियों का प्रसार वायरस, बैक्टीरिया, परजीवी, कवक या रोगाणु करते हैं।पशुओं से होने वाला एच.आई.वी. जैसा जानलेवा संक्रमण भी जूनोटिक बीमारी के ही तौर पर शुरू हुआ था लेकिन बाद में वह सिर्फ इंसानी संक्रमण तक सीमित रह गया। इबोला, एवियन इन्फ्लूएंजा (बर्ड फ्लू) और साल्मोनेला जैसे दूसरे जूनोटिक रोगों में तेजी से फैलने की प्रवृत्ति देखी जाती है जिससे वे महामारी जैसे हालात पैदा कर सकते हैं। नॉवल कोरोना वायरस श्रेणी के वायरस अधिक संक्रामक हैं और मौजूदा कोविड-19 की ही तरह दुनिया भर में महामारी का प्रसार कर सकते हैं।

जूनोटिक एवं खाद्य-जनित जूनोटिक स्वास्थ्य समस्याएं काफी लंबी हैं। उनमें से कुछ चर्चित नाम कोविड-19, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, इबोला, निपाह, डेंगू, इन्सेफेलाइटिस और सार्स हैं। इस समय सक्रिय पशु-पक्षी जनित बीमारियों में से बर्ड फ्लू (एच5एन1 वायरस) और कोविड-19 (नॉवल कोरोना वायरस) पर खास ध्यान देने की जरूरत है। इसकी वजह यह है कि बर्ड फ्लू एवं कोविड-19 दोनों बीमारियों में स्वास्थ्य एवं आर्थिक दुष्प्रभाव बहुत गहरे होते हैं। बर्ड फ्लू में पोल्ट्री एवं अन्य पक्षियों की दम घुटने से मौत होने लगती है। इन पक्षियों से सुअरों, कुत्तों एवं बिल्लियों को वायरस का संक्रमण हो सकता है लेकिन इंसानों के चपेट में आने की आशंका बहुत कम होती है। हालांकि वे लोग जरूर चपेट में आ सकते हैं जो पक्षियों की देखभाल में समुचित सावधानी नहीं बरतते हैं।

भारत में इस वायरस से किसी इंसान के मरने का अब तक कोई भी मामला सामने नहीं आया है। बर्ड फ्लू की वजह से इंसानी मौत के मामले पूर्व एशियाई देशों में ही हुए हैं जहां पर पोल्ट्री एवं अन्य पक्षियों को अच्छी तरह पकाए बगैर ही खाने का चलन है। यह वायरस इंसानों से इंसानों में नहीं फैलता है और न अच्छी तरह पकाए गए पोल्ट्री उत्पादों के सेवन से ही हो सकता है।

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भले ही कोरोना वायरस को जूनोटिक बीमारियों की श्रेणी में रखा गया है लेकिन इसके स्रोत का पता अब तक नहीं लगाया जा सका है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक जंगली वायरस है जो संभवत: चमगादड़ों से इंसानों तक आया है। कुछ लोग मानते हैं कि छोटी बिल्ली जैसी दिखने वाली मास्क्ड पॉम सिवेट के जरिये यह वायरस इंसानों तक पहुंचा था। चीन के कुछ हिस्सों में सिवेट को काफी लजीज माना जाता है। ऐसा संदेह भी है कि इस वायरस को चीन के वुहान प्रांत की एक प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने ईजाद किया था। हालांकि डब्ल्यू.एच.ओ. ने इससे इनकार किया है।

जो भी हो, पशुजन्य रोगों पर आने वाली स्वास्थ्य एवं आर्थिक लागत दुखद रूप से बहुत अधिक है। दुनिया भर में करीब 60 करोड़ लोगों के वर्ष 2010 में खानपान से होने वाली जूनोटिक बीमारियों की चपेट में आने का अनुमान जताया गया था। उस साल जूनोटिक बीमारियों के 31 संक्रमणों में 4.20 लाख लोगों की मौत हुई थी। इन बीमारियों की सबसे ज्यादा मार अफ्रीका (43 फीसदी) पर पड़ी थी जिसके बाद दक्षिण-पूर्व एशिया (24 फीसदी) का नंबर था। भारत के विशेष संदर्भ में जारी 2015 के आंकड़े बताते हैं कि पांच साल से कम उम्र के करीब 1.05 लाख बच्चों की इन बीमारियों से मौत हो गई। सामुदायिक अध्ययनों को देखें तो हरेक भारतीय बच्चे को साल भर में दो-तीन बार डायरिया या अन्य खानपान-जनित बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इनमें से 4,00,000-5,00,000 बच्चों की मौत हो गई।

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खाद्य-जनित जूनोटिक बीमारियों से भारत को हर साल करीब 28 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है जो 2017 की कीमतों पर देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 0.5 फीसदी है। राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी (एन.ए.ए.एस.) के अध्यक्ष टी. महापात्र कहते हैं, खाद्य सुरक्षा अब केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य का ही मसला नहीं रह गया है। यह दूषित खाद्य उत्पादों के सीमापार आवाजाही की वजह से अंतरराष्ट्रीय खाद्य व्यापार के लिए भी चिंता का मुद्दा है। एन.ए.ए.एस. द्वारा जुलाई 2020 में खाद्य-जनित जूनोटिक बीमारियों पर लाए गए एक नीति पत्र के मुताबिक भारत में ये बीमारियां अधिकांशत: दर्ज भी नहीं हो पाती हैं और पहले ही बड़ा नुकसान झेल लेने के बाद दर्ज की जाती हैं। हालिया अनुमानों के मुताबिक 12 में से एक शख्स खानपान से जुड़ी संक्रामक बीमारियों की चपेट में आता है। इससे भी बुरा यह है कि जूनोटिक बीमारियों के मामले वर्ष 2030 तक 70 फीसदी बढऩे की आशंका है जिसके लिए मांसाहार का बढ़ता चलन जिम्मेदार होगा।

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एन.ए.ए.एस. का नीति पत्र खाद्य शृंखला के सभी चारों स्तरों- उत्पादन, प्रसंस्करण, परिवहन एवं विपणन पर जानवर-संबंधित खानपान के सुरक्षित निपटारे के लिए मानक परिचालन प्रक्रियाओं की कमी को इस भयानक स्थिति के लिए जिम्मेदार बताता है। इस लिहाज से पशु-पक्षियों के मांसाहार से संबंधित सभी स्तरों पर साफ-सफाई सुनिश्चित करने की एक समग्र व्यवस्था बेहद जरूरी है।

-सुरिंदर सूद

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