अमिताभ पाराशर

आमतौर पर हम जानते हैं कि अच्छी फ़िल्म बनाने की पहली शर्त अच्छी पटकथा यानि स्क्रीनप्ले होती है. लेकिन सिनेमा का कोई गम्भीर प्रेमी या छात्र उससे भी पहले की एक शर्त की बात करेगा. वह शर्त क्या है? अच्छी कहानी !

सबसे पहले आपके पास एक अच्छी कहानी चाहिए. लेकिन यह समझ कई लोगों के पास नहीं होती. वे अच्छी पटकथा की बात करेंगे लेकिन उससे पहले उस अच्छी कहानी की बात नहीं करेंगे जिसकी नींव पर अच्छी पटकथा का भवन खड़ा होना है.

‘कैश’, ‘दस’, ‘रा वन’ और जैसी सामान्य से भी औसत फ़िल्में बनाने वाले अनुभव सिन्हा ने जब ‘मुल्क’, ‘आर्टिकल 15’ , ‘थप्पड़’ जैसी संवेदनशील और बॉक्स ऑफ़िस पर सफल फ़िल्में बनाई तो लोगों को उनके इस ‘ट्रान्सफ़ोरमेशन’ पर ताज्जुब हुआ. कई लोगों ने उनकी बदलती सिनेमाई समझ की तारीफ़ की. लेकिन जो बात महत्वपूर्ण है, वो यह कि उन्होंने ख़ुद एक इंटरव्यू में कहा कि सालों बाद ये समझ में आया कि सबसे महत्वपूर्ण चीज़ कहानी होती है. अगर आपके पास एक अच्छी कहानी है तो आप एक अच्छी फ़िल्म बना सकते हैं लेकिन अगर आपके पास कहानी ही नहीं है और आप ज़बरन एक कहानी बनाकर उसपर एक धाँसू सी पटकथा लिख भी दें तो ख़राब फ़िल्म ही बनेगी.

यह एक सत्य है. लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष है कि ज़रूरी नहीं कि आप एक अच्छी कहानी या विषय पर एक अच्छी फ़िल्म बना डालें. हाल में कई ऐसी फ़िल्में आई जो अच्छे विषय या अच्छी कहानी की बावजूद ख़राब फ़िल्में थीं. आलोचकों ने धोया. बॉक्स ऑफ़िस पर भी पिटीं.

वैसे, हमारा मक़सद यहाँ सिर्फ़ उस शख़्सियत के बारे में बात करना है जिसे आजकल इस पूरे मामले का सबसे मज़बूत खिलाड़ी कहा जा रहा है. इस मामले यानि, अपनी फ़िल्मों की कहानी और पटकथा चुनने के मामले का.

यह सच है कि आयुषमान खुराना ने ‘विकी डोनर’ को नहीं चुना. ‘ विकी डोनर ’ ने आयुषमान खुराना को चुना. हिंदुस्तान टाइम्ज़ में छपी एक स्टोरी पर आधारित इस फ़िल्म की कहानी को लेकर जब शुजीत सरकार घूम रहे थे तो कोई अभिनेता इस स्पर्म डोनर वाले चरित्र की कहानी को करने के लिए तैयार नहीं था. शुजीत सरकार ने इस नए अभिनेता को चुना और उसके बाद जैसा कि सामान्य बोलचाल में कहा जाता है कि आयुषमान खुराना ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

फ़िल्म की सफलता का कोई फ़ार्मूला नहीं होता. लेकिन कुछ अभिनेताओं का ट्रैक रेकार्ड ऐसा रहा है कि वे ऐसी फ़िल्में चुनते हैं कि वे सफल होती हैं. अक्षय कुमार और आमिर खान के बारे में भी यही कहा जाता है कि उन्हें दर्शकों की नब्ज़ मालूम है. उन्हें मालूम है कि उन्हें क्या पसंद आएगा और क्या नहीं. लेकिन आमिर खान की पिछली फ़िल्म ‘ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान’ और अक्षय कुमार की ‘हाउसफ़ुल 4’ या लक्ष्मी बम जैसी फ़िल्में ना केवल ख़राब फ़िल्में थीं बल्कि बॉक्स ऑफ़िस और ओटीटी पर पिट भी गयीं.

अब अगर हम आयुषमान खुराना की बात करें तो इनका ट्रैक रिकार्ड लगातार सफल फ़िल्में देने का बन गया है. ज़रा नज़र डालिए. ‘दम लगा के हैसा’, ‘बरेली की बर्फ़ी’, ‘शुभ मंगल सावधान’, ‘अंधाधुन’, ‘बधाई’ हो, ‘आर्टिकल 15’ ‘ड्रीम गर्ल’, ‘बाला’..वग़ैरह..वग़ैरह ..सारी की सारी हिट! उनकी नई फ़िल्म अनुभव सिन्हा के साथ बन रही है जिसकी शूटिंग पूरी हो चुकी है.

सिर्फ़ हिट ही क्यूँ कहें? सारी की सारी ऐसी फ़िल्में जो अलग अलग विषयों पर बनी हैं, जिन्हें फ़िल्म आलोचकों ने सराहा, जो बॉक्स ऑफ़िस पर चलीं और जिनसे फ़िल्म इंडस्ट्री का भला हुआ. इसे इस तरह भी समझिए कि अगर कोई फ़िल्म पचास करोड़ लगाकर सत्तर करोड़ का व्यवसाय कर रही है तो वह घाटे का सौदा है लेकिन अगर कोई फ़िल्म पचीस तीस करोड़ लगाकर सौ करोड़ से ऊपर का कारोबार कर रही है तो निश्चित तौर पर यह लाभ का सौदा है.

हालाँकि, फ़िलहाल, बहुत सारी फ़िल्में सीधे ओटीटी पर रिलीज़ हो रही हैं. और अक्षय, शाहरुख़ और आमिर और सलमान खान के कुछ बड़ी फ़िल्में आने वाली हैं. अक्षय की सूर्यवंशी को कोरोना काल की पहली हिट बताया जा रहा है. लेकिन आयुषमान खुराना ने बॉलीवुड के कुछ बड़े सितारों की नींद ख़राब कर दी है , संदेह नहीं.

एक बात और ग़ौर करने वाली है. कुछ समय पहले तक कहानी और पटकथा पर पकड़ के मामले में आयुषमान खुराना के साथ जिस एक और अभिनेता का नाम आता था, वे राजकुमार राव थे. ‘बरेली की बर्फ़ी’ देखिए. किसी भी सीन में राजकुमार राव, आयुषमान खुराना से हल्के नहीं पड़े हैं लेकिन राव की कम से कम पिछली कुछ फ़िल्मों से उनका ट्रैक रिकार्ड कमज़ोर पड़ा है.

कहानियाँ, किसी दुकान या फ़ैक्टरी में नहीं मिला करती. कहानियाँ, लेखकों के पास होती हैं. मुंबई में छोटे शहरों से आकर संघर्ष करने वाले लेखक कहानियाँ लेकर आते हैं. उनमें से कुछ के पास अच्छी कहानियाँ होती हैं. लेकिन अगर उसकी पहुँच किसी स्टार तक नहीं है, तो स्टार तक अच्छी कहानियाँ कैसे पहुँचेंगी? आयुषमान खुराना ने इस सच्चाई को समझा है. वह लेखकों से, नए लेखकों से मिलता है. उनकी कहानियाँ सुनता है. अगर उसे जमती है तो वह उनसे दुबारा, तिबारा मिलता और बातें करता है. यह भी बहुत ज़रूरी है कि आप लोगों की बातें सुनो. उनके तर्क समझो. उनकी अच्छाई को सामने लाओ. उन्हें उनकी कमज़ोरी बताकर सुधारने कहो. लेकिन ज़्यादातर फ़िल्म स्टार और बड़े फ़िल्मकार तक संघर्षशील लेखकों की पहुँच ही नहीं होती.

हाँ, एक बात जो रह ही गयी कि ज़रूरी नहीं कि अच्छे विषय पर अच्छी फ़िल्में ही बने. खुराना की ‘बाला’ की लगभग सभी फ़िल्म आलोचकों ने जम कर तारीफ़ की . ‘बाला’ के पहले इसी विषय (उम्र से पहले गंजापन) ‘उजड़ा चमन’ आयी थी . विषय अच्छा था लेकिन फ़िल्म के लेखक और निर्देशक ने इसे औसत से भी नीचे की एक फ़िल्म बना दिया. आलोचकों ने फ़िल्म को धो डाला. लेकिन यहाँ यह भी बेमानी होगा कि आप खुराना की इस मज़बूत स्थिति के लिए सिर्फ़ उसी को माला पहना कर श्रेय दें और उन फ़िल्म लेखकों और फ़िल्मकारों को भूल जाएँ जो उसकी सफल फ़िल्में के पीछे थे या हैं. हम सब जानते हैं कि फ़िल्म विधा, कोई पेंटिंग या गायन जैसी विधा नहीं है जो आप अपने बूते साधते हैं. इस विधा में एक टीम होती है. और यह आपकी कला है कि आपने कैसे टीम चुनी है. अच्छी या बुरी.

तो कहने का मतलब यह कि आयुषमान खुराना के अगर सितारे बुलंद हैं तो इसके लिए भाग्य के सितारे की जो थोड़ी बहुत भूमिका हो, उसकी अपनी समझ की बड़ी भूमिका है.

 

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