Ajmer Sharif Dargah : सर्वधर्म सद्भाव और एकता की अद्भुत मिसाल

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Ajmer Sharif Dargah in hindi

लगभग 800 साल पहले एक दरवेश (Khwaja moinuddin chishti) सैकड़ों मील का कठिन सफर तय करता हुआ अल्लाह (Allah) का पैगाम लिए जब ईरान (Iran) से हिन्दुस्तान के अजमेर पहुंचा तो जो भी उसके पास आया उसी का होकर रह गया। उसके दर पर दीन-ओ-धर्म, अमीर-गरीब, बड़े-छोटे किसी भी तरह का भेदभाव नहीं था। सब पर उसके रहम-ओ-करम का नूर बराबरी से बरसता है । 8 सदी से ज्यादा वक्त बीतने के बावजूद राजा हो रंक, हिन्दू हो या मुसलमान, जिसने भी उसकी चौखट चूमी वह खाली नहीं गया। अजमेर शरीफ की दरगाह (Ajmer Sharif Dargah) सर्वधर्म सद्भाव की दुनिया में एक ऐसी मिसाल हैं जिसका कोई सानी नहीं है |

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Dargah Ajmer Sharif is a sufi shrine of sufi saint Khwaja Moinuddin Chishti

अजमेर में स्थित है ख्वाजा की दरगाह (Khawaja Gharibnawaz Dargah)

अजमेर शरीफ़ दरगाह (Ajmer Sharif Dargah) भारत के राजस्थान राज्य के अजमेर में स्थित प्रसिद्ध सूफ़ी संत मोइनुद्दीन चिश्ती (Moinuddin Chishti) (११४१ – १२३६ ई॰) की दरगाह है, जिसमें उनका मक़बरा स्थित है। अजमेर शरीफ के बारे में प्रख्यात अंग्रेज लेखक कर्नल टाड ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि ‘मैंने हिन्दुस्तान में एक कब्र को राज करते देखा है।‘ सूफ़ी संत मोइनुद्दीन चिश्ती (Moinuddin Chisti) को ख्वाजा साहब या फिर गरीब नवाज (Gareeb Nawaj) के नाम से भी जाना जाता है | दरगाह का बुलंद दरवाजा इस बात की गवाही देता है कि मुहम्मद-बिन-तुगलक, अल्लाउद्दीन खिलजी और मुगल अकबर से लेकर बड़े से बड़ा सम्राट भी यहां पर पूरे अदब के साथ सिर झुकाए ही आया है।


दरगाह के मुख्य गेट का नाम है निजाम गेट

अजमेर शरीफ़ दरगाह का मुख्य द्वार को निज़ाम गेट कहा जाता है क्योंकि 1911 में हैदराबाद के निज़ाम  मीर उस्मान अली ख़ाँ ने इसका निर्माण करवाया था। उसके बाद मुग़ल सम्राट शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया शाहजहानी दरवाज़ा और अंत में सुल्तान महमूद ख़िल्जी द्वारा बनवाया गया बुलन्द दरवाज़ा आता है, यहाँ प्रति वर्ष ख़्वाजा चिश्ती के उर्स के अवसर पर झंडा चढ़ाकर समारोह किया जाता है।

आपकी प्रेम का संदेश देती है दरगाह

यह दरगाह सिर्फ इस्लामी प्रचार का केंद्र नहीं अपितु हर मजहब के लोगों को आपसी प्रेम का संदेश देती है । इसकी मिसाल ख्वाजा के पवित्र आस्ताने में राजा मानसिंह का लगाया चांदी का कटहरा और ब्रिटिश महारानी मेरी क्वीन का अकीदत के रूप में बनवाया गया वजू का हौज है। देश की स्वतंत्रता के बाद पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने भी ख्वाजा के दरबार में मत्था टेका था और ख्वाजा साहब के एक खादिम परिवार को अकीदत से ‘महाराज’ नाम दिया था।  दरगाह में अब पहले से ज्यादा हिन्दू परिवार बिना किसी खौफ के रोजाना आते हैं।  ख्वाजा के दर पर माथा टेकने वालों में ज्यादातर हिन्दू होते हैं क्योंकि अनुमान के अनुसार प्रतिदिन 20 से 22 हजार लोग अजमेर आते हैं जिसमें से 60 प्रतिशत से ज्यादा गैर मुस्लिमों की संख्या होती है ।

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हिंदुस्तान में सूफीवाद के उद्गम का स्थान है यह दरगाह

इतिहास के मुताबिक भक्ति आंदोलन की तर्ज पर ही हिन्दुस्तान में सूफीवाद का उद्गम हुआ और ईरान से चलकर हिन्दुस्तान की सरजमीं पर धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए पहुंचे सूफी-संत हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के शहर अजमेर को अपना उपासना स्थल और कर्मभूमि बनाया तो उन्हें महसूस हुआ कि यहां एकतरफा धर्म नहीं चल सकता अत: यहां इस्लामी सिद्धांतों को यहां की धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर आगे बढ़ना होगा। इसी दूरदर्शीता को ध्यान में रखते हुए महान सूफी ख्वाजा ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने सांप्रदायिक एकता, भाईचारगी और आपसी प्रेम का पाठ पढ़ाने का मिशन लेकर सूफी परंपरा आरंभ की। दुनियाभर में धर्म के नाम पर संघर्ष और देशभर में सांप्रदायिक जहर फैलाने वाले तत्वों के बावजूद ख्वाजा की दरगाह में हिन्दू, जैन, सिख सभी तरह के विचार रखने वाले धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में अपनी अकीदत का नजराना आज भी पेश करते हैं।

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Title: ajmer sharif dargah dargah of khwaja moinuddin chishti ajmer rajasthan in Hindi  | In Category: धर्म कर्म dharm karam

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