आज जीवन के मायने बदलते हुए नज़र आ रहे हैं, जीवन भागदौड़ से भरा हुआ है, जिसमे शांतिपूर्वक जीवन-यापन करना एक सपने जैसा प्रतीत होता है। जिसका एक कारण समय-समय पर आने वाली कठिनाइयां भी हैं, जो जीवन में विषाद का कारण बनती हैं, जिससे अवसाद यानी कि डिप्रेशन का जन्म होता है। हम अपनी तरफ से कई कोशिश करते हैं, फिर भी कुछ न कुछ कमी रह जाती है ?

कहीं हमारे जीवन में डिप्रेशन को न्यौता हमारी कुंडली में बैठे ग्रह तो नहीं देते ? अब आप सोच रहे होंगे ऐसा कैसे सम्भव है तो आपको बता दें कि हमारे जन्म से मृत्यु तक कुंडली के ग्रह कई कारणों को जन्म देते हैं, जिसके चलते कभी जीवन में कई प्रकार की कठिनाइयों से दो-चार होने के बावजूद इंसान खुश रहता तो कभी छोटी सी बात भी मनुष्य को इतना उलझा देती है कि वो आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए मजबूर हो जाता है। आपको विस्तार से बताते हैं कि कैसे ऐसा सम्भव है।

यह कहना गलत नहीं होगा की किसी जातक की ख़ुशी और अवसाद के पीछे उसी की कुंडली में बैठे ग्रह है। ऐसे में राहु को विशेषतौर पर डिप्रेशन होने का प्रमुख कारण माना जाता है तथा इसके बाद शनि की भूमिका को अहम माना जाता है । हालाँकि कुछ जगह पर चन्द्र की स्थिति भी मायने रखती है । जहाँ राहु नकारात्मक चिं‍तन का कारक है, तो दूसरी तरफ शनि अत्यधिक चिंतन का कारक माना जाता है।

चूँकि चन्द्रमा मन का कारक है, अत: इसमें चन्द्रमा की भूमिका भी अहम रहती है। कुंडली का प्रथम भाव मस्तिष्क से सम्बंधित होता है, ऐसे में चन्द्रमा, राहु या शनि पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव न हो तो आपके ग्रह आपको अवसादग्रस्त बनाने में आगे रहते हैं । जिसके परिणामस्वरूप जातक बेहद कमजोर बन जाता है और छोटी-सी परेशानी पर अवसादग्रस्त हो जाता है।

कुंडली में लग्न या सप्तम भाव में यदि राहु स्थित है तथा ऐसी स्थिति में चन्द्र नीचराशिस्थ भाव का है तो भी व्यक्ति को अवसादग्रस्त होने से कोई नहीं रोक सकता । ऐसी स्थिति में कभी-कभी जातक माइग्रेन या उन्माद जैसे रोगों की गिरफ्त में भी आ जाता है । ऐसे में ग्रहों के दुष्प्रभावों से खुद को बचाने हेतु अनिष्ट ग्रहों की विधिवत पूजा करवाना ही सबसे सरल उपाय है।

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