सद्गुरु-स्तुति : कबीरदास द्वारा सद्गुरु और उनके पावन वचनों के महत्व का वर्णन

Kabirdas describes the significance of Satguru and his sacred forests
  • सदगुरु महाराज के श्रीमुख से प्रकट हुआ एक-एक शब्द जहाज की भांति विशाल होता है और उसका भेद कोई-कोई ही पा सकता है
  • बड़े विरले ही ऐसे लोग होते हैं जो उनके वचनों का मर्म समझ कर भव सागर से पार हो जाते हैं
  • कुम्हार अपने चाक पर गीली मिट्टी को अपने सधे हुए हाथों से आकार देता है और फिर उसे अनुभव की आंच में पकाकर मजबूत बनाता है

सद्गुरु शब्द जहाज है,

कोई-कोई पावे भेद।


समुंदर-बूंद एकै भया,

किसका करूं निषेद।।

कबीरदास जी सद्गुरु और उनके पावन वचनों के महत्व का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सदगुरु महाराज के श्रीमुख से प्रकट हुआ एक-एक शब्द जहाज की भांति विशाल होता है और उसका भेद कोई-कोई ही पा सकता है। जिस प्रकार जहाज में लोगों को अथाह सागर से पार कराने की क्षमता होती है, उसी प्रकार सद्गुरु के श्रीमुख से निकला एक-एक शब्द भले ही सरल व साधारण सा लगता हो, किंतु वह सामान्य नहीं होता, बल्कि उसमें ज्ञान-दर्शन और भक्ति का विशाल अर्थ और जीवन-मूल्यों का विस्तृत भाव समाहित रहता है। गुरु महाराजी का शब्द भवसागर से पार करा सकता है। बड़े विरले ही ऐसे लोग होते हैं जो उनके वचनों का मर्म समझ कर भव सागर से पार हो जाते हैं। और जिस प्रकार बूंद का अति लघु अस्तित्व विशाल समुद्र में मिलकर एक हो जाता है, बूंद और समुद्र में कोई अंतर नहीं रह जाता, बूंद भी तब समुंदर हो जाती है। कबीर जी कह रहे हैं-फिर किसको किससे अलग करूं।

यह भेद करना कठिन हो जाता है। तो ऐसा है सद्गुरु और उनके अमृत तुल्य शब्दों का गूढ़ रहस्य।

कबीर हम गुरु रस पिया,

बाकी रही न छाक।

पाका कलश कुम्हार का,

बहुरि न चढ़सी चाक।।

ज्ञान रूपी रस से भरे वचनों की तुलना ऐसे पवित्र और अमृत तुल्य पेय से की है, जिसको पीकर भक्तों के हृदय की प्यास तृप्त हो जाती है। जिस प्रकार कुम्हार अपने चाक पर गीली मिट्टी को अपने सधे हुए हाथों से आकार देता है और फिर उसे अनुभव की आंच में पकाकर मजबूत बनाता है जिससे उस पक्के बरतन को पुनः किसी चाक पर चढ़ाने आग पर तपाने की जरूरत नहीं होती है, उसी प्रकार से हमने भी गुरु महाराजी के अमृत वचनों का रसपान किया है, तब से अब किसी भी प्रकार की प्यास बाकी नहीं रही है। अर्थात हृदय में जो ज्ञान की प्यास लगी थी, वो पूरी तरह तृप्त हो गई है।


प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की होय। उत्तम प्रीति सो जानिये, सतगुरु से जो होय।। प्रीति अर्थात प्रेम के प्रकार पर चर्चा करते हुए कबीर जी कह रहे हैं कि इस संसार में तो प्रेम बहुतायत में उपलब्ध है। भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों के बीच अलग-अलग तरीके से प्रीति-संबंध हैं, फिर भी इस संसार में उत्कृष्ट प्रेम वही है जो कि सद्गुरु से होता है। सद्गुरु ही परमात्मा के सच्चे रास्ते पर ले जाते हैं। इसलिए एक शिष्य और सद्गुरु के मध्य जो प्रेम संबंध होता है, वही प्रेम इस संसार में अति उत्तम श्रेणी का है। इसलिए अपने गुरुमहाराज से सदैव सच्ची प्रीति रखनी चाहिए।

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Title: kabirdas describes the significance of satguru and his sacred forests in Hindi  | In Category: धर्म कर्म dharm karam

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