Ambubachi mela in hindi : पीरियड्स यानी (महावारी) एक ऐसा शब्द जिसे सुनकर सभ्य समाज का पुरुष वर्ग अगल बगल झांकने लगेगा। शायद यही एक वजह रही है हमारे तथाकथित समाज में महावारी के दौरान बहुत सारी कुप्रथाओं ने जन्म लिया, कहीं इन दिनों महिलाओं को पूजा पाठ से दूर रखा जाता है तो कहीं किचन के आसपास भी फटकने नहीं दिया जाता। जैसे महावारी होना प्राकृतिक नहीं बल्कि कोई छूत का रोग है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि (मेंसट्रुएशन) या मासिक धर्म पुरातन काल से एक खुशी का कारण था। मासिक धर्म की शुरुआत के बाद ही कोई लड़की किसी नए जीवन को जन्म दे सकती है। स्त्री की इसी शक्ति का परिचायक है अंबूबाची पर्व। माना जाता है कि इन दिनों मां रजस्वला होती है। असम के कामख्या मंदिर में यह पर्व हर वर्ष जून के महीने में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। देश और विदेशों से सैलानी और पर्यटक इस मेले की शोभा बढ़ाते हैं। आइए जानते हैं खुलासा डॉट इन में अंबूबाची (अंबुवासी) मेले के बारे में विस्तार से।

असम में है मां कामख्या का मंदिर

अंबूबाची : जब मां कामख्या के मंदिर में लगता है अद्भुत मेला Kamakhya Devi Temple Ambubachi Mela Things You Must Know
असम के गुवाहाटी में स्थित है मां कामख्या का मंदिर

कामख्या मां का मंदिर गुवाहाटी से करीब 8 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है। यह मंदिर मां शक्ति का मंदिर है। जो एक पहाड़ी पर निर्मित है। इस मंदिर का बहुत पौराणिक महत्व है। कामख्या देवी का मंदिर का बहुत तांत्रिक महत्व है।

51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण है कामख्या मंदिर

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51 शक्तिपीठों में कामख्या मंदिर को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है

 

पूर्वोत्तर के मुख्य द्वार कहे जाने वाले असम की राजधानी दिसपुर से करीब छह किलोमीटर की दूरी पर नीलांचल पर्वतमालाओं पर स्थित कामख्या मां के इस मंदिर को इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान पर माना जाता है। यहीं माता सती की महामुद्रा योनिकुण्ड विराजमान है।

माता सती की गिरी थी योनि

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कामख्या मंदिर का दृश्य

यूं तो कामख्या मंदिर को लेकर बहुत सी कहानियां है। माना जाता है कि जब महादेव सती की मृत देह को लेकर तीनों लोकों में इधर उधर भटक रहे थे, तभी विष्णु भगवान ने अपने सुदर्शन से सती की देह को 51 टुकड़ों में विभाजित कर दिया। जहां जहां सती के अंग गिरे कालांतर में उन्हीं स्थानों पर शक्ति पीठों की स्थापना हुई। असम के नीलांचल पर्वत पर माता सती की योनि गिरी थी। वहीं पर विश्वप्रसिद्ध कामख्या मंदिर की स्थापना हुई।

एक अन्य कथा के अनुसार नरकासुर नाम का एक राक्षस देवी कामख्या से प्रेम कर बैठा। वह उनसे विवाह करना चाहता मगर देवी उनसे विवाह नहीं करना चाहतीं थी और इसीलिए उन्होंने नरकासुर के सामने एक शर्त रखी कि यदि वह एक रात में ही मंदिर का निर्माण कर देगा तो देवी उसके साथ विवाह कर लेंगी। नरकासुर शर्त के लिए तैयार हो गया। माना जाता है कि नरकासुर ने मंदिर का निमार्ण करीब करीब पूरा कर दिया जब आखिरी सीढ़ी बनकर तैयार होती है उतने में ही देवी की कृपा से मुर्गे ने बांग दे दी। जिससे क्रोधित होकर नरकासुर ने मुर्गे को तो मार डाला मगर वह शर्त के अनुसार देवी से विवाह नहीं कर पाया।  बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि आज का कामख्या मंदिर नरकासुर द्वारा बनाया गया वही मंदिर है।

मत्सयेन्द्रनाथ ने भी की थी मां कामख्या की पूजा

 

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कामख्या मंदिर के प्रांगण में बनी मूर्तिया

लोगों की मान्यता है कि आदि गुरू मत्सयेन्द्रनाथ ने भी इसी स्थान पर वर्षों मां भगवती के दर्शन के लिए कठोर तप किया था। मां भगवती ने प्रसन्न होकर जहां उन्हें दर्शन दिए उसी स्थान को हम कामख्या मंदिर के नाम से जानते हैं।

17वीं सदी में हुआ मंदिर का निर्माण

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माना जाता है कि श्राप के कारण मूल मंदिर हो गया था नष्ट

 

लोगों का ये भी मानना है कि  नराकासुर के नीच कार्यों से रुष्ट होकर महर्षि वशिष्ट के श्राप के कारण मां कामख्या इस स्थान से लुप्त हो गई थीं और पौराणिक काल का मंदिर नष्ट हो गया था। बाद में बिहार के राजा नारानारायण ने 17वीं सदी में इस मंदिर की स्थापना करवाई थी।

कामदेव ने भी की थी साधना

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मां भगवती की एक अनोखी प्रतिमा

गुवाहाटी शहर के समीप ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में एक टापू के ऊपर महाभैरव उमानंद का मंदिर है। इसके बारे में कथा है कि इसी स्थान पर समाधिस्थ शिव को कामदेव ने बाण मारकर आहत किया था और समाधि से जागने पर महादेव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। इसी स्थान को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि नीलाचंल पर्वत पर ही कामदेव ने भगवती की साधना करके पुन: जीवनदान पाया था। कामदेव के कारण ही इस स्थान को कामरूप के नाम से भी जाना जाता है।

कामख्या मंदिर का तांंत्रिक महत्व

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कामख्या मंदिर के प्रांगण में स्थित अन्य मूर्तियां

चूंकि मां के 51 शक्तिपीठों में इस स्थान को सर्वोच्च माना जाता है इसीलिए तंत्र के लिहाज से भी इस मंदिर का बड़ा महात्मय है। सालभर देशविदेश के बड़े शक्ति के उपासक और तंत्र साधक इस मंदिर में दर्शन करने आते रहते हैं। माना जाता है कि इस मंदिर में माता के दर्शन मात्र से ही भक्तों के सभी संकट दूर हो जाते हैं।

अंबुबाची मेला

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अंबूवासी मेले के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़

संसार भर के सभी तांत्रिकों मांत्रिकों एवं सिद्ध पुरुषों को वर्ष भर इस पर्व का इंतजार रहता है। अम्बूवाची पर्व असल में इन सब लोगों के लिए किसी वरदान की तरह है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार अंबूबाची पर्व सतयुग में सोलह साल में एक बार , द्वापर में बारह साल में एक बार, त्रेता में सात साल में एक बार और कलियुग में हर साल जून माह में मनाया जाता है।

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देश विदेश से आते हैं लाखों श्रद्धालु

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पर्व के दौरान भक्तों का लगा रहता है तांता

कामख्या मंदिर में होने वाले अंबूबाची पर्व में देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी हजारों भक्त मां के दर्शन करने पहुंचते हैं। जहां एक ओर तांत्रिक और मांत्रिक इस पर्व के दौरान मंदिर के आसपास तरह तरह की साधनाएं और सिद्धियां प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। वहीं भक्त इसी समय कुमारी पूजन करके भी मां की कृपा प्राप्त करते हैं। लोगों की ऐसी मान्यता है कि अंबुबाची पर्व के दौरान की गई हर प्रकार की साधनाएं फलीभूत होती हैं। अंबूबाची के बारे में और जानने के लिए पढ़े हमारी पोस्ट अंबूबाची तांत्रिक और अघोरियों का कुंभ

मां होती हैं रजस्वला

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अंबूवासी पर्व के दौरान माता के भक्त करते हैं कुमारी पूजन

ऐसा माना जाता है कि अम्बूवाची पर्व के दौरान तीन दिनों तक मां भगवती रजस्वला होती है और मां भगवती के गर्भ गृह से निरंतर तीन दिनों तक जल के स्थान पर रक्त प्रवाहित होता रहता है। कलियुग में यह एक अद्भुत नजारा है।

स्वत: बंद हो जाते हैं कपाट

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पर्व के दौरान तीन दिन तक बंद रहते हैं गर्भगृह के कपाट

लोक मान्यता है कि अंबूवाची पर्व के दौरान मां भगवती के गर्भगृह के कपाट अपने आप ही बंद हो जाते हैं और इन दिनों दर्शन भी  निषेध माना जाता है।

सफेद कपड़ा हो जाता है रक्तवर्ण

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मां की पालकी निकालते साधु

मंदिर के कपाट बंद होने से पहले पुजारी गर्भगृह में एक सफेद कपड़ा बिछा देते हैं, जो मंदिर के कपाट खुलने पर अपने आप ही लाल हो जाता है।

कपड़े के टुकड़े को पाने के लिए मचती है होड़

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तंत्र की दृष्टि से है कामख्या मंदिर का विशेष स्थान

भक्तों का मानना है कि अंबूबाची पर्व के दौरान मां के योनि कुंड से पानी के स्थान पर रक्त निकलता है जिससे वह सफेद कपड़ा लाल हो जाता है। भक्तों में इस कपड़े को लेकर बहुत मान्यताएं है। पुजारी लोग कपड़े के टुकड़े करके भक्तों को प्रसाद के रूप में वितरित करते हैं जिसे पाने के लिए लोगों में होड़ मच जाती है। तांत्रिकों और साधकों का मानना है कि इस कपड़े का बड़ा महात्मय होता है, और तरह तरह की साधनाओं में इस लाल कपड़े की बड़ी महती भूमिका होती है।  लोगों का तो यह भी मानना है कि जिन महिलाओं को मासिक धर्म में परेशानी बनी रहती है या जो स्त्रियां मां नहीं बन पाती इस कपड़े के प्रभाव से उनको भी संतान की प्राप्ति हो जाती है।

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अघोरियों का रहता है जमावड़ा

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देश विदेश से आते हैं साधु

चूंकि कामख्या मंदिर से मत्सेयनद्रनाथ, गोरखनाथ, लोनाचमारी, ईस्माइलजोगी जैसे बड़े साधकों का नाम जुड़ा है जिन्होंने साधना के सर्वोच्च शिखर को प्राप्त किया। इसी लिए भारत ही नहीं बांग्लादेश, तिब्ब्त और अफ्रीका के तंत्र साधक भी अंबूबाची पर्व दौरान यहां पर दिखाई देते हैं।

साधना के लिए होता है सर्वश्रेष्ठ समय

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तंत्र साधनाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है अंबूवासी मेला

तांत्रिक और मांत्रिक अंबूबाची पर्व के काल को तंत्र के लिए सबसे उपयुक्त समय मानते हैं। साधकों का मानना है कि इस काल में की जाने वाली साधनाएं शीघ्र ही फलीभूत हो जाती हैं।

हल चलाना होता है वर्जित

बंगाल में ऐसा माना जाता है कि सूर्य के मृगशिरा नक्षत्र में जाने के बाद पहले तीन दिन के दौरान पृथ्वी रजस्वला होती है। बंगाल में यह काल रजोदर्शन काल के नाम से जाना जाता है और इस काल में बीज बोना और हल चलाना पूर्णत वर्जित माना जाता है।

कैसे जाएं कामख्या मंदिर तक

अगर आप ट्रेन से जा रहे हैं तो सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन हैं कामाख्या जंक्शन, जो की कामरूप जिले में स्थित है । इसके अलावा गुवाहाटी जंक्शन से भी आप कामाख्या मंदिर के लिए जा सकते हैं।

अगर आप हवाई यात्रा से जा रहे हैं तो बोरझार हवाई अड्डा सबसे नजदीक पड़ता है और दूसरा सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है बरपानी जो की कामाख्या जंक्शन से कुछ ही दूरी पर है ।

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