Osho Pravachan On Dharm and poltics in hindi

मेरी सारी निष्ठा व्यक्ति में हैः समाज में नहीं, राष्ट्र में नहीं, अतीत में नहीं, भविष्य में नहीं। मेरी सारी निष्ठा वर्तमान में है और व्यक्ति में है। क्योंकि व्यक्ति ही रूपांतरित होता है, समाज रूपांतरित नहीं होते। क्रांति व्यक्ति में होती है, क्योंकि जीवन के पास आत्मा है। जहां आत्मा है, वहां परमात्मा उतर सकता है।

भारत और अभारत, देश और विदेश की भाषा अधार्मिक है। यह मौलिक रूप से राजनीति, कूटनीति, हिंसा, प्रतिहिंसा, वैमनस्य, इस सबको तो परिलक्षित करती है-धर्म को नहीं, ध्यान को नहीं, समाधि को नहीं।

ध्यान क्या देशी और क्या विदेशी? प्रेम क्या देशी और क्या विदेशी? रंग लोगों के अलग होंगे, चेहरे -मोहरे भिन्न होंगे, आत्माएं तो भिन्न नहीं! देह थोड़ी-बहुत भिन्न हो सकती है, फिर भी देह का जो शास्त्र है, वह तो एक है और आत्मा जो कि बिल्कुल एक है, उसके क्या अनेक शास्त्र होंगे? आत्मा को भी देशों के खंडों में बांटोगे?

इस बांटने के कारण ही कितना अहित हुआ है! इस बांटने के कारण पृथ्वी स्वर्ग नहीं बन पाई, पृथ्वी नर्क बन गई। क्योंकि खंडित जहां भी लोग हो जाएंगे, प्रतिस्पर्धा से भर जाएंगे, अहंकार पकड़ लेगा-वहीं नर्क है।

धर्म को राजनीति से न बांधो। धर्म की राजनीति से सगाई न करो। धर्म का राजनीति से तलाक होना चाहिए। यह सगाई बड़ी महंगी पड़ी है। इसमें राजनीति छाती पर चढ़ गई और धर्म धूल-धूसरित हो गया।

धार्मिक व्यक्ति का पहला लक्षण है, वह सीमाओं में नहीं सोचता। जो असीम को खोजने चला है, वह सीमाओं में सोचेगे? फिर सीमाओं का कोई अंत है? भाषा की सीमा है, रंग की सीमाएं हैं, अलग-अलग आचरण, अलग-अलग मौसम-इनकी सीमाएं हैं। अलग-अलग परंपराएं अलग-अलग धारणाएं जीवन की-इनकी सीमाएं हैं। कितने धर्म हैं पृथ्वी पर-तीन सौ! और कितने देश हैं, और कितनी भाषाएं हैं-कोई तीन हजार! सीमाओं को सोचने बैठोगे तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी।

जो सोचते हैं संस्कृत ही देववाणी है, उनके लिए बुद्ध-महावीर जाग्रत पुरुष नहीं हैं क्योंकि वे संस्कृत में नहीं बोले। संस्कृत शायद जानते भी नहीं थे। लोकभाषा में बोले। जो उस दिन जनता की भाषा थी, उसमें बोले, पाली में बोले, प्राकृत में बोले। जो सोचता है अरबी ही परमात्मा की भाषा है, उसके लिए कुरान के अतिरिक्त कोई किताब परमात्मा की नहीं रह जाती। या कोई सोचता है कि हिब्रू उसकी भाषा है, तो बस बाइबिल पर बात समाप्त हो गई।

तुम क्यों इतनी छोटी सीमाओं में सोचते हो? यह भी अहंकार का ही विस्तार है। क्योंकि तुम भारत में पैदा हुए, इसलिए भारत महान! तुम अगर चीन में पैदा होते तो चीन महान होता। तुम्हें अगर बचपन में ही चुपचाप चीन में ले जाकर छोड़ दिया गया होता और तुम चीन में बड़े होते तो तुम बुद्ध, महावीर, कृष्ण, नानक, कबीर, इनका नाम कभी न लेते, तुम लेते लाओत्सु, कनफ्यूशियस, च्वांगत्सू , लीहत्सू, जो तुमने शायद अभी सोचे भी नहीं। या तुम्हें अगर यूनान में पाला गया होता तो तुम कहते सुकरात, अरिस्टोटल, प्लेटो, हेराक्लाइटस, पाइथागोरस। कबीर की कहां गिनती होती। कबीर की तुम्हें याद भी नहीं आती। कबीर को तुम जानते भी नहीं।

यहां भी तुम अगर हिंदू घर में पैदा हुए हो या जैन घर में पैदा हुए हो, तो एक बात, अगर मुसलमान घर में पैदा हुए हो, तो तुम सोचते हो, इनमें से तुम एक भी नाम ले सकते। भारत-भूमि में ही अगर मुसलमान होते, तो मोहम्मद, बहाऊद्दीन, बायजीद, अलहिल्लाज मंसूर, राबिया, ये नाम तुम्हें याद आते। ये सिर्फ हमारी सीमाएं हैं। इन सीमाओं को तुम सत्य पर मत थोपो।

यहां पत्रकार आते हैं-खासकर भारतीय पत्रकार-उनका पहला सवाल होता है कि यहां इतने विदेशी क्यों हैं, देशी क्यों नहीं? लेकिन जर्मन नहीं पूछता कि यहां इतने इटालियन क्यों हैं। इटालियन नहीं पूछता कि यहां इतने डच क्यों हैं। डच नहीं पूछता कि इतने जापानी क्यों है। यह मूढ़ता तुम्हीं को क्यों पकड़ती है? और विदेशी ज्यादा दिखाई पड़ेंगे-स्वभावतः उसमें डच सम्मिलित है, स्वीडिश सम्मिलित है, स्विस सम्मिलित है, फ्रेंच सम्मिलित है, इटालियन सम्मिलित है, जर्मन, जापानी, चीनी, रूसी, कोरियन, आस्ट्रेलियन, उसमें सारी दुनिया सम्मिलित है। और भारत तो फिर एक छोटी सी चीज रह गई। तो फिर तुमको अड़चन होती है कि यहां भारतीय कम क्यों है? जैसे तुम्हें कुछ हीनता का बोध होता है।

यह सारी पृथ्वी का आश्रम है। यह तो संयोग की बात है कि यह भारत की सीमा में पड़ रहा है, सिर्फ संयोग की बात है। पाकिस्तान में हो सकता है, यह ईरान में हो सकता है, यह कहीं भी हो सकता है। यह बिल्कुल सांयोगिक है इसका यहां होना या वहां होना।

मेरी देशना सार्वलौकिक है, सार्वभौम है। लेकिन हमें हर चीज में यह उपद्रव सिखाया गया है। और अच्छे-अच्छे लोग उपद्रव सिखा गए हैं। जिनको हम अच्छे लोग कहते हैं, उनमें भी हमारी मौलिक भूलों के आधार बने ही रहते हैं, मिटते नहीं। देशी-विदेशी का भाव जाता ही नहीं।
छोड़ो यह भाव! सब विदेशी या सब देशी-दो में से कुछ एक चुन लो। मैं दोनों में से किसी से भी राजी हूं। मगर खंड न करो, अखंड रहने दो।
अब तुम पूछ रहे हो! क्या आपकी संपदा से भारत-भूमि वंचित रह जाएगी?

फिर वही भारत-भूमि वापस आ जाती है। तुम्हारा दिमाग विक्षिप्त तो नहीं है? यह भारत भूमि, भारत-भूमि क्या तुमने लगा रखी है? भूमि को कुछ भी पता नहीं है। जरा भूमि से तो पूछो! जरा मिट्टी भारत की उठा कर और चीन की मिट्टी उठा कर और जापान की मिट्ठी उठा कर, जरा तय करने की कोशिश करो कि कौन सी मिट्टी भारत की है और तुम मुश्किल में पड़ जाओगे। मिट्टी मिट्टी है। पत्थर पत्थर है। पानी पानी है। आदमी आदमी है। पुरुष पुरुष हैं, स्त्रियां स्त्रियां हैं लेकिन हम विशेषणों के आदी हो गए हैं।

अब तुम्हें यह डर लग रहा है कि यहां इतने विदेशी आ रहे हैं, कहीं इसके कारण जो सत्य मैं तुम्हें दे रहा हूं, वह विदेशी न लूट ले जाएं।
यह सत्य कुछ लूटने वाली चीज थोड़े ही है। जो लेगा, उसे मिलेगा। और तुम इसी चिंतन में न पड़े रहो। तुम भी जल्दी करो। तुम भी पीयो। और जिनको प्यास है, वे आ रहे हैं। जिनको इस देश में प्यास है, वे भी आ रहे हैं। जिनको बाहर के देशों में प्यास है, वे भी आ रहे हैं।

मेरी सारी निष्ठा व्यक्ति में है, समाज में नहीं, राष्ट्र में नहीं, अतीत में नहीं भविष्य में नहीं। मेरी सारी निष्ठा वर्तमान में और व्यक्ति में है। क्योंकि व्यक्ति ही रूपांतरित होता है, समाज रूपांतरित नहीं होते। क्रांति व्यक्ति में होती है, क्योंकि व्यक्ति के पास आत्मा है। जहां आत्मा है, वहां परमात्मा उतर सकता है। समाज की कोई आत्मा ही नहीं होती, वहां परमात्मा की कोई संभावना नहीं है।

-ओशो

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