वास्तुशास्त्र के पांच आधारभूत तत्व हैं- पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि और आकाश। इन पांच तत्वों के बीच समन्वय स्थापित करना और इनकी गुणवत्ता का परिवार या व्यवसाय की समृद्धि के लिए ठीक ढंग से इस्तेमाल करना ही वास्तु सलाहकार का काम होता है। इन पांच तत्वों में से किसी एक का अधिक या कम होना घर-परिवार और व्यापार में कई प्रकार की मुश्किलें खड़ी कर सकता है। वास्तु आॅडिट के समय कन्सलटेंट का मुख्य काम यही होता है कि वह वास्तुदोष से जुड़ी ऐसी खामियों को पहचान कर उस तत्व को संतुलित करे, जिसकी वजह से उस घर में रहने वाले लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

चार दिशाएं, चार विदिशाएं
इन पांच तत्वों की अपनी-अपनी दिशाएं भी निर्धारित हैं, जिन पर इनका स्वामित्व होता है। वास्तुशास्त्र मंे दिशाओं का अत्याधिक महत्व है। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण ये चार दिशाएं हैं। इन चार दिशाओं से ही चार और दिशाएं बनती हैं, जिनको विदिशाएं, सब-डायरेक्शंस या ऐंग्यूलर डायरेक्शंस भी कहते हैं। दो मूल दिशाओं के मिलाने वाले स्थान को विदिशा कहते हैं। उदाहरणतः पूर्व और उत्तर दिशाएं जहां मिलती हैं, उसे ईशान कोण कहते हैं। इसी प्रकार आग्नेय कोण दक्षिण और पूर्व दिशाओं के मिलने से, वायव्य कोण उत्तर और पश्चिम दिशाओं के मिलने से तथा नैऋत्य कोण दक्षिण और पश्चिम दिशाओं के मिलने से बनने वाली विदिशाएं हैं। क्योंकि ये चार विदिशाएं दो मूल दिशाओं के मिलने का स्थान हैं, अतः इनमें दोनों मुख्य दिशाओं के गुण-अवगुण होते हैं यही कारण है कि घर या प्लाट में विदिशाओं की बहुत ही सावधानी से रक्षा करनी चाहिए।

वास्तु का ब्रह्मस्थान
प्लाॅट या मकान के बिल्कुल बीच के भाग को ब्रह्मस्थान कहते हैं। यह एक बिंदु नहीं बल्कि क्षेत्र या जोन होता है, जिसका एरिया मकान या प्लाॅट के साइज से मालूम किया जाता है। ब्रह्म स्थान पवित्र स्थान माना जाता है। यहां कूड़ा करकट झाडू-पोंछा या माॅप आदि नहीं रखने चाहिए। ब्रह्मस्थान में टाॅयलेट सर्वथा वर्जित है। यहां आग से संबंधित कामकाज भी नहीं हो सकते। इसलिए ब्रह्मस्थान में बना किचन अवश्य ही परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालेगा। विशेषकर परिवार का मुखिया लंबे समय तक ठीक न होने वाली अनेक बीमारियों का शिकार बन सकता है। ब्रह्मस्थान घर की नाभि है और यही कारण है कि यहां ऊंची और भारी वस्तुएं या फर्नीचर नहीं रखे जा सकते। आयुर्वेद में भी सलाह दी जाती है कि अपने नाभिस्थान को हल्का-फुल्का रखें, आसानी से पचने वाला खाना खाएं ताकि पाचन क्रिया ठीक बनी रहे और पूरे शरीर को स्वस्थ रखें। इसी प्रकार घर के नाभिस्थल को भी हल्का-फुल्का रखना चाहिए। यहां दीवारें, खंभे या सीढ़ियां हों तो यह स्थान बहुत ही भारी होकर अनेक बीमारियों का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। अगर घर का ब्रह्मस्थान बिल्कुल खुला है और उसके चारों तरफ कमरे बने हैं तो ऐसा घर भाग्यवान परिवार को ही मिलता है। आप पाएंगी कि पुरानी हवेलियों और महलों में ब्रह्मस्थान आकाश की ओर खुला होता था। पुरानी शैली के मकानों में ब्रह्मस्थान पर खुला आंगन जरूर होता था। खुला ब्रह्मस्थान अनेक अन्य वास्तुदोषों के कुप्रभाव को कम करने में सक्षम होता है। ऐसे घरों में रहने वाले स्वस्थ, खुशहाल और शांति से भरपूर जीवन व्यतीत करते हैं। खुला ब्रह्मस्थान फ्लैट्स में तो मिल ही नहीं सकता, अपने भूखंड पर बनाए हुए घर में भी अब खुला ब्रह्मस्थान रखना आउट आॅफ फैशन हो चुका है। खुले ब्रह्मस्थान से धूल-मिट्टी तो आती है इसके अलावा एयरकंडिशनिंग लोड बढ़ जाता है और सुरक्षा की समस्या भी बन सकती है। पर फिर भी इन समस्याओं के मुकाबले खुले ब्रह्मस्थान के गुण कहीं अधिक हैं।

पांच तत्वों का स्वामित्व
पृथ्वी तत्व का स्वामित्व नैऋत्य में, अग्नि का आग्नेय में, वायु का वायव्य में, जल का ईशान में और आकाश तत्व का स्वामित्व ब्रह्मस्थान में माना जाता है। इन चार विदिशाओं और पांचवे ब्रह्मस्थान में इन पांच तत्वों के गुणों के अनुरुप ही कार्य करने चाहिए। ईशान कोण में जल तत्व का स्वामित्व है इसलिए यहां अग्नि तत्व से संबंधित कोई भी कार्य करना पूरे परिवार के लिए हानिप्रद है। यहां किचन रखना, कपड़े प्रेस करने के लिए टेबल रखना, कपड़े प्रेस करने के लिए टेबल रखना, गीजर या बाॅयलर रखना हानिप्रद होता है। अग्नि तत्व और जल तत्व दो विपरीत गुणों वाले तत्व हैं इसीलिए इनका मिलन दोनों ही तत्वों को कमजोर करता है, अग्नि तत्व जल को नष्ट करता है और जल तत्व अग्नि को बुझाता है। अग्नि तत्व स्वास्थ्य का और जल तत्व सुख-शांति, समृद्धि और संपन्नता का कारक है। जल और अग्नि तत्वों के कमजोर होने से परिवार में स्वास्थ्य, समृद्धि और सुख शांति संबंधित कई समस्याएं आ जाएंगी। इसी तरह अन्य तत्वों की प्रकृति और उनके प्रभाव को ध्यान मंे रखते हुए ही घर का नक्शा बनाना चाहिए।

 

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