Vasuki Naag : क्यों लिपटे रहते हैं भगवान शिव के गले में वासुकि नाग

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Vasuki naag story in hindi: कौन है वासुकि नाग (Vasuki Naag) जो कभी समुद्र मंथन के समय पर्वत को बांधने वाली रस्सी बनते हैं, तो कभी त्रिपुरदाह के समय शिव (Shiva) के धनुष की डोर। क्यों आखिर वासुकि नाग भगवान शिव (Lord Shiva) के गले में लिपटे रहते हैं आइए जानते हैं खुलासा डॉट इन पर वासुकि नाग का रहस्य।

नागलोक के राजा वासुकि (Vasuki Naag), भगवान शिव के परम भक्त थे तथा पुराणों के अनुसार सर्वप्रथम शिवलिंग की पूजा का प्रचलन भी नाग जाति के लोगों ने ही शुरू किया था। भगवान शिव ने वासुकि की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपने गणों में शामिल कर लिया था और भगवान शिव के साथ हमेशा के लिए हो गये । महादेव का महामृत्यंजय मंत्र के जाप (Maha Mrityunjaya Jaap) करने से मिलती है अकाल माैत के भय से हमेशा के लिए मुक्ति।


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पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान मेरू पर्वत को मथने के लिए वासुकि नाग (Vasuki Naag) को ही रस्सी के रूप में प्रयोग किया गया था, जिसके पश्चात वासुकि का संपूर्ण शरीर लहूलुहान हो गया था। एक मान्यता और है कि जब वसुदेव भगवान श्री कृष्ण (Shri Krishan) को कंस की जेल से चुपचाप गोकुल लेकर जा रहे थे तो जोरदार बारिश के कारण यमुना नदी का पानी उफान पर था उस वक़्त वासुकी नाग ने ही श्री कृष्ण की रक्षा की थी।

हिन्दू ग्रंथो के अनुसार नागों की उत्पत्ति ऋषि कश्यप की पत्नी तथा दक्ष प्रजापति की कन्या कद्रू की कोख से हुई है, जिन्होंने हजारों पुत्रों को जन्म दिया था जिसमें प्रमुख अनंत (शेष), वासुकी,  तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख, पिंगला और कुलिक आदि नाग थे । सावन माह में शिव आरती (Shiv aarti) और शिव चालीसा (Shiva chalisa) के पाठ से होते हैं महादेव जल्द प्रसन्न।

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माना जाता है कि कश्मीर का ‘अनंतनाग’ इलाका नागों का गढ़ था व कांगड़ा, कुल्लू व कश्मीर सहित अन्य पहाड़ी इलाकों में नाग ब्राह्मणों की एक जाति अभी भी मौजूद है और ऐसा सुनने में आया है कि तिब्बती भी अपनी भाषा को ‘नागभाषा‘ कहते हैं।

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