सागर मंथन के बाद जब देवताओं और असुरों को चैदहवें रत्न के रूप में अमृत की प्राप्ति हुई तो उस पर अधिकार जमाने के लिए होड़ लग गई। इस मौके पर शची-देवराज पुत्र जयंत अमृत कलश को लेकर भागने लगा। उसे पकड़ने के लिए असुर भी दौड़े। इस छीना झपटी में अमृत की कुछ बूंदे प्रयाग, हरिद्वार नासिक और उज्जैन में गिर गईं। इन अमृत बिंदुओं का शोध है कुंभ पर्व। प्रयाग और हरिद्वार में इसे कुंभ कहते हैं, जबकि नासिक व उज्जैन में होने वाले अमृत पर्व को सिंहस्थ का नाम दिया गया है।

वस्तुतः आकाशीय नक्षत्रों की गणना से सिंहस्थ का निर्धारण होता है। सिंह राशि के गुरु में जब मेष का सूर्य होता है, तो उज्जैन में सिंहस्थ पर्व पड़ता है। महाकालेश्वर की नगरी में होने वाले इस महापर्व को इसलिए अन्य कुंभों से अलग माना जाता है क्योंकि यह दस योगों के बीच संपन्न होता है। यह दस योग हैं-वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, सिंह का उच्चतम गुरु, तुला का चंद्रमा, स्वाति नक्षत्र, सोमवार, व्यातिपात योग, पूर्णिमा की तिथि और कुशस्थली-उज्जैन तीर्थ। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माघ मास में सैंकड़ों बार, कार्तिक में हजार बार, वैशाख में करोड़ बार नर्मदा स्नान का जो पुण्य प्राप्त होता है वह कुंभ में स्नान कने से सहज ही मिल जाता है।
काल गणना के अनुसार ही प्रयाग ( इलाहाबाद), हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में कुंभ सूर्य और गुरु की गति से तय होता है। बृहस्पति 12 सालों में सूर्य की परिक्रमा पूरी करता है। इसलिए स्वाभाविक रूप से 12 साल, सूर्य और बृहस्पति का संबंध कुंभ से जुड़ जाता है। जब बृहस्पति और सूर्य मकरगत होते हैं तो प्रयाग ( इलाहाबाद) में संगम के तट पर कुंभ होता है। जब गुरु और सूर्य मेष राशि में होते हैं तो हरिद्वार में गंगा तट पर कुंभ होता है। बृहस्पति और सूर्य के सिंह राशि में होने पर गोदावरी के तट पर नासिक में कुंभ का आयोजन होता है। परंतु जब सूर्य तो मेष राशि में विचरण कर रहा हो और गुरु सिंह राशि में हो तो उज्जैन में महाकुंभ होता है। इसकी खासियत यह है कि इस पर्व में सूर्य व गुरु एक ही राशि में नहीं होते हैं, इसीलिए इसे महाकुंभ कहा जाता है। चूंकि यह योग गुरु के सिंह राशि में विचरण के समय होता है इसलिए इसको सिंहस्थ कहा जाता है। उज्जैन का सिंहस्थ इसलिए भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि अन्य स्थानों पर तो अमृत की बूंदें ही गिरी थीं, जबकि उज्जैन में देवताओं और दानवों के बीच इसका वितरण हुआ था। यहीं पर चोरी से अमृत पीने के कारण मोहिनी रूपधारी विष्णु ने राहु का सिर काट दिया था। विष्णु के मोहिनी रूप में अमृत वितरण के साथ देवताओं ने जब अमृत पिया तो वह समस्त प्राणिमात्र को जल, वायु प्रकाश, अग्नि, औषधियां और जीवन देने के लिए संकल्पबद्ध भी हुए थे। इसी स्थान पर राहु और केतु की सूर्य व चंद्रमा से दुश्मनी और ग्रहण की कथा भी जुड़ती है, इसलिए यहां का पर्व महापर्व कहा जाता है।

उज्जैन नगरी पूर्व काल से ही प्रसिद्ध रही है। यहां पर महाकालेश्वर का प्रसिद्ध दक्षिणामुखी ज्योतिर्लिंग तो है ही शक्तिपीठ हरसुंदरी देवी और कालभैरव भी प्रतिष्ठित हैं। श्रीकृष्ण और बलराम ने जिन संदीपनि ऋषि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की थी वह भी अविन्तकापुरी में ही है। यहीं पर कृष्ण और सुदामा की मित्रता हुई थी। इसे मंगल ग्रह की जन्मभूमि भी माना जाता है।

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