New Delhi 02 अक्टूबर (एजेंसी) 20 अगस्त 1947, पांच दिन पहले ही अस्तित्व में आई पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर कब्जे के लिए ऑपरेशन गुलमर्ग के नाम से साजिश रचना शुरू कर दी। योजना के मुताबिक 22 अक्टूबर को हथियारबंद कबाइलियों ने मुजफ्फराबाद पर हमला कर दिया। 26 अक्टूबर तक हालात ऐसे हो गए कि राजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। फौरन ही एयरलिफ्ट के जरिए कश्मीर पहुंची भारतीय सेना ने कबाइलियों के साथ पाकिस्तानी सेना को खदेड़ना शुरू कर दिया।इधर, बंटवारे के दौरान यह तय हुआ था कि बड़ा देश होने के नाते भारत पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपए देगा। भारत ने पाकिस्तान को 20 करोड़ की पहली किश्त दे दी थी, इस दौरान पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। भारत में सरकार से लेकर सेना को पता था कि अगर बचे 55 करोड़ रुपए पाकिस्तान को दिए गए तो उसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ युद्ध में होगा। नतीजतन भारत सरकार ने पाकिस्तान को दी जाने वाली दूसरी किश्त रोक दी।

तब लॉर्ड माउंटबेटन भारत के गवर्नर जनरल थे। उनका मानना था कि भारत को पाकिस्तान को उसके हिस्से का पैसा देना चाहिए, क्योंकि दोनों देशों के बीच यह समझौता हुआ है। महात्मा गांधी का भी मानना था भारत को समझौते के मुताबिक पाकिस्तान के हिस्से के पैसे देने चाहिए। यह उसकी नैतिक जिम्मेदारी है।

कई लोगों का कहना है कि महात्मा गांधी ने इसके लिए अनशन किया। हालांकि, अनशन की बात का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलता है। 13 जनवरी 1948 को गांधी ने प्रार्थना सभा में दोनों धर्मों के लोगों से बातचीत की, लेकिन उसमें 55 करोड़ रुपए का कोई जिक्र नहीं किया। 15 अगस्त को एक पत्रकार से बातचीत में भी उन्होंने 55 करोड़ का जिक्र नहीं किया। भारत सरकार की प्रेस विज्ञप्तियों में गांधी की ओर से पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने की मांग का कोई जिक्र नहीं है।

1953 में पाकिस्तान ने भारत से फिर से वो पैसे देने की मांग की, लेकिन तब कश्मीर के प्रधानमंत्री रहे बख्शी गुलाम मोहम्मद ने जवाब दिया कि पाकिस्तान के पास भारत की करीब 600 करोड़ की संपत्ति है, वो पहले उसका भुगतान करे। पंजाब राज्य सरकार ने कहा कि पाकिस्तान को जो पानी मिलता है उसका करीब 100 करोड़ का बिल पाकिस्तान पर बकाया है, अगर उसे पाकिस्तान चुकता करेगा तो भारत पैसे देगा। भारत ने पाकिस्तान की संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनने पर लगी साढ़े चार लाख की फीस भी अदा की थी। इन सभी वजह से दोनों देशों के बीच फिर पैसे का कोई लेन देन नहीं हुआ।

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