देश में गुर्दे संबंधी चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी है। दूसरी तरफ गुर्दे के रोगी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। आखिर क्यों बढ़ती जा रही है गुर्दे की बीमारियां ? प्रस्तुत है मूत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. नरेश पाल से बातचीत

मानव शरीर में गुर्दे का क्या कार्य है ?
शारीरिक क्रियाओं में गुर्दों के कई छोड़े-बड़े कार्य होते हैं, लेकिन इनका असल कार्य रक्त को छानकर अपशिष्ट पदार्थों को खून के जरिए बाहर फेंकना होता है। रक्त में मौजूद यूरिया और सिरेनाइनी तत्वों की मात्रा को यह एक निश्चित सीमा के बाद बढ़ने से रोकते हें। इसके अलावा रक्त में पाए जाने वाले एक महत्वपूर्ण हारमोन विटामिन डी एक्टिव का निर्माण भी गुर्दों की मदद से होता है। यह हारमोन हड्डियों को मजबूती प्रदान करने के लिए होता है। दोनां गुर्दे यही कार्य करते हैं।

क्या एक गुर्दे से भी काम चल सकता है?
निःसंदेह संभवतः प्रकृति ने इसीलिए दो गुर्दे दिए हैं कि यदि एक खराब हो जाए तो दूसरे से काम चलता रहे। लेकिन इसके लिए यह आवश्यक है कि खराब गुर्दे को निकाल देना चाहिए। अन्यथा उससे संक्रमण फैलने का खतरा हो सकता है।

गुर्दों में खराबी के क्या लक्षण हैं?
यदि किसी व्यक्ति को सामान्य अवस्था में रोजाना रात में सोने के बाद दो या तीन बार मूत्र त्याग के लिए उठना पड़ता है तो यह गुर्दों में खराबी के संकेत हैं, बशर्तें की उसने शराब या बीयर नहीं पी हो। शराब और बीयर से ज्यादा पेशाब आता है लेकिन वह बीमारी नहीं है। इसके अलावा हाथ, पैरों एवं मुंह में सूजन, रक्तचाप में बढ़ोत्तरी भी इसके प्रारंभिक लक्षण हैं।

गुर्दों की जांच का क्या तरीका है?
उपरोक्त लक्षण पाए जाने पर रोगी के रक्त और मूत्र के नमूने लिए जाते हैं जिनमें सिरेनाइनी, यूरिया तथा हीमोग्लोबिन की जांच की जाती है। यदि गुर्दे ठीक काम कर रहे हों तो सिरेनाइनी का प्रतिशत रक्त में 1.5 मिलीमीटर तथा यूरिया का प्रतिशत 15 से 40 मिलीलीटर होना चाहिए। अगर इससे ज्यादा मात्रा पायी जाती है तो उसका नतीजा यह निकलता है कि रोगी के गुर्दों में संक्रमण है। इसके बाद अल्ट्रासांउड जांच करायी जाती है जिससे स्थिति और साफ हो जाती है। गुर्दों के खराब होने की स्थिति में हीमोग्लोबिन की मात्रा में रक्त 11 प्रतिशत से कम हो जाती है।

गुर्दे की खराबी में हड्डियों की भी क्षति पहुंचती है?
निश्चित रूप से, चूंकि हड्डियां के लिए विटामिन डी एक्टिव हारमोन का निर्माण गुर्दों की मदद से ही होता है इसलिए गुर्दों की खराबी से हड्डियों को इस हारमोन की सप्लाई रूक जाती है तथा हड्डियां कमजोर पड़ने लगती हैं।

गुर्दों से संबंधित क्या-क्या प्रमुख बीमारियां हैं?
गुर्दों से संबंधित एक दर्जन से भी ज्यादा बीमारियां हैं लेकिन प्रमुख बीमारियां हैं गुर्दों का फेल हो जाना, गुर्दे में पथरी हो जाना या कोई अन्य संक्रमण हो जाना।

गुर्दे की बीमारियों की असल वजह क्या है ?
उच्च रक्तचाप, मधुमेह तथा चिकनाई युक्त खान-पान का अधिक सेवन। इन कारणों के चलते गुर्दों से जुड़े एक अंग ब्लडर को ज्यादा तेजी से काम करना पड़ता है। जिसमें कई बार दबाव ज्यादा पड़ने के कारण अचानक दोनों गुर्दे फेल हो जाते हैं। खाने की वस्तुओं में ज्यादा चिकनाई युक्त पदार्थों के शामिल किए जाने अथवा पानी में आयोडीन की मात्रा ज्यादा होने से गुर्दे की पथरी की घटनाएं बढ़ रही हैं। उत्तरी भारत में गुर्दे में पथरी के मामले बढ़ रहे हैं जिसकी मुख्य वजह दूध का अधिक सेवन और भूमिगत लवणायी युक्त जल का इस्तेमाल करना है।

एक गुर्दे के खराब होने के मामले ज्यादा होते हैं या दोनों गुर्दे के ?
एक अनुमान के अनुसार गुर्दों की बीमारियों के सालाना दो से ढ़ाई लाख नए रोगी आते हैं जिनमें पांच फीसदी मामले दोनों गुर्दे फेल होने के तथा दस फीसदी मामले एक गुर्दे की खराबी के होते हैं। पथरी के मामले चालीस फीसदी से भी अधिक हैं। पथरी में गुर्दा फेल नहीं होता बल्कि ऑपरेशन के जरिए पथरी को निकाल दिया जाता है। अमूमन पथरी एक गुर्दे में होती है। दोनों गुर्दे हालांकि एक साथ खराब नहीं होते हैं लेकिन लंबे समय से चले आ रहे संक्रमण या मधुमेह अथवा उच्च रक्तचाप के मरीज होने के कारण दोनों गुर्दे अचानक काम करना बंद कर सकते हैं। ऐसी घटनाएं हालांकि कम हैं लेकिन अब धीरे-धीरे बढ़ रही हैं।

दोनों गुर्दे फेल होने का खतरा सबसे ज्यादा किसे होता है?
मधुमेह रोगी, उच्च रक्तचाप के मरीज या एल्कोहल का अत्याधिक सेवन करने वालों में दोनों गुर्दे खराब होने की आशंका ज्यादा रहती है।

जब दोनों गुर्दे फेल हो जाएं तो क्या करना चाहिए ?
इसके दो तरीके हैं-एक रोगी को डायलिसिस पर रखा जाए और दूसरे उसमें एक गुर्दा प्रत्यारोपित किया जाए।

डायलिसिस पर रोगी को कितने समय तक रखा जा सकता है?
डायलिसिस में एक तरह से रोगी को मशीन के जरिए गुर्दे की सुविधा उपलब्ध करायी जाती है। जो कार्य गुर्दे का होता है वो रोगी से संबंध एक अत्याधुनिक मशीन करती है। ऐसी डायलिसिस हफ्ते में दो बार लेनी होती है जिस पर अमूममन चार से पांच हजार रुपए का खर्च आता है। यह सुविधा अस्पताल में उपलब्ध होती है और आजकल घर पर भी डायलिसिस की एक प्रक्रिया अपनायी जा रही है जो इससे कुछ कम खर्चीली है। अगर रोगी यह खर्च वहन कर सकता तो वह जब तक चाहे इसका इस्तेमाल कर सकता है।

प्रत्यारोपण के लिए रोगी ओर दानदाता में क्या समानताएं होनी चाहिए?
गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए जरूरी है कि गुर्दा दान करने वाले रोगी की आयु वर्ग, रक्त समूह वर्ग का हो और वह स्वस्थ हो साथ ही किसी प्रकार की बीमारी से ग्रस्त न हो। इसके अलावा भी रक्त आदि संबंध कई सुक्ष्म मैचिंग की जाती है।

गुर्दे की बीमारियों से बचाव का क्या तरीका है ?
जीवन शैली को सामान्य बनाना चाहिए तथा खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। चालीस साल की उम्र पार करने के बाद मूत्र और रक्त की उपरोक्त जांच अवश्य करा लेनी चाहिए। मधुमेह और उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्तियों को खासतौर पर यह जांच करानी चाहिए। गुर्दा रोगियों के बढ़ने की एक प्रमुख वजह यह है कि लोगों को बीमारी का पता तब चलता है जब गुर्दे पूरी तरह खराब हो चुके होते हैं।

 

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