सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है
इस शहर में हर शख्स परेशान क्यों है।
किसी शायर की ये मशहूर पंक्तियां महानगरों की जिंदगी का एक कड़वा अक्स प्रस्तुत करती हैं , दरअसल, तेज भागदौड़ वाली जिंदगी में लोग ऐसे पिस गए हैं कि वे इससे तालमेल नहीं बैठा पाते और अवसाद का शिकार हो जाते हैं। उनमें अवसाद से लड़ने की क्षमता भी शेष नहीं रह जाती। गांवों, छोटे शहरों और कस्बों में ऐसी घटनाएं इतनी ज्यादा नहीं होतीं। जानकारों की राय है कि समाज के पारंपरिक ढांचे में बदलाव इस समस्या का प्रमुख कारण है।
वरिष्ठ न्यूरोफिजिशियन डाॅ. राजीव मोतयानी कहते हैं, ‘वर्तमान समय में तनाव के कारणों में महत्वकांक्षा, प्रतियोगिता, नौकरी की चिंता आदि प्रमुख है। इसके अलावा उम्र का पड़ाव भी अहम मुद्दा है। एक उम्र के बाद यदि व्यक्ति से उसका कोई बहुत करीबी बहुत दूर चला जाए तो वह मौत को गले भी लगता सकता है। वहीं तनाव की शुरुआत पारिवारिक झगड़ा, आर्थिक तंगी, बढ़ती महंगाई और व्यक्तिगत नाकामियों से होती है।’ तनाव झेलने की क्षमता भी महानगरीय जीवनशैली में कम से कम होती जा रही है। तभी आत्महत्या की घटनाएं सालोंसाल बढ़ रही हैं। हर चार मिनट में एक आत्महत्या का मामला सामने आना इसी का प्रमाण है। दरअसल विकास के जिस आधुनिक माॅडल को हमने अपनाया है, उसने हमें अवसाद के अकेलेपन में छोड़ दिया है। व्यक्ति सामाजिक जिम्मेदारियों को भूलकर अपने-आप में ज्यादा सीमित हो गया है। पहले समाज में लोग-एक दूसरे की कुशल-क्षेम पूछते थे, सुख-दुख में शरीक होते थे। अब सब शहरीकरण की आंधी में उड़ गया है। खासकर महानगरों में यही स्थिति आज है।

महानगरों का जीवन इतना व्यक्तिपरक हो गया है कि लोगों के पास आस-पड़ोस, मित्रों-परिजनों की बात तो छोड़े, अपने एकल परिवार के सदस्यों के लिए भी समय नहीं रह गया है। विकास के आधुनिक माॅडल में, जिसमें अर्पाटमेंट और सोसायटी कल्चर का बोलबाला है, लोगों की दिलचस्पी सामुदायिक मेलजोल से परे नितांत व्यक्तिगत हो गई है। अगर कोई किसी को जिंदगी में दिलचस्पी लेने की कोशिश करता भी है तो उसे किसी की निजी जिंदगी में दखल या अनावश्यक दखल देना करार दिया जाता है। यही वजह है कि चाहकर भी लोग अपना दायरा स्वयं तक सीमित कर लेते हैं। अपना सुख-दुख न किसी से बांटते हैं, न किसी के सुख-दुख को सुनने-समझने की कोशिश करते हैं। किसी कई बार देखा गया है कि सड़क पर दुर्घटना हुई और घायल व्यक्ति वहीं घंटों पड़ा रहा। उस दरम्यान सैंकड़ों लोग वहां से आते-जाते, गुजरते रहे, देखते रहे, चुपचाप आगे बढ़ते रहे।

क्या किसी भी दृष्टिकोण से इसे इंसानियत के साथ जोड़कर देखा जा सकता है ?
फोर्टिस अस्पताल के मनोचिकित्सक डाॅ. समीर पारिख कहते हैं कि ‘आज के दौर में जीवनशैली तेजी से बदल रही है। एकल परिवार को बढ़ावा मिल रहा है, जिसके कारण सामाजिक सहयोग की व्यवस्था चरमरा गई है। एकल परिवेश में युवाओं में महत्वकांक्षा भी बहुत बढ़ गई है और उनमें सफलता पाने की चाह इतनी जल्दी पैदा हो रही है कि थोड़ी सी निराशा हाथ लगने पर वह तनाव के घेरे में आ जाते हैं। डिप्रेशन कायम रहता है, जो भविष्य में नकारात्मक विचारों को प्रबल करता है और लोग आत्महत्या तक करने पर उतारू हो जाते हैं।’ वैसे हाल में आप एक अध्ययन के नतीजे भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि महानगरों में लोगों की तनाव झेलने की क्षमता कम हुई है। इनके मुकाबले समाज के जुड़ाव के कारण गांवों या छोटे कस्बों के लोगों में तनाव का सामना करने की क्षमता ज्यादा होती है।

 

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