नई दिल्ली । (एजेंसी) Internet Ban in Delhi NCR News राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर, मुबारका चौक और नांगलोई में इंटरनेट की सर्विस अस्थाई तौर पर रोक दी गई है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह आदेश जारी किया है. आदेश के मुताबिक, आज रात 12 बजे तक इंटरनेट सेवा बंद रहेगी.

देश की राजधानी दिल्ली में किसान ट्रैक्टर रैली के दौरा हिंसा की घटना के बाद सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर, मुबारका चौक और नांगलोई में इंटरनेट की सर्विस अस्थाई तौर पर रोक दी गई है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह आदेश जारी किया है. आदेश के मुताबिक, मंगलवार रात 12 बजे तक इंटरनेट सेवा बंद रहेगी. अब सवाल उठता है कि इंटरनेट बंद करने का आदेश कौन देता है. आइए जानें इससे जुड़ी सभी बातें…

सरकार ने क्यों बंद किया इंटरनेट

किसी भी आंदोलन, दंगे और हिंसक घटनाओं के दौरान पुलिस-प्रशासन के पास यह अधिकार होता है कि वह उस एरिया का इंटरनेट बंद करा सके. ये इसलिए किया जाता है ताकि कोई अफवाह, फेक न्यूज और गलत संदेश प्रसारित न हो, जिससे स्थिति बिगड़ने की नौबत आए. यह कदम सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए किया जाता है, ताकि लोग गलत सूचनाओं के आधार पर पैनिक न हों.

इंटरनेट पर कैसे लगता है बैन?

केंद्र सरकार या फिर राज्य सरकार के गृह सचिव इंटरनेट बैन करने का आदेश देते हैं. यह आदेश एसपी या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी के माध्यम से भेजा जाता है. वो अधिकारी सर्विस प्रोवाइडर्स को इंटरनेट सर्विस ब्लॉक करने के लिए कहता है.

आदेश को कामकाजी दिन (वर्किंग डे) के भीतर केंद्र या राज्य सरकार के रिव्यू पैनल के पास भेजना होता है. इस रिव्यू पैनल को 5 वर्किंग डेज में इसकी समीक्षा करनी होती है. केंद्र सरकार के रिव्यू पैनल में कैबिन सेक्रेटरी, लॉ सेक्रेटरी और टेलिकम्युनिकेशन्स सेक्रेटरी होते हैं. वहीं, राज्य सरकार से दिए गए आदेश के रिव्यू पैनल में चीफ सेक्रेटरी, लॉ सेक्रेटरी और एक कोई अन्य सेक्रेटरी शामिल रहता है.

इसके अलावा इमरर्जेंसी की स्थिति में केंद्र या फिर राज्य के गृह सचिव द्वारा अधिकृत किए गए जॉइंट सेक्रेटरी इंटरनेट बैन करने के लिए आदेश दे सकते हैं. हालांकि, इसके लिए उन्हें 24 घंटे के भीतर केंद्र या राज्य के गृह सचिव से इसकी मंजूरी लेनी पड़ेगी.

साल 2017 से पहले नियम अलग थे?

भारत में इंटरनेट सेवाएं रोकने के लिए अभी दो कानूनी प्रावधान और एक नियमावली है. ये हैं- कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रसीज़र 1973 (सीआरपीसी), इंडियन टेलिग्राफ़ एक्ट 1885 और टेंपररी सस्पेंशन ऑफ़ टेलिकॉम सर्विसेज़ (पब्लिक इमर्जेंसी या पब्लिक सेफ़्टी) रूल्स 2017.

अगर आसान शब्दों में कहें तो साल 2017 से पहले देश में जिले के डीएम इंटरनेट बंद करने का आदेश देते थे. लेकिन साल 2017 में सरकार ने इंडियन टेलिग्राफ ऐक्ट 1885 के तहत टेम्प्ररी सस्पेंशन ऑफ टेलिकॉम सर्विसेज (पब्लिक इमरजेंसी या पब्लिक सेफ्टी) रूल्स तैयार किए. इसके बाद अब सिर्फ केंद्र या राज्य के गृह सचिव या उनके द्वारा अधिकृत अथॉरिटी इंटरनेट बंद करने का आदेश दे सकते हैं.

सीआरपीसी में ही ‘शांति बनाए रखने के लिए उठाने जाने वाले अस्थायी क़दमों’ में धारा 144 काफ़ी अहम है. इससे सरकारों को ‘ख़तरे और उपद्रव जैसी स्थिति से निपटने के उद्देश्य से त्वरित निदान के लिए आदेश जारी करने की शक्ति मिलती है.

इंटरनेट बंद करने से भारत को कितना नुकसान होता है?

इंटरनेट (Internet) बंद होने से सारी ऑनलाइन गतिविधियां रुक जाती हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल इंटरनेट बंद होने से भारत को 2.8 अरब डॉलर का नुकसान हुआ जो दुनिया में सबसे अधिक है. दुनियाभर में इंटरनेट बंद होने से कुल 4 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, उसका तीन-चौथाई हिस्सा भारत के हिस्से में आया.

ब्रिटेन के डिजिटल प्राइवेसी एंड सिक्योरिटी रिसर्च ग्रुप Top10VPN की रिपोर्ट के मुताबिक भारत को 2020 में इंटरनेट बंद होने से 2019 की तुलना में दोगुना ज्यादा नुकसान हुआ.

ग्लोबल कॉस्ट ऑफ इंटरनेट शटडाउन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने जो पाबंदियां 2019 में लगाई थी वह 2020 में भी जारी रही. भारत में 8927 घंटे तक इंटरनेट के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई गई जो दुनिया में सबसे अधिक है.

साल 2020 में भारत के कई जगहों पर कई बार इंटरनेट बंद किया गया. इंटरनेट शटडाउन की कई वजहें रहीं, लेकिन इससे नुकसान काफी हुआ है.

भारत में इंटरनेट शटडाउन के ज्यादा होने की वजह इस बार कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन भी रहा है. लगभग 7 महीने तक कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन रहा. सरकार ने आर्टिकल 370 हटाने के बाद कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन करने का फैसला किया था. इंटरनेट शटडाउन के मामले में भारत के बाद बेलारूस, यमन, म्यांमार और अजरबेजान रहे.

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