हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक अजित कुमार से शरद दत्त की बातचीत

आपने पहली बार कलम कब उठाई?
जब से सुध है, तब से मैं लिख रहा हूं। एक बार मेरी मां (सुमित्रा कुमारी सिन्हा) ने मुझसे पूछा कि क्या कर रहे हो? मैंने कहा, अपने जीवन की करुण कहानी लिख रहा हूं। करुण कहानी क्या होती है, मैं जानता भी नहीं था लेकिन घर में यह सब बहुत बोला जाता था। करुण कहानी शायद मैंने लिखी भी थी। तो मेरे घर में लिखने-पढ़ने का माहौल रहा। मेरे नाना-हिंदी प्रेमी थे। हिंदी में उनकी कई किताबें थीं। दो-तीन वर्ष तक निरालाजी भी मेरे घर पर रहे। मेरे आरंभिक गुरुओं में मां, निराला और नाना थे।

1958 में जब आपका पहला कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ आया, तब आपकी आयु 20 वर्ष रही होगी?
20 वर्ष तो नहीं। दरअसल स्कूल में मेरी उम्र लिखी गई थी 1933, जबकि मैं पैदा हुआ था। 1931 में। मेरी जो किताब आई, उसमें भी मैंने लिखा कि मेरी असली उम्र 9 जून 1931 है, जबकि सरकारी कागजों में 9 जून 1933 है।

तो कम उम्र में ही छपने-छपाने का सिलसिला शुरू हो गया ?
पहले संग्रह के तीन-चार वर्ष बाद दूसरी किताब छपी अंकित होने दो, जो अज्ञेय जी ने संपादित की थी। अज्ञेय जी ने तीसरा सतक, तारासप्तक और चैथा सप्तक आदि के अलावा एक बहुत अच्छी पुस्तक माला संपादित की थी-‘नए साहित्य-सृष्टा। इस श्रृंखला में तीन किताबें छपीं थीं। पहली रघुबीर सहाय की, दूसरी सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की और तीसरी मेरी। अंकित होने दो। तो तब से लिखने का क्रम जारी रहा। मेरी बहन कीर्ति चौधरी को उन्होंने तीसरा सप्तक में लिया था। अंकित होने दो की भूमिका में अज्ञेयजी ने लिखा, ‘सब लोग सोचते थे कि तीसरा सप्तक में अजित कुमार होंगे। मैं भी यही सोचता था लेकिन अंततः अजित कुमार की जगह उनकी बहन आई। फिर बाद में इस किताब की भूमिका में लिखा कि उनको लगता था कि अजित अच्छा लिखते हैं लेकिन कम लिखते हैं। जब उन्होंने मेरी बहुत-सी चीजें देखीं, तब उन्होंने लिखा कि ‘मैं अपनी भूल स्वीकार करता हूं। मेरे लिए अज्ञेय की उस भूमिका का बहुत महत्व है, क्योंकि मैं अपने अंतिम गुरुओं में अज्ञेय जी का ही नाम रखना चाहुंगा।

आपने अपनी मां सुमित्रा कुमारी सिन्हा और निराला जी को अपना गुरु माना?
एक गुरु का नाम रह गया, जो सचमुच मेरे गुरु थे। वे थे हरिवंशराय बच्चन। विदेश मंत्रालय में में मैंने उनके साथ काम किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मैं उनका शिष्य रहा था। 1982-83 में मैंने ‘बच्चन रचनावली का संपादन किया। राजकमल प्रकाशन की शीला संधुजी ने मुझसे कहा, ‘‘अजित, बच्चन जी से मेरा ‘बच्चन रचनावली का अनुबंध करा दो।’ बच्चन जी दिल्ली आए तो शीला जी मुझे साथ लेकर उनसे मिलने गई। बच्चन जी ने कहा, ‘देखो, जीवनकाल में कहां रचनावली छपती है’’ शीला जी ने कहा, ‘आपका तो अधिकांश लेखन पूरा हो गया है। बाद में अगर आप कुछ लिखेंगे तो अलग से छप जाएगा।’ बच्चन जी ने एक शर्त रखी कि अगर अजित लेकर आए हैं तो अजित ही खुद इसक संपादन करें।

आपने बच्चन जी पर एक पुस्तक लिखी जिसे आप बच्चन जी को दिखाने के लिए ले गए थे…

हम लोग दोपहर के खाने के दौरान रोज मिलते थे आधे-एक घंटे। तब वे मुझसे जो गपशप किया करते थे वह मैं लिख लिया करता था, जिसकी उन्हें जानकारी नहीं थी। जब मैं विदेश मंत्रालय छोड़कर किरोड़ीमल काॅलेज में पढ़ाने के लिए आया तो मैंने इसकी टाइप की हुई सामग्री उनको दी। उन्होंने जगह-जगह पेंसिल से निशान लगाए और पांडुलिपि मुझे वापस कर दी। उसी साल अमिताभ भी किरोड़ीमल काॅलेज से पढ़कर निकले थे। पांडुलिपि वापस करने के कुछ दिन पहले अमिताभ ने मुझसे कहा, ‘‘आपको जानकर खुशी होगी कि पिताजी ने आत्मकथा लिखनी शुरू कर दी है। इस बात से मुझे बहुत शांति मिली कि एक तरह से मेरी पांडुलिपि ने उत्प्रेरक का काम किया। बच्चन जी नहीं चाहते थे कि वह किताब छपे। उन्होंने मुझे चिट्ठी लिखी कि यह छपने योग्य नहीं है। मैंने भी कहा कि मैंने यह प्रकाशित करवाने के लिए नहीं लिखी थी। यह किस्सा 1962 का है और यह किताब 2009 में प्रकाशित हुई। 1998-99 में जब मैं मुंबई गया, तब तक उनकी आत्मकथा के चारों खंड पूरे हो चुके थे। तब बच्चन जी और तेजी बच्चन जी ने कहा था कि अगर अब मैं चाहूं तो वह किताब छपवा सकता हूं लेकिन वह किताब मैंने तब भी प्रकाशित नहीं की।

आप कविता, गद्य, आलोचना के अलावा यात्रा-संस्मरण भी लिखते हैं।

दरअसल मैं कविता, कहानी, उपन्यास पर एक ही समय में सोच सकता हूं। अपने पहले यात्रा वृतांत ‘सफर झोली में’ मैंने ऐसी ही कोशिश की कि वह आलोचना भी हो, कविता भी हो, उपन्यास भी हो, कथा भी हो और उसमें जगहों का वर्णन भी हो। यानी एक मिली-जुली विधा। हम एक ऐसे युग में रह रहे हैं , जहां विधाएं अपने अनुशासन को तोड़ रही हैं। ऐसे में कोई निरा कवि, निरा उपन्यासकार होकर नहीं रह सकता। तो मैं अब एक ऐसी विधा की तलाश में हूं, जिसमें सब कुछ एक साथ बन सके।… मेरा अब मन है कि एक पुस्तक बच्चनजी पर लिखूं। 1962 के बाद उनका और मेरा जो सपर्क रहा उस पर। किताब का नाम रखूंगा। गुरुवर बच्चन से दूर। उनसे दूर हो गया लेकिन उनके पास भी रहा।

आप सबसे ज्यादा सहज किस विधा में महसूस करते हैं, कविता में गद्य में?
सहज तो मैं महसूस करता था कविता में ही, लेकिन मैंने देखा कि मेरी कविता में बहुत से लोगों को रुचि नहीं है। मुझे महसूस होता है कि जीवन का जितना अनुभव लिखने के लिए होना चाहिए उतना अनुभव मैं कर नहीं पाया हूं। 16 साल उम्र में तो सभी कवि हो सकते हैं लेकिन अगर कोई 50 की उम्र में भी कवि बने रहना चाहता है तो उसको जीवन की और अधिक पड़ताल करनी चाहिए, अपने अनुभव को और अधिक समृद्ध बनाना चाहिए। मैं सोचता हूं कि मुझे गद्य में अधिक सुविधा होती है। कंप्यूटर आने के बाद गद्य-लेखन मुझे और भी अधिक सुविधापूर्ण मालूम होता है। कविता तो नहीं लिख सकता कंप्यूटर पर, लेकिन मैंने सुना है कि बाहर बहुत से लोग कंप्यूटर पर कविता लिखते हैं और कभी-कभार तो कंप्यूटर भी खुद ही कविता लिख देता है।

 

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