मेरी पांडुलिपि ने बच्चनजी को आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित किया-अजित कुमार

आपने अपनी मां सुमित्रा कुमारी सिन्हा और निराला जी को अपना गुरु माना?
एक गुरु का नाम रह गया, जो सचमुच मेरे गुरु थे। वे थे हरिवंशराय बच्चन। विदेश मंत्रालय में में मैंने उनके साथ काम किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मैं उनका शिष्य रहा था। 1982-83 में मैंने ‘बच्चन रचनावली का संपादन किया। राजकमल प्रकाशन की शीला संधुजी ने मुझसे कहा, ‘‘अजित, बच्चन जी से मेरा ‘बच्चन रचनावली का अनुबंध करा दो।’ बच्चन जी दिल्ली आए तो शीला जी मुझे साथ लेकर उनसे मिलने गई। बच्चन जी ने कहा, ‘देखो, जीवनकाल में कहां रचनावली छपती है’’ शीला जी ने कहा, ‘आपका तो अधिकांश लेखन पूरा हो गया है। बाद में अगर आप कुछ लिखेंगे तो अलग से छप जाएगा।’ बच्चन जी ने एक शर्त रखी कि अगर अजित लेकर आए हैं तो अजित ही खुद इसक संपादन करें।

आपने बच्चन जी पर एक पुस्तक लिखी जिसे आप बच्चन जी को दिखाने के लिए ले गए थे…


हम लोग दोपहर के खाने के दौरान रोज मिलते थे आधे-एक घंटे। तब वे मुझसे जो गपशप किया करते थे वह मैं लिख लिया करता था, जिसकी उन्हें जानकारी नहीं थी। जब मैं विदेश मंत्रालय छोड़कर किरोड़ीमल काॅलेज में पढ़ाने के लिए आया तो मैंने इसकी टाइप की हुई सामग्री उनको दी। उन्होंने जगह-जगह पेंसिल से निशान लगाए और पांडुलिपि मुझे वापस कर दी। उसी साल अमिताभ भी किरोड़ीमल काॅलेज से पढ़कर निकले थे। पांडुलिपि वापस करने के कुछ दिन पहले अमिताभ ने मुझसे कहा, ‘‘आपको जानकर खुशी होगी कि पिताजी ने आत्मकथा लिखनी शुरू कर दी है। इस बात से मुझे बहुत शांति मिली कि एक तरह से मेरी पांडुलिपि ने उत्प्रेरक का काम किया। बच्चन जी नहीं चाहते थे कि वह किताब छपे। उन्होंने मुझे चिट्ठी लिखी कि यह छपने योग्य नहीं है। मैंने भी कहा कि मैंने यह प्रकाशित करवाने के लिए नहीं लिखी थी। यह किस्सा 1962 का है और यह किताब 2009 में प्रकाशित हुई। 1998-99 में जब मैं मुंबई गया, तब तक उनकी आत्मकथा के चारों खंड पूरे हो चुके थे। तब बच्चन जी और तेजी बच्चन जी ने कहा था कि अगर अब मैं चाहूं तो वह किताब छपवा सकता हूं लेकिन वह किताब मैंने तब भी प्रकाशित नहीं की।

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Title: interview of famous indian writer ajit kumar by sharad dutt in Hindi  | In Category: साक्षात्कार interview

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