देश प्रेम के साथ अब पैसा भी महत्वपूर्ण हो गया है: जफर इकबाल

1956 के बाद हाॅकी के खेल में काफी बदलाव आया। 28 साल के लंबे स्वर्ण काल के बाद ये कैसे बदलाव थे ?

1956 तक तो हम लगातार चैंपियन रहे। उसके बाद भी हमारा काफी दबदबा था। 1960 का ओलपिंक भी हम लोग जीत सकते थे, पर बदकिस्मती से एक ही बाॅल आई हमारी तरफ और वह गोल हो गया, अन्यथा उस गेम में भारतीय टीम पूरी तरह हावी थी। 1964 में हमने फिर ओलंपिक जीता। 1968 में जब हमारी टीम थर्ड आई तो हमें कांस्य पदक मिला। उस जमाने में इस चीज को बड़ा बुरा माना जाता था कि पहले गोल्ड मेडलिस्ट थे और अब ब्रोंज मेंडलिस्ट हो गए। हमारे हाॅकी प्लेयर इधर-उधर मुंह छुपाते फिरते थे। सबसे बड़ा धक्का हमें 1976 में पहुंचा, जब विश्व हाॅकी में एस्ट्रोटर्फ आया। हमने इसका काफी विरोध किया। यूरोपियन खिलाड़ी तो शारीरिक तौर पर काफी मजबूत होते हैं और एस्ट्रोटर्फ में उन्हें काफी फायदा नजर आया। अगर वे इसमें भी हमसे हारते रहेंगे तो फिर वे वापस ‘ग्रास’ पर आ जाते। हमने 1975 का वर्ल्डकप जीत, पर 1976 में एस्ट्रोटर्फ पर हम हार गए, जबकि हमारी टीम वही थी जो 1975 वर्ल्डकप में थी। फिर हम कई बार वर्ल्डकप में दूसरे नंबर पर रहे।


क्या कारण है कि बीजिंग ओलंपिक में हमारी टीम ‘क्वालीफाई’ भी नहीं कर पाई?

यह तो बहुत बड़ा सदमा हिंदुस्तानी टीम को लगा। आजकल का जमाना पैसे का है। यह जमाना पहले नहीं था। पहले लोग इस चीज़ को महत्व देते थे और यह भावना रहती थी कि वे देश के लिए कुछ कर रहे हैं, लेकिन अब इस भावना में पैसा जुड़ गया है। मैं यह नहीं कह रहा कि देश प्रेम की भावना खत्म हो गई है, बल्कि यह कह रहा हूं कि उसमें अब पैसा भी शामिल हो गया है। जैसा कि क्रिकेट के साथ हुआ। मैं कहता हूं कि अगर आप युवाओं को हाॅकी की तरफ आकर्षित करना चाहते हैं तो उनके प्रोत्साहन के लिए भी कुछ होना चाहिए।

अभी हाल ही में जब हाॅकी टीम जीत कर आई तब उसे जो इनाम की राशि दी गई, उसे लेकर भी काफी विरोध हुआ। आपको नहीं लगता कि यह बहुत शर्मनाक है कि हमारा यह राष्ट्रीय खेल हाॅकी फेडरेशन की पाॅलिटिक्स में कहीं फंस गया है, जिसकी वजह से इसके स्तर में गिरावट आई है ?

मेरा मानना है कि जिस खेल की व्यवस्था में उस खेल की खिलाड़ी ही मौजूद न हों तो वह कैसे चलेगा? उस खेल की भावना को कौन समझेगा? अगर फेडरेशन के अंदर हमारा कोई रोल ही नहीं है तो सब कुछ चलना मुश्किल है। एक बात और मैं कहूंगा कि देश का राष्ट्रीय खेल होने के नाते कभी खिलाड़ियों को सामने नहीं आने दिया गया। हमेशा उन्हें दबा कर रखा गया। आखिर खिलाड़ियों ने ही यह आवाज उठाई कि यह 25,000 रुपये कम हैं। तब लोगों ने भी उनका साथ दिया। यह जरूरी है कि जो उनका हक है वह उन्हें मिलना ही चाहिए।

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Title: interview of indian hockey team captioan zafar iqbal by sharad dutt in Hindi  | In Category: साक्षात्कार interview

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