अमेरिका में भी दीवाने हैं ठुमरी के: कुमुद दीवान

आपने यह कब फैसला किया कि आप ठुमरी ही गाएंगी ? इसकी शुरूआत कब हुई?

जब तक मैं काॅलेज आई तब तक मुझे ठुमरी सुनने का चस्का-सा लग गया था। मैंने काॅलेज में शांति हीरानंद जी से संगीत सीखना शुरू कर दिया था, जो बेगम अख्तर की शिष्या रह चुकी हैं। उनसे मैंने लखनऊ की ठुमरी और बेगम अख्तर की कुछ बंदिशें सीखीं। बेगम अख्तर की गायकी का एक जादू-सा मेरे ऊपर रहा, लेकिन यह काॅलेज की बात थी। उसके बाद मैंने सिटी बैंक की नौकरी ज्वाइन कर ली। तब तक यह सोचा ही नहीं कि कभी संगीत मेरा करिअर होगा। फिर मैं बहुत व्यस्त हो गई। मेरी शादी हो गई। पूरे होशो-हवास में सबसे पहले सन् 2000 में मैंने निर्णय लिया कि मैं ठुमरी ही सीखुंगी, क्योंकि मेरी आवाज उसी के लिए ठीक थी, तब तक भी मैंने परफाॅर्मेंस के बारे में नहीं सोचा था।


आप एक जाने-माने बैंक में काम करती थीं। आपने ‘बिजनेस स्टडी’ में पीएचडी भी किया। आखिर आपने बिजनेस और कला के बीच तालमेल कैसे पैदा किया?

मुझे नहीं पता। मैं जब सिटी बैंक में काम करती थी तो कहा करती थी कि मेरे अंदर एक ‘एमसीबी’ फिट है जो शाम को 6 बजे के बाद ही अपने आप डाउन हो जाता है और मेरे अंदर का कलाकार जाग जाता है। घर पहुंचकर संगीत का सिलसिला जारी रहता था। कंसर्ट भी सुना करती थी। ये सब मेरे अंदर शायद जन्मजात था।

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Title: interview of kumad deewan by sharad dutt in Hindi  | In Category: साक्षात्कार interview

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