अमेरिका में भी दीवाने हैं ठुमरी के: कुमुद दीवान

आपके पति ने कभी इस चीज को लेकर कुछ कहा या उनको भी संगीत का शौक है?

ये चीजें माहौल से पैदा होती हैं, लेकिन उनको फिल्म संगीत और ‘फ्यूजन संगीत’ का शौक जरूर है। कुल मिलाकर संगीत का बीज रहना चाहिए वही बहुत है। मैं तो कहूंगी कि फिल्म संगीत ने संगीत की बहुत सी विधाओं को बचा लिया। ठुमरी भी उनमें एक है।


आपने सन् 2000 में ठान लिया था कि आप ठुमरी ही गाएंगी। उसके बाद आपने बाकायदा इसकी ट्रेनिंग भी ली। फिर आपने जब शुरुआत की तो अपना गुरु किसे बनाया?

सन् 2000 में मेरी मुलाकात बनारस के बुलानाथ मिश्रा जी से हुई, जो आॅल इंडिया रेडिया में जाॅब करते हैं। उनसे मैंने ठुमरी की तालीम हासिल की। कभी ‘परफाॅर्म’ करूंगी, इसका न तो इरादा था न ही कभी सोचा था। बस पंसद थी। सब कहते थे कि तुम्हारी आवाज ठुमरी के लिए बहुत अच्छी है। कुछ लोगों ने कहा कि आपकी आवाज सिद्धेश्वरी देवी और रसूलन बाई जैसी है। पिछले तीन-चार सालों से पद्मश्री पंडित छन्नूलाल जी मेरे गुरु हैं। वे ठुमरी सम्राट हैं। ख्याल से भी ऊपर का दर्जा उन्होंने ठुमरी को दिया है। गुरुजी कुछ ऐसी बंदिशें गाते हैं जो और कोई नहीं गाता। मैं अपने आपको बहुत सौभाग्यशाली मानती हूं कि मुझे उनसे सीखने का मौका मिला। गुरुजी के गाने में एक जादुई चमत्कार है। अगर उसका एक भी अंश मुझमें समा गया तो मैं अपने आपको धन्य समझूंगी।

अगर हम थोड़ा-सा पीछे जाकर देखें तो एक वक्त ऐसा आया था कि ठुमरी लुप्त हाती जा रही थी, लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षों में ठुमरी की मांग एकदम से बढ़ गई है। ठुमरी फेस्टिवल होने लगे हैं। आप खुद भी ऐसे आयोजन कर रही हैं। इसका मूल कारण क्या है ?

ख्याल और वाद्ययंत्रीय शास्त्रीय संगीत की गायकी तो कायम थी ही, लेकिन एक दौर ऐसा भी आया, जिसमें गजल बहुत मशहूर हो गई थी और ठुमरी पूरी तरह लुप्त हो गई थी। इसकी पुरानी पीढ़ी पूरी तरह खत्म हो गई थी। एक-दो ही प्रतिष्ठित कलाकार बचे थे। ठुमरी में महारत हासिल होने के बावजूद हमारे पंडित छन्नूलाल मिश्र का पिछले दस सालों में ही नाम हुआ। मैं तो कहूंगी कि ठुमरी को पुनः स्थापित करने में, लोगों को ठुमरी के प्रति आकर्षित करने में उनका बहुत बड़ा हाथ रहा है।

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Title: interview of kumad deewan by sharad dutt in Hindi  | In Category: साक्षात्कार interview

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