कुमुद दीवान भारत की एक मशहूर ठुमरी गायिका हैं। उन्होंने एकल संगीत के देश में और विदेशों में अनेको प्रोग्राम किए। कुमुद दीवान को भारत की नई पीढ़ी प्रमुख कलाकार के रूप में माना जाता है। उन्हें संगीत के क्षेत्र में प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी अवार्ड 2010 प्राप्त हुआ है। इन्हीं मशहूर ठुमरी गायिका से शरद दत्त की खास बातचीत

कुमुद जी, आपका पारिवारिक परिवेश क्या रहा?

मेरा जन्म किसी संगीतघराने में नहीं हुआ। मैं किसी घराने से ताल्लुक नहीं रखती थी। मेरे परिवार में शिक्षा-दीक्षा को बहुत अहमियत दी जाती थी। मेरे पिता कहते थे कि मैं अपनी बेटी को बेटों से ज्यादा पढ़ाऊंगा। मेरे घर में साहित्य और संगीत का माहौल था। मेरे पिता को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बहुत शौक था। वे खुद भी बांसुरी बजाते थे। प्रारंभिक राग उन्हें मालूम थे। 10 साल की उम्र में स्कूली शिक्षा के अलावा मेरी समानांतर शिक्षा संगीत में हुई। मेरी सबसे पहली गुरु थी श्रीमती अणिमा दास गुप्ता, जो ज्ञान गुरु जी की बहन थी। उनसे मैंने खयाल और रवींद्र संगीत दोनों की तालीम लेनी शुरू की। मैं मधुबनी में जन्मी हूं। हमारे घर में पहले से ही संगीत का माहौल था। कुछ कलाकारों को मेरे पिता बहुत शौक से सुनते थे। मसलन उस्ताद अब्दुल करीम खां, अमीर खां, निसार हुसैन खां, बड़े गुलाम अली खां वगैरह। इनका खयाल वो बहुत सुनते थे। इनके अलावा पंडित विलायत खां, रवि शंकर का सितार बहुत सुनते थे। पंडित महादेव प्रसाद मिश्र, सिद्धेश्वरी देवी, रसूलन बाई और बड़ी मोती बाई का गाना बचपन से ही मेरे कानों में पड़ा।

आपने यह कब फैसला किया कि आप ठुमरी ही गाएंगी ? इसकी शुरूआत कब हुई?

जब तक मैं काॅलेज आई तब तक मुझे ठुमरी सुनने का चस्का-सा लग गया था। मैंने काॅलेज में शांति हीरानंद जी से संगीत सीखना शुरू कर दिया था, जो बेगम अख्तर की शिष्या रह चुकी हैं। उनसे मैंने लखनऊ की ठुमरी और बेगम अख्तर की कुछ बंदिशें सीखीं। बेगम अख्तर की गायकी का एक जादू-सा मेरे ऊपर रहा, लेकिन यह काॅलेज की बात थी। उसके बाद मैंने सिटी बैंक की नौकरी ज्वाइन कर ली। तब तक यह सोचा ही नहीं कि कभी संगीत मेरा करिअर होगा। फिर मैं बहुत व्यस्त हो गई। मेरी शादी हो गई। पूरे होशो-हवास में सबसे पहले सन् 2000 में मैंने निर्णय लिया कि मैं ठुमरी ही सीखुंगी, क्योंकि मेरी आवाज उसी के लिए ठीक थी, तब तक भी मैंने परफाॅर्मेंस के बारे में नहीं सोचा था।

आप एक जाने-माने बैंक में काम करती थीं। आपने ‘बिजनेस स्टडी’ में पीएचडी भी किया। आखिर आपने बिजनेस और कला के बीच तालमेल कैसे पैदा किया?

मुझे नहीं पता। मैं जब सिटी बैंक में काम करती थी तो कहा करती थी कि मेरे अंदर एक ‘एमसीबी’ फिट है जो शाम को 6 बजे के बाद ही अपने आप डाउन हो जाता है और मेरे अंदर का कलाकार जाग जाता है। घर पहुंचकर संगीत का सिलसिला जारी रहता था। कंसर्ट भी सुना करती थी। ये सब मेरे अंदर शायद जन्मजात था।

आपके पति ने कभी इस चीज को लेकर कुछ कहा या उनको भी संगीत का शौक है?

ये चीजें माहौल से पैदा होती हैं, लेकिन उनको फिल्म संगीत और ‘फ्यूजन संगीत’ का शौक जरूर है। कुल मिलाकर संगीत का बीज रहना चाहिए वही बहुत है। मैं तो कहूंगी कि फिल्म संगीत ने संगीत की बहुत सी विधाओं को बचा लिया। ठुमरी भी उनमें एक है।

आपने सन् 2000 में ठान लिया था कि आप ठुमरी ही गाएंगी। उसके बाद आपने बाकायदा इसकी ट्रेनिंग भी ली। फिर आपने जब शुरुआत की तो अपना गुरु किसे बनाया?

सन् 2000 में मेरी मुलाकात बनारस के बुलानाथ मिश्रा जी से हुई, जो आॅल इंडिया रेडिया में जाॅब करते हैं। उनसे मैंने ठुमरी की तालीम हासिल की। कभी ‘परफाॅर्म’ करूंगी, इसका न तो इरादा था न ही कभी सोचा था। बस पंसद थी। सब कहते थे कि तुम्हारी आवाज ठुमरी के लिए बहुत अच्छी है। कुछ लोगों ने कहा कि आपकी आवाज सिद्धेश्वरी देवी और रसूलन बाई जैसी है। पिछले तीन-चार सालों से पद्मश्री पंडित छन्नूलाल जी मेरे गुरु हैं। वे ठुमरी सम्राट हैं। ख्याल से भी ऊपर का दर्जा उन्होंने ठुमरी को दिया है। गुरुजी कुछ ऐसी बंदिशें गाते हैं जो और कोई नहीं गाता। मैं अपने आपको बहुत सौभाग्यशाली मानती हूं कि मुझे उनसे सीखने का मौका मिला। गुरुजी के गाने में एक जादुई चमत्कार है। अगर उसका एक भी अंश मुझमें समा गया तो मैं अपने आपको धन्य समझूंगी।

अगर हम थोड़ा-सा पीछे जाकर देखें तो एक वक्त ऐसा आया था कि ठुमरी लुप्त हाती जा रही थी, लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षों में ठुमरी की मांग एकदम से बढ़ गई है। ठुमरी फेस्टिवल होने लगे हैं। आप खुद भी ऐसे आयोजन कर रही हैं। इसका मूल कारण क्या है ?

ख्याल और वाद्ययंत्रीय शास्त्रीय संगीत की गायकी तो कायम थी ही, लेकिन एक दौर ऐसा भी आया, जिसमें गजल बहुत मशहूर हो गई थी और ठुमरी पूरी तरह लुप्त हो गई थी। इसकी पुरानी पीढ़ी पूरी तरह खत्म हो गई थी। एक-दो ही प्रतिष्ठित कलाकार बचे थे। ठुमरी में महारत हासिल होने के बावजूद हमारे पंडित छन्नूलाल मिश्र का पिछले दस सालों में ही नाम हुआ। मैं तो कहूंगी कि ठुमरी को पुनः स्थापित करने में, लोगों को ठुमरी के प्रति आकर्षित करने में उनका बहुत बड़ा हाथ रहा है।

रियाज, ‘बिजनेस स्टडीज’ और ‘रिसर्च’ इन सबके लिए आप कैसे इतना समय निकाल लेती हैं ?

‘बिजनेस स्टडीज’ तो छह साल पहले ही खत्म हो गई, जब मैं ‘परफॉर्मर’ बन गई। 2006 में मेरी पहली ‘परफाॅर्मेंस’ हुई थी। तब से आज तक मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आजकल ‘परफॉर्मेंस और ‘रिसर्च’ का काम इतना ज्यादा है कि ‘बिजनेस स्टडी’ के लिए समय ही नहीं मिलता। अब तो मैं ‘फुल टाइम’ परफॉर्मर’ हूं। रिसर्च में जरूर करती हूं। सस्कृति मंत्रालय की कृपा रही कि उन्होंने कुछ साल पहले मुझे ‘सीनियर फेलोशिप’ दी। इसके तहत मैंने एक तुलनात्मक अध्ययन किया था कि अलग-अलग प्रांतों में ठुमरी के क्या रंग हैं और एक दूसरे पर उनकी क्या छाप है। मेरा यह तुलनात्मक अध्ययन बहुत सराहा गया।

आप भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की तरफ से कई देशों में गईं और वहां आपने ‘परफाॅर्मेंस दी। आप अमेरिका और कई देशों में गई। वहां पर इसका क्या ‘रिस्पांस रहा?

मेरा बहुत अच्छा अनुभव है। मैं नो देशों में गई। लंदन और यूरोप के कई देशों के अलावा अमेरिका में भी परफाॅर्म किया। ठुमरी ऐसी चीज है कि उसमें एक लचक है। जैसे ही आप उसे गाना शुरू करते हैं तो उसे सुनते ही हर आदमी झूम उठता है। अमेरिका में लोग दीवाने हैं हमारी ठुमरी के। दरअसल आज के जमाने में लोग लंबे समय तक बैठकर खयाल का, एक ‘इंस्ट्रूमेंट’ का और एक ठुमरी का आर्टिस्ट है तो लोग ठुमरी सुनने के लिए बैठे रहेंगे।

 

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