मैं फिल्मों से पैसा कमाकर फिर उसी में गंवाता हूं: सागर सरहदी

सागर साहब, घर में लिखने का कुछ माहौल था या परिवार में आप पहले शख्स हैं, जिन्हें लिखने का शौक है ?

-कतई नहीं था, मेरे वालिद ठेकेदार थे। ठेका शराब, अफीम का था। और मेरे बड़े भाई नौकरी करते थे और घर में कोई इस तरह का वातावरण नहीं था। हां, हम लोग कभी-कभी रामलीला या महाभारत का कोई सीन वगैरह देखते थे। गांव में जैसे पहुंचा लगता था और लोग देखते सुनते थे तो वो मैं भी देखता-सुनता था, लेकिन उससे ऐसा प्रिसीजन नहीं था कि मैं आगे जाकर लेखक बनूं।


सागर साहब, सागर सरहदी नामक लेखक ने पहली बार कलम कब उठाई और आपको कब लगा कि मुझे अब सिर्फ लिखना ही है।

उन्हीं दिनों में वे जो बेचैनी थी, जो मैं आदमी से शरणार्थी बना और फिर बेकारी देखी और वो सारा दर्द देखा, हजारों लोग जो भाग कर वहां से आए। उनमें से आधे मर गए। ये जो मैंने देखा-सुना तो मेरे अंदर वो जो बेचैनी थी जो शायद अपनी अभिव्यक्ति चाहती थी। फिर मैं मुंबई आ गया मैट्रिक पास करके। मैट्रिक के दिनों में मैंने कुछ गोदना शुरू किया। मुझे कतई पता नहीं था कि आगे चलकर मैं लेखक बन जाऊंगा। लेखन ऐसा प्रोफेशन नहीं है जिसे आप आगे बढ़ा सके। और इस मुल्क में तो कतई नहीं है कि आप इससे रोजी-रोटी कमा सकें। तो मेरे जेहर में कभी यह ख्याल नहीं था, लेकिन कुछ लिखना-लिखाना मेरा शुरू हो गया था।

मुंबई एक ऐसा शहर है, जहां पर कोई भी आदमी जाता है तो वो अपनी किस्मत आजमाता है। तो आपने ये कब फैसला किया कि आप कथाकार बनने के बाद फिल्मों की तरफ मुडेंगे।

मेरे बड़े भाई चाहते थे कि मैं टीचर या क्लर्क बन जाऊं। अंदर ये चीज कबूल नहीं हो रही थी। मैं कुछ-कुछ लिखने लगा था। कुछ कहानियां छपने लगीं थीं। लेकिन मैं चूंकि उर्दू में लिखता हूं तो उर्दू के लेखक की औसत आमदनी इस मुल्क में अभी तक-अगर वो कहानी लिखता हो-तो पचास और सौ रुपए से ज्यादा नहीं हो सकती। तो घरवाले मुझे परेशान करते थे। मैं भी डिस्टर्ब रहता था कि यह कोई ऐसा जरिया नहीं है रोजी-रोटी का। मेरा रुझान फिल्मों की तरफ था, हालांकि आकर्षण था सिर्फ फिल्मों का, लेकिन उसको प्रोफेशन बनाना है-ये मुझे पता नहीं था।

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Title: interview of sagar sharhadi by sharad dutt in Hindi  | In Category: साक्षात्कार interview

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