सागर सरहदी उर्दू के मशहूर कथाकार हैं। वे फिल्म पटकथाकार, संवाद लेखक निर्देशक और नाटककार सभी कुछ हैं। उन्होंने कई मशहूर फिल्में लिखीं हैं। अनुभव, कभी कभी, सिलसिला आदि। कई फिल्में बनाई भी हैं। कुछ चलीं हैं, कुछ नहीं चलीं। इस अलबेले फिल्मकार से शरद दत्त की खास मुलाकात

सबसे पहले तो आप यह बताइए कि गंगा सागर तलवार से सागर सरहदी बनने की कहानी क्या है ?

उस जमाने में ऐसा था कि हर आदमी तखल्लुस रखता था और चूंकि मेरी पैदाइश सूबा सरहद में हुई थी, इसलिए गंगा सागर तलवार के बजाए सागर सरहदी नाम रख लिया था, लेकिन समझ नहीं थी उस वक्त। ऐसे ही रख लिया।

आपकी पैदाइश सूबा सरहद में हुई। विभाजन के बाद आपके परिवार के बहुत से लोग भारत आए। वह एक बड़ा ही कशमकश का दौर था। जाहिर है इसका असर आपके जहन पर भी पड़ा होगा। उन दिनों की आपको कुछ याद हो तो जरा बताएं।

मुझे सब कुछ याद है। छोटी सी छोटी बात याद है मुझे, बल्कि अपने गांव की गलियां, कूंचे, बाजार, वहां से भागना, ट्रक में बैठ कर आना, श्रीनगर पहुंचना, वहां से हवाई जहाजों में आलू के बोरों की तरह रखकर हमें दिल्ली में आकर फटकना। सारी बातें याद हैं और मैं भूलना भी नहीं चाहता। मेरा एक नाम था गंगा सागर तलवार। मुझे उस नाम से कोई दिक्कत नहीं थी तो क्यों मैं गंगा सागर तलवार से सागर सरहदी बना, क्योंकि दोनों नामों में बहुत बड़ा फर्क है। तो तय किया गया होगा बहुत बड़ा सफर और मुझे मजबूर किया गया कि मैं अपना नाम बदलूं और उस बीच शरणार्थी लफ्ज भी तोहफे के तौर में मुझे दिया गया। वो लफ़्ज भी मुझे बिल्कुल पंसद नहीं है।

तो आपके अंदर एक विद्रोही हमेशा मौजूद था।

-मेरा मतलब यह है कि मैं खुद नहीं जानता इस चीज को। कई बार मेरे लोगों के साथ झगड़े हुए हैं कि मैं मुनासिब सा, अच्छा-सा आदमी हूं, लेकिन अगर किसी ने पांव रख दिया मेरे पांव पर फिर मुझे पता नहीं कि मैं क्या हूं।

सागर साहब, घर में लिखने का कुछ माहौल था या परिवार में आप पहले शख्स हैं, जिन्हें लिखने का शौक है ?

-कतई नहीं था, मेरे वालिद ठेकेदार थे। ठेका शराब, अफीम का था। और मेरे बड़े भाई नौकरी करते थे और घर में कोई इस तरह का वातावरण नहीं था। हां, हम लोग कभी-कभी रामलीला या महाभारत का कोई सीन वगैरह देखते थे। गांव में जैसे पहुंचा लगता था और लोग देखते सुनते थे तो वो मैं भी देखता-सुनता था, लेकिन उससे ऐसा प्रिसीजन नहीं था कि मैं आगे जाकर लेखक बनूं।

सागर साहब, सागर सरहदी नामक लेखक ने पहली बार कलम कब उठाई और आपको कब लगा कि मुझे अब सिर्फ लिखना ही है।

उन्हीं दिनों में वे जो बेचैनी थी, जो मैं आदमी से शरणार्थी बना और फिर बेकारी देखी और वो सारा दर्द देखा, हजारों लोग जो भाग कर वहां से आए। उनमें से आधे मर गए। ये जो मैंने देखा-सुना तो मेरे अंदर वो जो बेचैनी थी जो शायद अपनी अभिव्यक्ति चाहती थी। फिर मैं मुंबई आ गया मैट्रिक पास करके। मैट्रिक के दिनों में मैंने कुछ गोदना शुरू किया। मुझे कतई पता नहीं था कि आगे चलकर मैं लेखक बन जाऊंगा। लेखन ऐसा प्रोफेशन नहीं है जिसे आप आगे बढ़ा सके। और इस मुल्क में तो कतई नहीं है कि आप इससे रोजी-रोटी कमा सकें। तो मेरे जेहर में कभी यह ख्याल नहीं था, लेकिन कुछ लिखना-लिखाना मेरा शुरू हो गया था।

मुंबई एक ऐसा शहर है, जहां पर कोई भी आदमी जाता है तो वो अपनी किस्मत आजमाता है। तो आपने ये कब फैसला किया कि आप कथाकार बनने के बाद फिल्मों की तरफ मुडेंगे।

मेरे बड़े भाई चाहते थे कि मैं टीचर या क्लर्क बन जाऊं। अंदर ये चीज कबूल नहीं हो रही थी। मैं कुछ-कुछ लिखने लगा था। कुछ कहानियां छपने लगीं थीं। लेकिन मैं चूंकि उर्दू में लिखता हूं तो उर्दू के लेखक की औसत आमदनी इस मुल्क में अभी तक-अगर वो कहानी लिखता हो-तो पचास और सौ रुपए से ज्यादा नहीं हो सकती। तो घरवाले मुझे परेशान करते थे। मैं भी डिस्टर्ब रहता था कि यह कोई ऐसा जरिया नहीं है रोजी-रोटी का। मेरा रुझान फिल्मों की तरफ था, हालांकि आकर्षण था सिर्फ फिल्मों का, लेकिन उसको प्रोफेशन बनाना है-ये मुझे पता नहीं था।

 

आपने कुछ नाटक भी लिखे हैं और आपके कुछ नाटक बहुत मशहूर भी हुए हैं और आपकी कहानियां जैसा कि आपने कहा कि प्रकाशित भी हो चुकी थीं और वो हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रिसालों में छप रहीं थीं। उधर नाटक एक बिल्कुल दूसरी विधा है कहानी से, तो नाटकों की तरफ आपका रुझान कैसे हुआ?

कह सकता हूं कि मैं जन्मजात नाटककार हूं, हालांकि नाटक लिखना इतना आसान नहीं है। स्टेज की जो जरूरत होती है, उसे समझना पड़ता है और मैं समझता हूं कि यह सबसे मुश्किल प्रोफेशन है। यह फिल्म राइटिंग नहीं है, यह स्टेजप्ले राइटिंग है। लेकिन उसमे मैंने लिखना शुरू किया। चूंकि मैं नाटककार था, पैदाइशी नाटक लेखक था। तो नाटक लिखे, हालांकि मैंने कई बार कहा है कि दुनिया के किसी नाटककार के इतने नाटक फ्लाप नहीं हुए, जितने कि मेरे हुए हैं। लेकिन इसका कारण सिर्फ यह था कि मुझे लिखना नहीं आता था।

लेकिन आपने कुछ कामयाब नाटक भी लिखे हैं, जो एकता कपूर ने भी किए।

ये बहुत बाद की बात है और मैं बहुत लोकप्रिय नाटककार हूं। मेरी किताबें छपी हुईं हैं। मेरा तनहाई नाटक एकता ने प्रोड्यूस किया था। उसकी उस जमाने में सिलवर जुबली हुई थी, जो बहुत मुश्किल बात थी। मेरे एकांकी दुनिया के अच्छे नाटकों में गिने जाते हैं। और अभी मुंबई में बी.ए. के कोर्स में लगे हुए हैं।

आपने फिल्मों की पहली कहानी या संवाद कब लिखे ?

-बासु भट्टाचार्य ने फिल्म वित्त निगम से पैसा लेकर एक छोटी-सी फिल्म बनाई थी, जिसे समानांतर सिनेमा नाम बाद में दिया गया था। इस तरह की फिल्मों का बजट बहुत कम होता था लेकिन वो एक फैशन था क्योंकि स्टार सिस्टम हम पर बहुत हावी था। कुछ लोग उसको बुरा मानते थे और कुछ अच्छा भी मानते थे। पूंजीवाद की तरह वो भी हमारे सिर पर हावी था। बासु भट्टाचार्य मेरे दोस्त थे। उनसे मिलना-जुलना था तो वो अनुभव फिल्म बना रहे थे, जिसमें संजीव कुमार और तनुजा थी। तो इसके संवाद मैंने लिखे थे। वहां से मेरी शुरुआत हुई थी। जुबली हुई थी यह फिल्म उस जमाने में। बहुत तारीफ हुई थी उसकी।

 

इसके बाद आपका एक दौर आता है जब आपने बहुत बड़े नामी-गिनामी फिल्म निर्माताओं के साथ काम किया, जिसमें यश चोपड़ा हैं या राकेश रोशन हैं, जो बड़े बजट की फिल्में बनाते हैं, स्टार कास्ट की फिल्में होती हैं, और कुछ आपकी छवि ऐसी भी बन गई थी कि आप फिल्मों के राइटर राॅबिनहुड हैं, जो बड़े बैनर की फिल्में करता है, उनसे पूरा मुआवजा लेता है और बाद में खुद जो फिल्म बनाता है उसमें थिएटर आर्टिस्ट होते हैं। ये कम बजट की फिल्में होती हैं। तो ये जो ग्लैमर आपके साथ रहा, ये क्या था ?

-आपको अगर पैसे कमाने हैं तो बिग बजट की फिल्में लिखनी पड़ती हैं। और अगर बिग बजट की फिल्में लिखेंगे तो आपकी पूरी टैलेंट उसी में खप जाती है , क्योंकि बदकिस्मती से मैं स्टार सिस्टम के बहुत खिलाफ हूं। मैं उसको एक पूंजीवादी फाॅर्म मानता हूं, जिससे आप सांस नहीं ले सकते। उसमें आप लोग किसी हीरो को लेंगे उसकी इमेज करोड़ो रुपए खर्च करने के बाद बनती है। अगर अमिताभ बच्चन की इमेज एंग्री यंग मैन की है तो उस पर कितना पैसा खर्च किया गया। जब हमें कहा जाता है लिखने के लिए तो हमको उस इमेज को जस्टिफाई करना पड़ता है। इस तरह कोई दूसरा एक्टर है। उसकी अपनी इमेज मान लीजिए रोमांटिक है तो उसको जस्टिफाई करना पड़ता है। हम एक्सपेरिमेंट स्टार सिस्टम के साथ नहीं कर सकते।

आपको एक बड़ा क्रेडिट जाता है कि आपने उस एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन की एक रोमांटिक इमेज बनाई ‘कभी-कभी’ फिल्म में।

उसके बारे में अर्ज करूंगा कि हम तो बहुत खुश थे लेकिन उस वक्त अमिताभ बच्चन साहब खुश नहीं थे। बाद में ‘कभी-कभी’ सुपरहिट हुई थी। हमारे डिस्ट्रीब्यूटर गुलशन राय साहब ने जब फिल्म देखी थी तो उन्होंने बोला था कि ये फिल्म एक दिन नहीं चलेगी, इस फिल्म को रिजेक्ट कर दो और इसमें जितने भी डाॅयलाग हैं, सारे बदल दो।

लेकिन आपने तो काफी रोमानी डायलाॅग लिखे थे उसके लिए ?

हां, वही तो है बाद में जो फिल्म एक्सेप्ट हुई है। चूंकि फिल्म हिट हो गई और उसके हिट होने से अमिताभ जी ने भी फिल्म को एक्सेप्ट किया बहुत प्यार से। हमारे रिश्ते काफी अच्छे हुए अमिताभ बच्चन साहब के साथ। उसकी वजह से सिलसिला बनीं रोमांस की टेंशन सबसे खूबसूरत टेंशन होती है ओर लोगों को याद रहती है। वो मेरी फिल्मों में बहुत ज्यादा थी।

 

आपकी एक फिल्म थी ‘दूसरा आदमी’ जो शायद उस वक्त से कुछ पहले आ गई थी। क्योंकि इसकी कहानी थोड़ी बोल्ड थी। लेकिन वो फिल्म् आपके काफी करीब थी। तो एक लेखक के रूप में ‘दूसरा आदमी’ फिल्म के बारे में कुछ बताइए।

दूसरा आदमी के बारे में ये है कि मेरे एक भतीजे हैं रमेश तलवार। आज वो बहुत बड़े आदमी हैं। डायरेक्टर बन गए हैं। तो उस वक्त मैं एक्सेप्ट हो गया था। लेखक के तौर पर मेरा नाम भी होने लगा था। तो हम लोग कुछ ऐसा प्रोजेक्ट चाहते थे कि इनको लांच करे और इनकी इमेज बने। तो ऋषि कूपर तब तक हमारे ग्रुप का एक एक्सेप्टेबल किस्म का हीरो था। वो हमारे साथ था। मैं भी चाहता था, यश चोपड़ा भी चाहते थे कि सब्जेक्ट कुछ ऐसा हो जो बहुत ही अलग-सा हो।

आप डायरेक्टर बने ‘बाजार’ फिल्म के साथ। फिर आप प्राड्यूसर बने। आपका ‘न्यू वे’ बैनर था जिसके अंतर्गत आप चाहते थे कि सार्थक सिनेमा, एक मीनिंगफुल सिनेमा बने। तो ‘बाजार’ बहुत आपकी सुपरहिट हुई। आपने एक फिल्म बनाई ‘लोरी’। आपने एक फिल्म बनाई चैसर जो बिल्कुल दिल्ली के आसपास आपने शूट की और मुझे याद है उन दिनों आप नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा के कुछ युवाओं के साथ काम कर रहे थे। वो आपकी कहानी-जो उस वक्त आपके जेहन में थे तो वो एक बहुत अच्छा आइडिया थी लेकिन उसमें गड़बड़ क्या हो गई?

-लोरी की बात करें जो कि मेरे दूसरे भतीजे हैं विजय तलवार साहब तो उनके लिए हमने एक अच्छा-सा मजेदार सा प्रोजेक्ट बनाया। शबाना हमारे ग्रुप में भी मेरे साथ काम करना चाहती थी तो हमने सोचा कि विजय साहब को एक चांस दिया जाए। ये फिल्म उन्होंने बहुत अच्छी बनाई, बहुत इमोशनल, बहुत खूबसूरत। लेकिन उन दिनों सीरियल शुरू हो गए थे। दिल्ली से ‘हम लोग’ और मुंबई में ‘ये जो हैं जिंदगी’ और बाद में ‘बुनियाद’, उसके बाद ‘तमस’, तो बहुत अच्छे सीरियल दिल्ली और मुंबई में शुरू हो गए थे। लोगों ने थिएटर में जाना छोड़ दिया था। आपको याद होगा बहुत से थिएटर बंद हो गए थे। तो उसकी वजह से ‘लोरी’ ज्यादा नहीं चल पाई।

आपने फिल्म ‘बाजार’, ‘लोरी’ और ‘चैसर’ में सोशल प्राॅबल्म उठाई। क्या आप समझते हैं कि ये सोशल इश्यू फिल्मों के माध्यम से हल किए जा सकते हैं ?

-जहां तक मेरी निजी जिंदगी का ताल्लुक है, तो मैं बिना मोटिवेशन के फिल्म नहीं बना सकता। अभी जैसे ‘चैसर’ का जिक्र आपने किया तो फिल्म से मैं पैसे कमाता हूं, गंवाता हूं, फिर कमाता हूं, फिर गंवा देता हूं। मुझे पैसे में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है।

 

 

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