चाचा भतीजे की खींचतान न पड़ जाए पार्टी पर भारी

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उत्तर प्रदेश में जहां एक ओर विधानसभा चुनावों की तैयारियां अभी से जोरों पर हैं वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी में इस नाजुक वक्त में अंतरकलह शुरू हो गई। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव के बीच की खींचतान से संभावना है पार्टी को खासा नुकसान उठाना पड़ सकता है। यूं तो चाचा भतीजे के बीच काफी लंबे समय से शीत युद्ध जारी था। पर सोमवार को मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव द्वारा दो मंत्रियों की बर्खास्तगी के बाद से मामले ने और तूल पकड़ लिया है। इस घटना से चिंतित पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव और शिवपाल यादव दोनों चाचा भतीजों को दिल्ली तलब किया है।

शिवपाल सिंह यादव राज्य सरकार में शक्तिशाली मंत्री भी हैं। शिवपाल सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच लंबे समय से कभी मौन तो कभी खुलेआम शीत युद्ध चल रहा था और इस लड़ाई में मुलायम सिंह यादव ने खुलकर अपने भाई का साथ दिया था। मंगलवार को इस मामले में नया मोड़ आया जब अखिलेश यादव ने राज्य के मुख्य सचिव दीपक सिंघल को उनके पद से हटाया क्योंकि वह शिवपाल और मुलायम सिंह के करीबी माने जाते हैं।


यह खबर आम होते ही मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे को पार्टी की राज्य इकाई के नेतृत्व से हटा दिया है और शिवपाल को अध्यक्ष घोषित कर दिया। उधर अखिलेश यादव ने बतौर मुख्यमंत्री अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए शिवपाल यादव को सभी महत्वपूर्ण पदों से हटा दिया।

अब शिवपाल यादव का कहना है कि वह मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर अमल करते हुए ही सरकार में बने रहने या इस्तीफा देने के बारे में कोई फैसला करेंगे।

वर्ष 2012 के चुनाव से पहले मुलायम सिंह ने अखिलेश को मुख्यमंत्री पद के लिए समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में पेश किया था और सभी चुनावी आकलन गलत साबित करते हुए पार्टी को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ था।

अखिलेश यादव का शुमार देश के सबसे कम आयु के मुख्यमुंत्रियों में किया जाता है। तख्तनशीनी के कुछ समय बाद से ही उन्हें पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है। अफवाह यह भी है कि विरोध करने वाले दल की अुगाआई करने वालों में शिवपाल सिंह यादव भी शामिल थे।

यह अभी स्पष्ट नहीं है कि मुलायम सिंह यादव अपने बेटे के बजाय भाई का साथ क्यों दे रहे हैं लेकिन कुछ दिन पहले उन्होंने एक जनसभा में कहा था कि शिवपाल यादव के जाने से पार्टी विभाजित हो जाएगी।

विश्लेषकों के अनुसार अखिलेश नए और पारदर्शी तरीके की राजनीति करना चाहते हैं और इसीलिए उन्होंने एक ऐसी क्षेत्रीय पार्टी के समाजवादी पार्टी में विलय का विरोध किया था जिसके नेता मुख्तार अंसारी पर पहले से ही गंभीर आरेाप थे और वह बहुत दिनों से जेल में हैं।

समाजवादी पार्टी के लिए यह कठिन समय है क्योंकि जल्दी ही विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और यह पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी और भाजपा दोनों ही पार्टियां उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के लिए इस बार बड़ा रोड़ा साबित हो सकती हैं।

पार्टी की यह अंतरकलह जरूर आने वाले समय में विधानसभा चुनावों पर भी असर डाल सकती है, क्योंकि अगर यह लड़ाई जारी रही तो पार्टी विभाजित हो सकती है जिससे बसपा और भाजपा दोनों को लाभ होगा।

शिवपाल सिंह का अगला कदम क्या होगा, यह तो एक दो दिन में स्पष्ट हो जाएगा लेकिन वह कुछ भी तय यह परिवार युद्ध समाजवादी पार्टी के लिए बहुत महंगी साबित हो सकती है।


 

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