पचास साल पहले यूरी गागरिन ने बदली थी दुनिया

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12 अप्रैल 1961, कजाकस्तान के बायकोनूर अंतरिक्ष स्टेशन पर अनजाने भय और आशंकाओं के बीच मानव अंतरिक्ष के गहन अज्ञात में पहला कदम रखने जा रहा था। ऐसे में अपने अंतरिक्षयान वोस्तोक-1 में बैठने से पहले यूरी गागरिन ने दुनिया भर के लोगों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाया था।

प्यारे दोस्तों, भले ही आप मुझे जानते हों या न जानते हों, मेरे हमवतनों और दुनियाभर के लोगों, अगले कुछ मिनटों में एक शक्तिशाली राॅकेट मुझे ब्रह्मांड की सुदूर गहराइयों में ले जाएगा। अंतरिक्ष के सफर पर निकलने से पहले अब इन अंतिम पलों में मैं आपसे क्या कह सकता हूं ? अपनी पूरी जिंदगी अब मुझे एक अकेले खूबसूरत क्षण जैसी लग रही है। मैंने जिंदगी में जो कुछ भी किया, जो भी जिया, वो सब कुछ बस इस क्षण के लिए ही था।


विश्व नागरिकों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाने के बाद यूरी गैगरिन वोस्तोक राॅकेट में सवार होकर विश्व के पहले मानव अंतरिक्ष अभियान पर निकल गए। अंतरिक्ष में पहला मानव मौजूद होने की खबर जब दुनिया को मिली तो सभी अवाक् रह गए। द्वितीय विश्वयुद्ध के खत्म होने के बाद ये सबसे बड़ी और सबसे गौरवशाली खबर थी, जो पूरी दुनिया में बिजली की तेजी से फैल गई। अमेरिका दंग रह गया लेकिन राजनयिक-कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर जारी तमाम स्पर्धाओं को दरकिनार कर वाशिंगटन ने बधाई का संदेश मास्को भेजा। यूरी गागरिन के अंतरिक्ष अभियान ने पूरी दुनिया को मानव होने का अर्थ सही मायनों में समझाया और सभी देशों को एक साथ गर्व की सुखद अनुभूति से भर दिया।

यूरी के अंतरिक्ष अभियान की पृष्ठभूमि तैयार हुई 4 अक्टूबर 1957 को जब पूर्व सोवियत संघ ने दुनिया का पहला उपग्रह स्पुतनिक पृथ्वी की कक्षा में भेजा। स्पुतनिक के साथ दुनिया में अंतरिक्ष युग की शुरूआत हुई, जिसे सोवियत वैज्ञानिकों ने आगे बढ़ाया 3 नवंबर 1957 को पृथ्वी की कक्षा में जीवन पहला रूप ‘मादा कुत्ता लाइका’ को भेजकर। अंतरिक्ष के माहौल में ‘लाइका’ केवल 6 घंटे ही जीवित रह सकी, उसके चैंबर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाने की वजह से उसकी मौत हो गई।

लाइका नहीं रही लेकिन वो मानव को अंतरिक्ष का रास्ता दिखा गई। अमेरिका एक बार फिर पिछड़ चुका था, लेकिन सोवियत संघ जानता था कि अब अमेरिका दुनिया को चैंकाने वाला कोई बड़ा कारनामा जरूर करेगा। साम्यवादी सरकार हर कीमत पर अमेरिका को पछाड़ने पर आमादा थी। वक्त कम था और जल्दी ही कुछ बड़ा कर दिखाना था।

जनवरी 1959 को पूर्व सोवियत संघ ने मानव को अंतरिक्ष भेजने के लक्ष्य के साथ एक अह्म कार्यक्रम शुरू किया, जिसका नाम था वोस्तोक। इससे ठीक तीन महीने बाद अमेरिका ने भी मानव अंतरिक्ष अभियान मिशन मरकरी का ऐलान कर दिया। अब पूर्व सोवियत संघ और अमेरिका में इस बात की होड़ तेज हो गई कि पहले अंतरिक्ष को धरती की सीमा से पार अंतरिक्ष भेजने में बाजी कौन मारता है।

अमेरिका की तरह पूर्व सोवियत संघ ने भी अंतरिक्ष यात्रियों का चुनने के लिए वायुसेना के पायलटों को ही लेने का फैसला लिया था। पूर्व सोवियत संघ ने गुपचुप ढंग से सारी तैयारियां शुरू कर दीं और देशभर से वायुसेना के सबसे कुशल 2000 पायलटों को बुला भेजा। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम वोस्तोक के प्रमुख सेर्गेई कोरोलेव ने इन 2000 में से 200 पायलटों का चुनाव किया और कड़े इम्तहान के बाद इन 200 में से 20 को चुना गया। इसी टीम में शामिल थे सोवियत वायुसेना के सीनियर लेफ्टिनेंट यूरी गैंगेरिन। महज 5 फुट 2 इंच के कद वाले यूरी की सबसे बड़ी पहचान थी चेहरे पर हर वक्त खिली रहने वाली ताजगी भरी मुस्कान।

यूरी गागरीन जिस वक्त अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण ले रहे थे, उस वक्त न तो अच्छे कंप्यूटर्स थे और न ही वो टेक्नोलाॅजी जो मानव को अंतरिक्ष भेजकर सुरक्षित वापस ला सकती थी। उस वक्त तक तो हमें अंतरिक्ष में विकिरण के खतरों की भी सही जानकारी नहीं थी और अंतरिक्ष के खतरनाक माहौल में जिंदगी की हिफाजत करने वाले अच्छे स्पेससूट की तो बात ही छोड़ दीजिए। सुरक्षित हेलमेट तक नहीं थे। ऐसे में मानव अंतरिक्ष अभियान एक राजनीतिक जिद के सिवाय कुछ नहीं था।

पहली अंतरिक्ष यात्रा के लिए यूरी के चुनाव की एक वजह और भी थी। दरअसल वोस्तोक कैप्स्यूल के काॅकपिट में लंबे कद के अंतरिक्षयात्री के लिए जगह ही नहीं थी, जबकि महज 5 फुट 2 इंच कद वाले यूरी इस छोटे से काॅकपिट के लिए बिल्कुल फिट थे।

12 अप्रैल 1961, बायकोनूर काॅस्मोड्रोम, कजाकस्तान। दुनिया के नाम अपना संदेश रिकार्ड करवाने के बाद यूरी ड्रेसिंग रूम में आ गए, जहां स्पेस सूट पहनने में साथियों ने उनकी मदद की। बाद में यूरी को लांच पैड तक ले जाने के लिए एक खास बस में बिठाया गया। बस के काॅस्मोड्राॅम पहुंचते ही आला सरकारी और फौजी अफसरों के साथ वहां मौजूद सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रमुख कोरोलेव ने यूरी की अगवानी की। खतरों से भरे इस सफर के लिए यूरी का चुनाव उन्होंने ही किया था। कोरोलेव भावुक हो उठे, क्योंकि वो ये बात बखूबी जानते थे कि इस सफर से यूरी के जिंदा वापस आने की संभावना 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। फिर भी यूरी से विदा लेते वक्त उन्होंने स्नेह के साथ कहा, ‘यूरी वापस लौट के आना।’

राॅकेट लांच होने में अभी कुछ वक्त था। वोस्तोक कैप्स्यूल में बैठकर यूरी कंट्रोल रूम में मौजूद साथियों से माइक्रोफोन पर मजाक करने लगे। इस पर कोरोलेव ने यूरी को सावधान किया कि वो जो कुछ भी कह रहे हैं, वो सब रिकाॅर्ड हो रहा है। अंतिम जांच पूरी होने पर, कोरोलेव ने इशारा किया और वोस्तोक के बूस्टर इंजन दहक उठे। राॅकेअ लांच होते ही यूरी ने पूरे जोश में भरकर कहा… पियाकली… यानी …आओ चलें।


राॅकेट लांच के तीन मिनट बाद, वोस्तोक के बूस्टर राॅकेट्स गैगेरिन को 28164 किलोमीटर प्रति घंटे की तूफानी रफ्तार से धरती की सरहदांे के पार लिए चले जा रहे थे। लांचिग के पांच मिनट बाद, यूरी गैगेरिन अंतरिक्ष से खूबसूरत नीली धरती को निहारने वाले पहले मानव बन गए। वोस्तोक कैप्सूल के काॅकपिट की छोटी सी खिड़की के उस पार चमकीली नीली धरती नजर आ रही थी। धरती की इस खूबसूरती को देखने में यूरी खो गए। उन्होंने माइक्रोफोन से कंट्रोल रूम को बताया, ‘अब मैं धरती के रंगों को देख रहा हूं… ये खूबसूरत है…बेहद खूबसूरत।’

अंतरिक्ष तक की उड़ान के 9 मिनट बाद रफ्तार की तेज सनसनाहट अचानक थम गई। गुरुत्वाकर्षण के असर खत्म हो गया। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण सीमा को पीछे छोड़कर यूरी पृथ्वी की अपनी कक्षा में पहुंच गए। उन्होंने कंट्रोल रूम को बताया, ‘सब कुछ ठीक है…शून्य गुरुत्वाकर्षण का अनुभव शानदार है…मुझे मजा आ रहा है।’

मानव इतिहास की सबसे शानदार उपलब्धि हासिल हो गई। किसी इंसान को अंतरिक्ष में भेजने का सपना साकार हो गया। अपनी कक्षा में मौजूद यूरी गैगरिन अब धरती की अपनी पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे। इस ऐतिहासिक कामयाबी के ऐलान के लिए पूर्व सोवियत सरकार अब तैयार थी। लोगों को साम्यवादी सरकार की इस शानदार कामयाबी की खबर दी सरकारी एजेंसी तास ने। रेडियो एनाउंसर यूराई लैंवितान ने बाद में बताया कि पूरे कॅरिअर के दौरान केवल दो मौके ही ऐसे आए, जब बुलेटिन पढ़ने के बाद वो फफक-फफक कर रो पडे़ थे। पहला मौका था जब उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति की खबर पढ़ी थी और दूसरा मौका अब सामने था, जब वो अंतरिक्ष में यूरी गैगेरिन के मौजूद होने का समाचार लोगों को सुना रहे थे।

अंतरिक्ष में जाने के 30 मिनट से भी कम वक्त के भीतर यूरी गागेरिन प्रशांत महासागर के ऊपर से गुजरे और उन्होंने आधी धरती को नींद के आगोश में समेटे रात के गहरे साए को देखा। जल्दी ही गैगेरिन का कैप्स्यूल पहले इंसान यूरी गैगेरिन की शानदार फतह से बेखबर गहरी नींद में खोए थे। अंतरिक्ष में करीब एक घंटा गुजारने के बाद कंट्रोल रूम में धरती के वातावरण में वापसी की गणना शुरू कर दी गई। पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा कर रहे गैगेरिन को अब बर्न-अप की मदद से वोस्तोक कैप्स्यूल की रफ्तार कम करनी थी, क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो गैगेरिन पृथ्वी की और ऊंची कक्षा में प्रवेश कर जाते, जहां से फिर वापस लौटने का और कोई रास्ता नहीं था।


राॅकेट बर्न-अप के साथ यूरी के कैप्स्यूल की रफ्तार तो कम हो गई लेकिन एक बड़ा हादसा सामने आ गया। यूरी कंट्रोल रूम का रेडियो संपर्क टूट गया। कोरलोव अब कंट्रोल रूम के दूसरे वैज्ञानिकों के साथ इंतजार के सिवा कुछ और नहीं कर सकते थे।
साइबेरिया के सारातोव इलाके में किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे कि तभी अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। आसमान से दो चीजें पैराशूट के सहारे नीचे गिर रहीं थीं। पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश के बाद धरती से करीब साढ़े छह किलोमीटर की ऊंचाई पर गैगेरिन ने कैप्स्यूल के बाहर पैराशूट से छलांग लगा दी।

108 मिनट की इस ऐतिहासिक अंतरिक्षयात्रा के दौरान गागेरिन ने 40234 किलोमीटर की दूरी तय की और इसके साथ ही वो अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले पहले मानव बन गए। अंतरिक्ष में पहला अंतरिक्षयात्री भेजने में पूर्व सोवियत संघ ने बाजी मार ली और अमेरिका अंतरिक्ष दौड़ में मीलों पीछे छूट चुका था। तत्कालीन सोवियत राष्ट्रपति निकिता खुश्चेव ने गैगेरिन की अंतरिक्षयात्रा को साम्यवादी सिद्धांतों की सर्वोच्च विजय के तोर पर प्रचारित किया। गैगेरिन अब नेशनल हीरो थे। गैगेरिन की वापसी के दो दिन बाद सोवियत सरकार ने क्रमलिन के लाल चैक पर इस शानदार उपलब्धि को सार्वजनिक जश्न मनाया। इसमें सबसे खास बात ये कि लाखों की भीड़ के साथ यूरी से मिलने राष्ट्रपति खुद आए।

गागेरिन की मशहूर मुस्कान की चमक पूरी दुनिया में फैल गई। क्यूबा, जापान, मैक्सिको, कनाडा, लीबिया और भी कई देशों में यूरी गैगेरिन जहां भी गए, उन्हें देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी। अंतरिक्ष से वापस आने के करीब आठ महीने बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर यूरी गैगेरिन भारत भी आए। भारत में भी गैगेरिन के लिए भव्य स्वागत यात्रा निकाली गई।

गागेरिन की उपलब्धि ने भारत को भी आत्मविश्वास से भर दिया। डाॅ. विक्रम साराभाई भी यूरी की अंतरिक्षयात्रा से बहुत प्रभावित हुए और इस नतीजे पर पहुंचे कि एक प्रभावशाली अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान के 8 साल बाद इसरों की स्थापना के साथ भारत ने अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू कर दिया। इसके महज 6 साल बाद अपना पहला उपग्रह आर्यभट्ट अंतरिक्ष में भेजकर दुनिया को चैंका दिया। यूरी गैगेरिन के सम्मान में भारतीय डाक विभाग ने खास टिकट भी जारी किए। गैगेरिन की उपलब्धि इतनी बड़ी थी कि सोवियत प्रतिद्वंदी अमेरिका भी यूरी गैगेरिन की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। यूरी अब किसी एक देश के हीरो नहीं रहे बल्कि वो पूरी मानव जाति के नायक बन गए थे। यूरी ने जब पृथ्वी की पहली परिक्रमा की उस वक्त वो केवल 27 साल के थे। 108 मिनट की उनकी अंतरिक्ष यात्रा ने विश्व के युवाओं को इस कदर जोश से भर दिया कि इसके बाद दुनिया ही बदल गई। दुनिया के इस पहले अंतरिक्षयात्री ने पृथ्वी की पहली परिक्रमा के दौरान जिन खतरों का सामना किया, दुनिया ने उनसे सबक लिया और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ अंतरिक्षयात्रियों की नई पीढ़ी तैयार हुई।

 

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