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बिनबुलाया मेहमान : एंड्रयू हिंटन

लोबसेंग फुन्स्तोक एक पूर्व तिब्बती साधु हैं। उन्होंने पवित्र दलाई लामा के साथ प्रशिक्षण लिया और वर्षों तक पश्चिमी देशों में बौद्ध धर्म और ध्यान की शिक्षा दी। 2006 में वह साधु का चोला उतारकर भारत में अपने जन्म स्थान अरुणाचल प्रदेश लौट आये। यहां आकर उन्होंने हिमालय की तलहटी में अनाथ और गरीब बच्चों का एक समुदाय खड़ा कर दिया- झाम्त्से गत्सल बाल समाज– तिब्बती शब्द ‘झाम्त्से गत्सल’ का अर्थ है ‘प्रेम और दया का उपवन’। इस बाल समाज पर 2014 में एक फिल्म बनी- ‘ताशी एंड द मोंक’। झाम्त्से गत्सल की शुरुआत मात्र 34 बच्चों के साथ हुई। पिछले करीब एक दशक में यहां के बच्चों की संख्या बढ़कर 85 हो गयी है। 5 आश्रममाताएं और 13 शिक्षक इन बच्चों की देखरेख करते हैं। झाम्त्से गत्सल को उम्मीद है कि वह इतना विस्तार करे कि 200 बच्चे यहां रह सकें। इस साक्षात्कार में फिल्म के निर्देशक एंड्रयू हिंटन लोबसेंग फुन्स्तोक से उनके तकलीफ़देह बचपन और उस प्रेरणा के बारे में बातचीत कर रहे हैं, जिनकी बदौलत वह गरीब बच्चों के लिए एक बेहतर ज़िन्दगी की राह बना पाए हैं।

क्या आप इस सवाल के जवाब से अपनी बात शुरू कर सकते हैं कि आप कौन हैं और इस दुनिया में कैसे आये?

मेरा नाम लोबसेंग फुन्स्तोक है। मैं भारतीय हिमालय के सुदूरवर्ती अरुणाचल प्रदेश में पैदा हुआ। जब मेरी मां गर्भवती हुए तो वह अविवाहित और बहुत छोटी थी। जाहिर है, गांव में यह भारी बदनामी की बात थी। उन्होंने छुप-छुपा के हमारे घर के शौचालय में मुझे जन्म दिया। उन्होंने मुझे सूखी पत्तियों से ढककर उसी तरह छोड़ दिया जैसे- लोग अपने मल को छोड़ते थे। मेरी बुआ और दादा-दादी ने किसी के रोने की आवाज़ सुनी। उन्हें लगा कि‍ शायद कोई बकरी उनके खेत में आ गयी है और उनकी फसल को खा रही है। मेरी बुआ देखने के लिए बाहर आईं और उन्होंने सूखी हुई पत्तियों की नीचे कुछ हिलता हुआ नज़र आया। देखा तो वहां एक शिशु था और वह मैं था। मैं एक तरह से नीला-बैगनी पड़ चुका था- मौत के बिलकुल करीब।

आम तौर पर जब घर में कोई नया बच्चा आता है, परिवार वाले, दोस्त और पड़ोसी खुशियां मनाते हैं। लेकिन मेरा जन्म ऐसी घटना नहीं थी, जिसकी ख़ुशियां मनाई जा सकें। मैं अपने घरवालों के लिए कितना दुःख और बदनामी लेकर आया था। यही वजह थी कि छोटेपन में मुझे हमेशा कहा जाता था- ‘इस दुनिया में बिनबुलाया मेहमान’।

आपका बचपन कैसा था?

लोग सचमुच मुझे पसंद नहीं करते थे। मैं लोगों की खिड़कियां तोड़ता और प्रार्थना पताकाएं फाड़कर आये दिन मुसीबतें खड़ी कर देता था। मुझे अच्छी तरह याद है, किसी ने मुझसे कहा था, “तुम कभी नहीं बदलोगे। तुम सुधरने वाले नहीं हो।” पता नहीं कैसे यह बात मेरे दिमाग में घर कर गयी थी। आज भी मैं उस जगह हो देखता हूं और उन लम्हों को महसूस करता हूं। जाने कितनी बार मुझे लगता था इससे तो मर जाना अच्छा। सौभाग्य से मेरे दादा-दादी थे जो तब भी मुझे बहुत प्यार करते थे, जब मैं प्यार के जरा भी लायक नहीं था। मैं इसे महसूस कर सकता हूं क्योंकि उनकी दयालुता के कारण ही आज मैं जिंदा हूं। किसी तरह उन्होंने मेरे भीतर कुछ महसूस किया, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने तय किया कि मुझे बदलने का एक ही रास्ता है- मुझे मठ में भेज दिया जाये।

मेरे दादा बड़े कठोर इंसान लगते थे, लेकिन उनका हृदय बड़ा कोमल था। वह जताते नहीं थे, लेकिन उनके प्यार को आप महसूस कर सकते थे। मेरे दादा-दादी के पास ज्यादा कुछ था नहीं, लेकिन दक्षिण भारत स्थित मठ के लिए प्रस्थान करने से ठीक एक दिन पहले दादा जी ने अपने पैजामों को काट-पीटकर एक थैला बनाया और इसमें खूब सारा पैसा डालकर बाहर मेरा नाम लिख दिया। उन्होंने कहा, “इसे हमेशा अपने पास रखना और जब तक सचमुच बहुत ज़रूरत न पड़े इन्हें इस्तेमाल मत करना।” बहुत बाद में मैं इस बात को समझ पाया कि उन्हें मुझ से कितना प्यार था और किनता भरोसा मुझे पर करते थे।

इस तरह 7 वर्ष की आयु में आप घर छोड़कर मठवासी हो गए. वहां क्या हुआ?

मठ की दिनचर्या बहुत सख्त थी और अनुशासन बहुत कठोर। एक बच्चे के रूप में मेरे लिए यह कठिन था, लेकिन एक युवा साधु के रूप में मेरा दिमाग हर वक्त व्यस्त रहता था और मेरे पास कुछ और सोचने के लिए समय नहीं था। मुझे वहां की दिनचर्या, नीति, अनुशासन, गतिविधियां और मठ में किये जाने वाले तमाम कार्यों का पालन करना होता था। अच्छा बनाने में थोड़ा वक्त लगा। हर चीज़ के बारे में मेरा नजरिया नकारात्मक था, लेकिन एक बिंदु पर आकर मैंने सकारात्मक ढंग से सोचना शुरू किया। मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा और मुझे भरोसा होने लगा कि मैं भी एक अच्छा इंसान बन सकता हूं।

मेरे शिक्षक से मिली शिक्षाओं में एक थी- तुम इस ब्रहमांड में एक बहुत विशाल परिवार के बहुत-बहुत छोटे हिस्से हो। खरबों मनुष्यों और अनगिनत जीवधारियों- जीव-जंतुओं, कीड़े-मकोड़ों व पंछियों के बीच एक अदने से इंसान.। इस बात ने मुझे अपनी चुनौतियों व कठिनाइयों के बीच दूसरे जीवों से जुड़ने में बड़ी मदद की। और जब ऐसा होता है तो हमारा फोकस बदल जाता है। शिकायत करने के बजाय आप खुद से सवाल करने लगते हैं, “अपने परिवार, अपने बड़े परिवार को उनकी कठिनाइयों से बाहर निकलने में मैं कैसे मदद करूं।”

आज मैं अपनी कठिनाइयों को छोटे बच्चों के साथ साझा करता हूं, क्योंकि उनमें से अधिकतर उन्हीं चुनौतियों का सामना कर रहे हैं जिनसे कभी मेरा वास्ता पड़ा था। मैं उन्हें यह भरोसा करने के लिए प्रोत्साहित करता हूं कि नकारात्मक होने की कतई ज़रूरत नहीं है। आज मैं जानता हूं कि मेरा जैसा तकलीफदेह बचपन भी एक तरह का आशीर्वाद है।

और कब आपको महसूस हुआ कि आप अपने अनुभवों को किसी सकारात्मक अंजाम में बदलना चाहते हैं?

मेरा ख़याल है कि बच्चों के समाज की स्थापना के बीज मेरे भीतर बहुत छोटी उम्र से थे।

जब मठ में मेरी परवरिश हो रही थी मेरे शिक्षक हमेशा इस बात की शिक्षा देते थे कि अपनी ज़िन्दगी में कुछ-न-कुछ अर्थपूर्ण ज़रूर करो। वह हमें प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करते थे और उसके बाद अपने और दूसरों के लिए कुछ-न-कुछ उपयोगी काम करने का ज़ज्बा पैदा करते थे।

उन दिनों जब भी मैं घर आता था, देखता था कि यहां सारे बच्चे उसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं- कुछ करने के लिए यह सीधा सन्देश था। तब इस तरह के काम का मुझे कोई तजुर्बा नहीं था, आज जो मैं करता हूं, उसे कर पाने के लिए मेरे पास पर्याप्त शिक्षा नहीं थी। लेकिन अपने अनुभव के आधार पर मैं कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने के बारे में बोलता था।

आज मेरे पास जो कुछ भी है वह औरों की दयालुता की वजह से है। और अब मेरे सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि उस दयालुता की कीमत चुकाऊँ। मैं खुद को याद दिलाता हूं कि मेरा बचपन भले ही कठिन रहा हो, मैं उनमें आस्था और भरोसा कभी नहीं खोऊंगा।

आपके बाल समाज के नाम का क्या महत्व है?

झाम्त्से गत्सल का मतलब है- ‘प्रेम और दयालुता का उपवन’। यहां हम जो कुछ कर रहे हैं, उसे यह नाम पूरी सच्चाई से अभिव्यक्त करता है। इन बच्चों को परिवार, प्रेम और अपनेपन के अहसास की ज़रूरत है।

यही कारण है कि मैंने इसे बाल समाज कहने का निर्णय लिया- यह उनका परिवार है, उनका समाज है और उनकी ज़िन्दगी है। झाम्त्से गत्सल में बच्चे अनाथ नहीं हैं। यहां उनके माता-पिता हैं, उनकी कई मांएं हैं, कई पिता हैं और कई-कई भाई-बहन हैं, जो उनका ख़याल रखते हैं। यहां उन्हें वह सब ख़याल, प्यार और मदद मिलती है, जिसके वे हकदार हैं।

और आपने यह समाज यहां क्यों शुरू किया?

यह इलाका (अरुणाचल प्रदेश का तवांग जिला) आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से सर्वाधिक पिछड़े इलाकों में एक है। जब 2006 में हमने शुरुआत की, तब यह जगह इतनी दूर थी कि हम आपसी बातचीत में इसे जुरासिक पार्क का रास्ता कहते थे। एक छोटे से कस्बे से 6-7 किलोमीटर के मोटर के सफ़र के बावजूद ऐसे घने जंगल से गुजरना पड़ता था, जहां दिन के समय भी आप अकेले जाने में घबराएंगे।

इसलिए एक तरह से मैं महसूस करता हूं कि हमारा बाल समाज भी शुरुआत भी एक अनाथ की तरह हुई। यह वास्तव में कोई शानदार जगह नहीं थी, जहां लोग अच्छा काम करना पसंद करते।

यहां के बच्चे कौन है और वे कहां से आते हैं?

हमारे बच्चों में ज्यादातर पहले पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं। जब हम गावों में जाते हैं तो परिवार के सबसे तेज-तर्रार बच्चे को नहीं चुनते, बल्कि हम पूछते हैं- कौन सबसे चुनौतीपूर्ण बच्चा है? ऐसा कौन सा बच्चा है जिसे कोई नहीं चाहता?

हमारा काम उस बच्चे को स्वीकार करना है जिसकी कोई और देखभाल नहीं कर सकता और कोई करना भी नहीं चाहता। और उस बच्चे को सबसे शानदार इंसान में बदलने में मदद करना।

और यह आप सिर्फ प्यार और दयालुता के सहारे करते हैं?

हमारे बच्चों में लगभग सभी ने अपने-अपने गांव में बड़ा कठिन बचपन गुज़ारा है। लोग कहते हैं, “हे भगवान्, तुम्हें डॉक्टर की ज़रूरत पड़ेगी, तुम्हें मनोवैज्ञानिक बुलाना पड़ेगा, मनोचिकित्सक ही इन बच्चों को ठीक कर सकता है।” लेकिन अपने आठ साल के इतिहास में हमने अपने बच्चों को किसी तरह की दवा नहीं खिलाई।

सबसे पहले मैं समझता हूं यह सब झाम्त्से गत्सल के सादगी भरे जीवन का असर है। हम बच्चे को अपनाते हैं- बिना किसी निर्णय के उसे गले लगाते हैं, अच्छा, बुरा, कैसा भी। इसके बाद हम वास्तव में उसके लिए जगह बनाने की कोशिश करते हैं और उसके साथ सहयोगपूर्ण बर्ताव करते हैं।

इसके बाद सब प्रेम की ताकत है। ख़याल रखने की ताकत या दयालुता की ताकत जो हम हर बच्चे को देते हैं. और यह प्रत्येक बच्चे के लिए मरहम का काम करता है। और मुझे पक्का भरोसा है कि यह उपाय काम करता है। बेशक इसमें समय लगता है, लेकिन अंततः बच्चे बदल जाते हैं।

हमारे बाल समाज में बच्चे जो कुछ भी करते हैं, उसके लिए बराबर के भागीदार होते हैं। इससे उनमें जिम्मेदारी का अहसास पैदा होता है और वे समझ जाते हैं कि कैसे सक्रिय भागीदार बना जाता है।

मेरी समझ से यह स्वाभाविक है कि हमारे बच्चे निष्क्रिय लाभार्थी नहीं हैं- हमारे बच्चे उस बदलाव के सक्रिय एजेंट हैं, जो हम अपने समाज में लाना चाहते हैं। वे एक-दूसरे की मदद करते हैं, एक-दूसरे को सहारा देते हैं और काम को अंजाम तक पहुंचाते हैं- खाना पकाने, सफाई, छोटे बच्चों की देख-रेख, धोना, नहाना- हमारे समाज में होने वाले हर काम में बच्चे सक्रिय रूप से शामिल होते हैं। इस तरह देखें तो समाज होने का अहसास और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की मदद निश्चित रूप से झाम्त्से गत्सल की ख़ास बात है।

क्या आपका समाज अब भी बढ़ रहा है?

मेरे सबसे मुश्किल कामों में एक है कब और कैसे नए बच्चों को स्वीकार किया जाये। अभी हमारे पास 85 बच्चे हैं और 1000 से ज्यादा बच्चों के आवेदन पड़े हुए हैं।

रोज लोग मेरे पास आते हैं और ज्यादा बच्चों को लेने का आग्रह करते हैं। यह बहुत कठिन है, अगर मैं एक परिवार को हां कहता हूँ तो 10 अन्य को ना कहना पड़ता है। फिलहाल हमारे पास किसी भी नए बच्चे को लेने के लिए जगह और संसाधन नहीं हैं।

अंत में, आप किस चीज़ का अभ्यास करते हैं?

मेरा प्रमुख अभ्यास करुणा, स्थिरता, एकाग्रता को ज्यादा-से-ज्यादा बढ़ाने तथा धैर्य व दृढ़ता के मेरे प्रशिक्षण पर आधारित है।

अमीर या गरीब, पूर्व या पश्चिम, शिक्षित या अनपढ़, स्त्री या पुरुष- सभी मनुष्यों में एक बात सामान है- सब अपने जीवन में आनंद और खुशियों की कामना करते हैं।

मैं अपने आप को सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे अपने जीवन में एक ऐसी चीज़ मिली जिसे करते हुए इतनी ख़ुशी और आनंद की प्राप्ति होती है। यही मैं महसूस करता हूँ। मैं कितना किस्मत वाला हूं। मैं प्रार्थना करता हूं कि मैं इसी तरह के कामों को करने और आगे बढ़ाने के लिए कई जन्म लूं। इस काम को करने में मुझे अपार ख़ुशी और आनंद मिलता है।

अनुवाद : आशुतोष उपाध्याय

साभार: लेखक मंच डॉट कॉम

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