हिन्दुस्तान के इतने विशाल सिनेमा उद्योग द्वरा हर साल निर्मित की जा रही फीचर फिल्मों के बरक्स दस्तावेज़ी सिनेमा का संसार निर्माण की तुलना में बहुत छोटा है या यह कहना कि दोनों माध्यमों की तुलना ही बेकार है एकदम सटीक बात होगी. लेकिन फिर भी कुछ बात है जिसकी वजह से नया भारतीय दस्तावेज़ी सिनेमा मुख्यधारा के कथा सिनेमा के समांनातर अपनी हस्ती बनाए रखने में समर्थ है और प्रासंगिक बना हुआ है. इसकी वजह है व्यक्तियों की बजाय मुद्दों को प्रमुखता देना.

अगर हम इस तर्क को दस्तावेज़ी सिनेमा के सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण नाम आनंद पटवर्धन से ही शुरू करें तो पायेंगे कि 1974 से अब तक बनी  उनकी छोटी –बड़ी 17 फिल्में विभिन्न मुद्दों का संधान करती रही हैं. आनंद अपने सिनेमा के जरिये भारतीय गणतंत्र में धर्मनिरपेक्षता, अभियक्ति की आज़ादी, विश्व शांति, दलित विमर्श, पित्रसता, मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर  बहस चलाते रहे हैं . उनके बहुत सारे मुद्दे एक फ़िल्म को दूसरी फ़िल्म से जोड़ते भी हैं. जैसे ‘राम के नाम’ में वह भारतीय समाज में साम्प्रदायिकता के कारणों की खोज करते हैं और इस विमर्श की सैधान्तिकी की खोज करते हुए ‘राम के नाम’ के निर्माण के कई वर्षों बाद ‘पिता, पुत्र और धर्मयुद्ध’ का निर्माण करते हैं.

इसी तरह आनंद से अपेक्षाकृत युवा फ़िल्मकार संजय काक भारतीय गणतंत्र में लोकतंत्र की अवधारणा के मायनों की तलाश करते हुए 2003 से लेकर 2013 तक तीन लम्बी दस्तावेज़ी फिल्मों ‘पानी पर लिखा’ (नर्मदा आन्दोलन), ‘जश्ने-आज़ादी’ (कश्मीर में आज़ादी के मायने) और ‘माटी के लाल’ ( भारत का माओवादी आन्दोलन) का निर्माण करते हैं.

मुद्दों पर अपने कलाकर्म के सृजन के कारण ज्यादातर फिल्मकार उत्तरोत्तर आन्दोलनों में शरीक होकर अपने ‘कलाकार’ के स्टेट्स से परिवर्तित होकर खुद भी आन्दोलन का हिस्सा बनते गए और इस तरह सेलीब्रेटी की बजाय एक्टिविस्ट हो गए. भारतीय दस्तावेजी फिल्मों के इसी ख़ास गुण की वजह से कई एक्टिविस्ट अपने राजनीतिक विमर्श को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए इस कला माध्यम की तरफ मुड़े. झारखंड के मशहूर दस्तावेजी छायाकार और फिल्मकार बीजू टोप्पो अपने छात्र जीवन में बतौर छात्र नेता झारखंड राज्य के आन्दोलन से गहरे जुड़े थे वहीं ओड़िशा में कार्यरत राजनीतिक कर्मी देबरंजन सारंगी और सुब्रत साहू ने अपने मुद्दों को व्यापक बनाने के लिए दस्तावेज़ी फिल्मों के निर्माण का रास्ता भी चुना और अब वे समान गति और रूचि से दोनों कामों में तालमेल बिठाए हुए हैं.

मुद्दों से अपने सिनेमा को जोड़ना सिनेकारों को सहज तौर पर आम लोगों के बीच ले जाता है इसलिए न तो वे सेलीब्रेटी बन पाते हैं और न ही ऐसी कोई अभिलाषा उनके मन में जुड़ती है.

 

 

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