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लड़कियों को गहना बताकर सुरक्षा के नाम पर बंदिशें थोपी जाती हैं- प्रियंका चोपड़ा

अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने कहा कि पूरी दुनिया में औरतों से कहा जाता है कि वे दर्जे में दूसरी होती हैं मर्दों से, लेकिन ये सोच अब टूट रही है। लड़कियां भी मां-बाप के नाम को लड़कों से आगे ले जाकर चमका रही हैं। लड़कियों को समान अवसर के लिए पुरातन विचारधारा को खत्म करना होगा और कहीं हद तक हम इसमें कामयाब भी हो रहे हैं।

प्रियंका चोपड़ा ने ये बातें यूनिसेफ द्वारा बच्चों के समान अधिकारों के लिए फेयर स्टार्ट अभियान के शुभारंभ के मौके पर कहीं। उन्होंने कहा कि जब समाज के सर्वाधिक वंचित बच्चों को बेहतर व समान अवसर नहीं उपलब्ध कराया जाता तो वे और भी पीछे चल जाते हैं और असमानता का दायरा और बढ़ जाता है। इस असमानता को दूर करके गरीब और अमीर बच्चों को एक मंच पर लाकर खड़ा करना होगा, तभी भारत का यूवा भारत की सोच का सपना साकार होगा।

भारत में लड़कियों के समान अधिकार के सवाल पर प्रियंका ने कहा कि भारत जटिलताओं वाला देश है। यहां हर राज्य में एक पूरी दुनिया बसती है। यहां तमाम भाषाएं हैं, तमाम धर्म हैं और तमाम विचारधाराएं। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में लड़कियों को परिवार का गहना बता कर उसकी हिफाजत के नाम पर तमाम सामाजिक बंदिशें थोप दी जाती हैं। हमें इस विचारधारा को बदलना होगा और इसे बदलने के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा।

प्रियंका ने कहा कि सर्वाधिक गरीब घरों में बच्चे बहुत ही कम स्कूल जाते हैं, कम कमाते हैं, बाल्यावस्था में शादी की संभावना ज्यादा होती , बच्चों का विकास ठीक से नहीं होता है और वे अक्सर कार्यशील जनसंख्या में शामिल नहीं हो पाते, जिसकी वजह से गरीबी के दुष्चक्र को बढ़ावा मिलता है।

भारत में यूनिसेफ के प्रतिनिधि लुईस जोर्जिस आर्सेनाल्ट ने भारत के गरीब बच्चों पर हाल ही में जारी एक रिपोर्ट का उल्लेख करते कहा कि वर्तमान में, भारत में 6.1 मिलियन बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं, लगभग 10 मिलियन बच्चे काम में लगे हुए हैं, यहां 42 फीसदी आदिवासी बच्चे अपने वृद्धि और विकास के लिहाज से बौनेपन के शिकार हैं और लगभग भारत की आधी आबादी यानी लगभग 564 मिलियन बच्चे खुले में शौच करते हैं। भारत में लड़कियों को भी जीवन में बराबरी का हक पाने का अधिकार है, लेकिन औसतन 15 से 19 वर्ष की आयु सीमा की 23 फीसदी लड़कियां किसी न किसी स्तर पर शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होती हैं।

लुईस ने कहा कि इन तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए यूनिसेफ इंडिया ने अपने सोशल मीडिया अभियान के तहत 'फेयर स्टार्ट' अभियान शुरू किया है। इस अभियान के ज़रिए समाज में व्याप्त असमानता जिसका सामना भारत में ज्यादातर बच्चे करते हैं, जिसकी वजह से उनका जीवन, बढ़ोतरी और विकास प्रभावित हो रहा है पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

बता दें कि यूनिसेफ ने फेयर स्टार्ट के ज़रिए समाज के निम्न तबके के कुछ प्रतिभाशाली बच्चों को चुना और समाज में बच्चों में फैली असमानता पर एक फिल्म तैयार की है। 'ए फेयर स्टार्ट' फिल्म का निर्माण भारत में व्याप्त विषमताओं के एक बहुत व्यापक दायरे को ध्यान में रखकर किया गया है। इस फिल्म को बनाने वाले बच्चे कहते हैं, हमें फेयर स्टार्ट पाने का हक है।

इस समूह के बच्चे अपने जीवन की वास्तविकताओं को फिल्म की सेट पर रेखांकित करते हैं, जिसके जरिए विभिन्न

पृष्टभूमि के लाखों बच्चों के जीवन पर दृष्टि पड़ती है। जिनके पास अपार क्षमता है, लेकिन उन्हें स्वस्थ और सुरक्षित जीवन के अवसर उपलब्ध नहीं हैं, वे स्कूल नहीं जा पाते, वे सीख नहीं पाते, और इससे भी अधिक उनकी जल्दी शादी कर दी जाती है।

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श्री राम शर्मा

राम शर्मा

पत्रकारिता की शुरुआत दैनिक हिन्दुस्तान अख़बार से की। करीब 5 साल हिन्दुस्तान में सेवाएं देने के बाद दिल्ली प्रेस से जुड़े। यहां प्रतिष्ठित कृषि पत्रिका फार्म एन फूड में डिप्टी एडिटर के तौर पर करीब 8 साल काम किया। खेती-किसानी के मुद्दों पर देश के विभिन्न हिस्सों की यात्राएं करते हुए तमाम लेख लिखे। वे ऑल इंडिया रेडियो से भी जुड़े हुए हैं और यहां भी खेती-किसानी की बात को विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से प्रमुखता से उठाते रहते हैं। वर्तमान में डीडी न्यूज दिल्ली से जुड़े हुए हैं।

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