शोध के नाम पर…

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हरिपाल त्यागी मेरा दोस्त है—बहुत प्यारा और क़दीमी। उसके साथ मेरी दोस्ती की उम्र आधी सदी से ऊपर हो चुकी है। मुझे याद है, दिल्ली प्रेस की लोकप्रिय पत्रिका मुक्ता की शुरुआत 1961 में हुई थी और तभी उसमें संस्कृत-नाटककार शूद्रक की रचना मृच्छकटिकम् का हिंदी-अनुवाद भव्य रूप में प्रकाशित करने की योजना बनाई गई थी। भव्य रूप में अर्थात कलात्मक चित्रों के साथ। चित्रांकन के लिए चयन किया गया था हरिपाल त्यागी का। उन दिनों मेरे छात्र-जीवन के दोस्त भीमसेन त्यागी दिल्ली प्रेस में संपादक के पद पर कार्य कर रहे थे। यह ग़ालिबन 1962 की दूसरी तिमाही की बात है, मैं कलकत्ता से सपरिवार दिल्ली आकर उनके घर में ठहरा हुआ था। तभी एक रविवार को हरिपाल वहाँ आए और उनसे मेरा परिचय हुआ। उस पहली मुलाक़ात में ही उन्होंने मेरी पाँच-छह वर्षीय बिटिया दीपा का बहुत जीवंत रेखाचित्र बनाया था। जिस तरह पलक झपकते उन्होंने वह रेखाचित्र बनाया, उसे देखकर मैं उनकी प्रतिभा का क़ायल हो गया था। फिर तो वह दोस्ती परवान चढ़ती ही गई, यहाँ तक कि 1970 के जुलाई महीने में जब मैं कलकत्ता को हमेशा के लिए अलविदा कहकर सपरिवार दिल्ली आया, तो लगभग एक महीने तक पूरे लाव-लश्कर के साथ उनके पास ही रहा था और उन्हीं के प्रयासों से मुझे करौलबाग़ में किराए का सुविधाजनक मकान मिला था।

हरिपाल के साथ संबंधों की इस आधी सदी से ज्य़ादा के दौर में मैंने पाया कि वे मुँहफट होने की हद तक साफ़गो तथा कला के मामले में—कला ही नहीं, किसी भी मामले में—समझौतों के घोर विरोधी हैं और शायद उनके व्यक्तित्व का यह पहलू ही उन्हें धुर-साम्यवादी आंदोलन में खींच ले गया था।

इस पृष्ठभूमि में जब हरिपाल त्यागी की व्यंग्य-दृष्टि  शीर्षक लघु शोधप्रबंध मेरे सामने आया, तो मेरा उसके प्रति आकर्षण स्वाभाविक था और मैंने इसे रुचिपूर्वक पढऩा शुरू किया, लेकिन मेरी रुचि ज्य़ादा देर तक बरक़रार नहीं रह सकी, जल्दी ही मेरा मोहभंग हो गया। पूरी पुस्तक पढऩे का धैर्य मुझमें नहीं रह गया था, फिर भी इसे आद्योपांत पढ़ा यह देखने के लिए कि लघु ही सही, शोधप्रबंध के नाम पर कितना निम्नस्तरीय काम किया जा सकता है। अकसर कहा जाता है कि घटिया चीज़ों की, आलोचना के लिए भी, चर्चा करके उन्हें महत्व न दो—किसी शायर के शब्दों में, बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा। ऐसी स्थिति में सुधी जनों द्वारा घटिया चीज़ों की अनदेखी करना ही उचित ठहराया गया है। लेकिन घटिया शोधप्रबंधों के लेखन-प्रकाशन से बौद्धिक-जगत की अपूरणीय क्षति हो रही है। इस प्रवृत्ति पर कोई कारगर अंकुश लगना ही चाहिए और इसके लिए ज़रूरी है कि ऐसे शोधप्रबंधों के घटियापन की अनदेखी न करके उसे उजागर किया जाए। लिहाजा पुस्तक पढ़ते समय जो बातें खटकीं, उनका सिलसिलेवार ब्यौरा प्रस्तुत है।

सबसे पहले संदर्भ-ग्रंथ सूची, क्योंकि शोधप्रबंध का महल इसी की बुनियाद पर टिका होता है। इस सूची में हरिपाल त्यागी की तीन पुस्तकें आधार-ग्रंथों के रूप में गिनवाई गई हैं : अधूरी इबारत, महापुरुष  और आदमी से आदमी तक।  पहली दो पुस्तकों के नाम तो ठीक, लेकिन तीसरी पुस्तक के बारे में कई आपत्तियाँ हैं। बुनियादी आपत्ति तो यह कि इसे हरिपाल त्यागी एवं भीमसेन त्यागी की कृति बताया गया है, जबकि इसमें लेखन भीमसेन त्यागी का है और हरिपाल त्यागी ने केवल उन लेखों का चित्रांकन किया है। मजे की बात यह कि इस तथ्य का उल्लेख स्वयं शोधकर्ता ने अपने प्रबंध में किया है (पृ. 55), तो फिर संदर्भ-ग्रंथ सूची में घालमेल क्यों? इतना ही नहीं, इस कृति को किसी भी दृष्टि से व्यंग्य-रचना नहीं कहा जा सकता—न शब्दचित्रों की दृष्टि से और न चित्रांकन की दृष्टि से। संभवत: यही कारण है कि इस पुस्तक को आधार-ग्रंथों में गिनवाने के बावजूद इसका कोई हवाला पूरे प्रबंध में नहीं दिया गया है।

इस पुस्तक के बारे में एक और घालमेल यह कि शोधकर्ता ने इसका प्रथम संस्करण आकृति प्रकाशन से 2010 में प्रकाशित हुआ बताया है, लेकिन इसका प्रथम संस्करण 29 वर्ष पहले 1981 के आसपास राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था। प्रथम संस्करण के प्रकाशन में 29 वर्षों के इस घालमेल के निहितार्थ डॉक्टर रामविलास शर्मा के एक प्रसंग से समझे जा सकते हैं। पिछली सदी के सातवें और आठवें दशक में मुझे राजकमल से उनकी नई-पुरानी काफी पुस्तकें प्रकाशित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। सामान्यतया उनकी हर पांडुलिपि को प्रकाशन-कार्यक्रम में प्राथमिकता दी जाती थी, किंतु एक पुस्तक की पांडुलिपि कुछ अपरिहार्य कारणों से लगभग एक वर्ष बाद प्रकाशित हो सकी। मैंने पुस्तक में सम्मिलित उनकी भूमिका के अंत में दी गई एक वर्ष पुरानी तारीख बदलकर प्रकाशन के समय की तारीख दे दी। इस बात से वे बहुत नाराज हुए। उनका तर्क था कि भूमिका में व्यक्त उनके विचार एक वर्ष पहले के हैं—इस तथ्य के साथ छेड़छाड़ करना अकादमिक बेईमानी है। नतीजतन हमें पूरे संस्करण की प्रतियों में तारीख का संशोधन कराना पड़ा था।

सहायक ग्रंथों की सूची में एक पुस्तक है—आधुनिक हिंदी काव्य में व्यंग्य, जिसके लेखक का नाम बताया गया है बनारसी लाल चतुर्वेदी। पूरे प्रबंध में इस पुस्तक का सिर्फ  एक हवाला पृ. 22 पर है और वहाँ लेखक का नाम दिया गया है बनारसीदास चतुर्वेदी। बनारसी लाल चतुर्वेदी नाम का कोई लेखक हिंदी में नहीं है। अलबत्ता बनारसीदास चतुर्वेदी नाम के एक प्रख्यात लेखक हैं, तो पाठक स्वभावत: समझेगा कि पुस्तक उन्हीं की है (हो सकता है कि स्वयं शोधकर्ता को भी यह गलतफहमी रही हो), किंतु यह पुस्तक उनकी नहीं है। इसके लेखक दरअस्ल बरसानेलाल चतुर्वेदी हैं।

रागदरबारी के प्रथम संस्करण का वर्ष 1980 बताया गया है, जोकि वास्तव में 1968 है। सन् 1969 में तो इस उपन्यास को साहित्य अकादमी पुरस्कार ही मिल गया था।

हरिशंकर परसाई की पुस्तक सदाचार का ताबीज  के विवरण में लिखा गया है : ”ज्ञानपीठ प्रकाशन, प्रथम संस्करण (कैफियत पत्रिका)1975″। पूरे प्रबंध में इस पुस्तक का भी सिर्फ एक हवाला पृ. 67 पर है और वहाँ संदर्भ-संकेत में लिखा गया है : ”कैफियत, 1975, नई दिल्ली”। पुस्तक के विषय में ये दोनों सूचनाएँ गलत व भ्रामक तो हैं ही, परस्पर विरोधी भी हैं। स्वाभाविक रूप से कोई भी पाठक जानना चाहेगा कि ”प्रथम संस्करण” पद के आगे कोष्ठक में ”कैफियत पत्रिका” लिखकर शोधकर्ता क्या बताना चाहता है। यह भी ज्ञातव्य है कि पुस्तक का प्रथम संस्करण 1975 में नहीं बल्कि 1968 में प्रकाशित हुआ था।

सहायक ग्रंथों की सूची में माक्र्स व एंगेल्स की पुस्तक को अंग्रेजी की किताब बताया गया है, जो शोधकर्ता के बौद्धिक दिवालियेपन का जीता-जागता सबूत है। अलावा इसके, संदर्भ-ग्रंथ सूची में पुस्तक व लेखक का नाम दिया गया है : साहित्य और कला माक्र्स-एंगेल्स, फ्रेडरिक एंगेल्स। यहाँ दृष्टव्य है कि शोधकर्ता ने लेखक-द्वय के नामों को पुस्तक के नाम के साथ मिला दिया है और लेखक के रूप में केवल फेडरिक एंगेल्स का नाम दिया है।

यहाँ एक बात ध्यातव्य है कि  शोध का विषय व्यंग्य होने के बावजूद संदर्भ-ग्रंथ सूची में हिंदी-व्यंग्य की एक भी पुस्तक शामिल नहीं है, सिवाय श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास रागदरबारी के। इसके विपरीत सूरसागर, बिहारी सतसई तथा हजारीप्रसाद द्विवेदी कृत कबीर  के नाम गिनवाना जरूरी समझा गया। इससे यही जाहिर होता है कि सूची को भारी-भरकम दिखाने और ग्रंथों की संख्या भी कुछ सम्मानजनक बनाने की नाकाम-सी कोशिश की गई है। यही बात ताज उन्निसा के अप्रकाशित शोध-प्रबंध के बारे में भी कही जा सकती है, जिसका संदर्भ-ग्रंथ सूची में तो नाम है, किंतु समीक्षाधीन पूरे प्रबंध में एक भी हवाला नहीं है।

सहायक ग्रंथ-सूची के अंतर्गत पत्र-पत्रिकाओं में भारतीय लेखक  के संपादक भीमसेन त्यागी एवं हरिपाल त्यागी बताए गए हैं, जबकि इस पत्रिका के संपादक अकेले भीमसेन त्यागी थे। अलबत्ता, इस पत्रिका के अक्तूबर-दिसंबर 2005 का जो अंक संदर्भित है, उसका अतिथि-संपादन हरिपाल त्यागी ने किया था, जिसका स्पष्ट उल्लेख शोधकर्ता को करना चाहिए था। लेकिन मजे की बात यह कि इस पत्रिका का नाम सिर्फ सहायक ग्रंथ-सूची में है, पूरे प्रबंध में इसका कोई हवाला नहीं है। इसी तरह ‘सापेक्ष, संपा. महावीर अग्रवाल, जुलाई-सितंबर 1996′ तथा  ‘साहित्य अमृत, संपा. डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, मार्च-अप्रैल 2005′ के नाम सूची में हैं, किंतु पूरे प्रबंध में इन पत्रिकाओं का कोई हवाला नहीं है। इसके बरक्स हंस पत्रिका का हवाला पृ.107 पर है, किंतु सूची में उसका नाम नहीं है। समकालीन भारतीय साहित्य के संपादक का नाम सूची में ‘अरुण प्रकाश’ दिया गया है, तो पृ. 102 पर इस पत्रिका के हवाले के साथ संपादक का नाम बदलकर ‘सुनील गंगोपाध्याय’ हो गया है।

यहाँ मैंने केवल उन्हीं संदर्भ-ग्रंथों की अनियमितताओं का उल्लेख किया है, जिनके बारे में मेरी व्यक्तिगत जानकारी है। असंभव नहीं है कि और ग्रंथों के विवरण में भी ऐसी अनियमितताएँ हों।

दरअस्ल, शोध-प्रबंध में शोध-सामग्री के प्रस्तुतीकरण का एक अनुशासन होता है, लेकिन जो शोधकर्ता मात्र 27 प्रविष्टियोंवाली सूची में इतनी अनियमितताएँ कर सकता है, उसके बारे में तो यही कहा जाएगा कि वह शोध-अनुशासन का क-ख भी नहीं जानता।

अब एक बात प्रबंध के ढाँचे पर। इसके कुल 112 पृष्ठों में से प्रारंभिक 16 पृष्ठों में इनर टाइटिल, कॉपीराइट पेज, समर्पण, विषय-सूची, दो शब्द, भूमिका आदि हैं और अंतिम दो पृष्ठों में संदर्भ-ग्रंथ सूची है। बचे 94 पृष्ठ। चूँकि विश्वविद्यालयों के दिशा-निर्देशों में शोधार्थी से अपेक्षित रहता है कि वह मूल विषय पर आने से पहले उस विषय का ऐतिहासिक विकास-क्रम चिह्नित करे, तो प्रस्तुत प्रबंध के लेखक ने यह कार्य अत्यंत निष्ठापूर्वक संपन्न किया है और कुल 94 पृष्ठों में से 29 यानी लगभग एक-तिहाई पृष्ठ इस विकास-क्रम को समर्पित कर दिए हैं। यह तो शरीर के अन्य अंगों की तुलना में  टाँगों को पाँच गुना लंबा कर देना हुआ। जरा सोचिए, किसी व्यक्ति के शरीर में अगर टाँगों का सचमुच यह अनुपात हो जाए, तो उसका जीवन दूभर नहीं हो जाएगा क्या!

संदर्भ-ग्रंथ सूची तथा ढाँचे पर बात बहुत लंबी हो गई, पर जरूरी थी। अब प्रबंध की मूल विषय-वस्तु पर बात करें, तो यहाँ भी यही ढाक के तीन पात नजर आते हैं। ऊपर व्यंग्य के ऐतिहासिक विकास-क्रम को जरूरत से कहीं ज्यादा लंबा खींचने की बात कही गई है। दरअस्ल, अनपेक्षित रूप से लंबा होने के बावजूद अगर इसमें कोई ठोस बात होती और लगता कि शोधकर्ता ने व्यंग्य और उसके इतिहास को संजीदगी से समझने-समझाने की कोशिश की है, तो बात कुछ बन जाती, लेकिन कहाँ! उनकी संजीदगी का एक नमूना देखिए। कबीर के काव्य में व्यंग्य की बात करते हुए फरमाते हैं : ”कबीर के काव्य में व्यंग्य को लेकर कतिपय आलोचक यह मान बैठे हैं कि ‘हिंदी में कबीर के काव्य में पहली बार व्यंग्य की मर्मभेदी शक्ति का परिचय मिलता है।'” (पृ. 18) इस वाक्य में रेखांकित चार शब्दों के प्रयोग से वाक्य का निहितार्थ क्या हो जाता है, सुधीजनों को यह समझाने की धृष्टता मैं नहीं करूँगा। बस, इतना ही कहूँगा कि लेखक अपनी अभिव्यक्ति को लेकर गंभीर नहीं है। इसका एक और उदाहरण देखिए—प्रबंध की भूमिका में शोधकर्ता लिखता है : ”अपने जीवन को आधार बनाकर खुद पर हँस सकने का साहस अन्यत्र कहीं दिखाई नहीं देता। इस दिशा में हरिपाल त्यागी ही मेरी जानकारी में पहले ऐसे रचनाकार हैं।”  अब शोधकर्ता महोदय, आप जिस विषय पर शोध करने जा रहे हैं, उसकी फस्र्टहैंड जानकारी आपको नहीं है यानी आपने हिंदी का मौलिक व्यंग्य-साहित्य न के बराबर पढ़ा है और दूसरे लेखकों द्वारा व्यंग्य पर लिखी गई चार-पाँच पुस्तकें ही आपकी जानकारी का स्रोत रही हैं, तो कोई क्या कर सकता है! आपकी जानकारी के लिए, हरिशंकर परसाई के साहित्य में खुद पर हँस सकने का साहस कूट-कूटकर भरा है।

अभिव्यक्ति के प्रति गंभीर न होने के कारण ही शोधकर्ता ने व्यंग्य का ऐतिहासिक विकास-क्रम दिखाते हुए अनेक पुनरावृत्तियाँ की हैं। उदाहरण के लिए प्रबंध के पृष्ठ 18 व 19 दृष्टव्य हैं, जहाँ एक ही बात को बार-बार दुहराया गया है। सबसे बड़ी बात यह कि इस पूरे आलेख में मुख्यतया सुदर्शन मजीठिया तथा बालेंदु शेखर तिवारी की पुस्तकों से लंबे-लंबे उद्धरणों की भरमार है और व्यंग्य के बारे में हिंदी के बड़े-छोटे तमाम लेखकों के विचार इन दो पुस्तकों से ही इस तरह उद्धृत कर दिए गए हैं कि अगर पाठक संदर्भ-संकेतों पर ध्यान न दे, तो यही समझेगा कि शोधकर्ता उन लेखकों के विचार उनकी मूल पुस्तकों से उद्धृत कर रहा है। लेकिन उसने तो रागदरबारी  के अलावा शायद ही कोई मूल पुस्तक पढ़ी हो। और तो और, हिंदी के चौबीस-पच्चीस व्यंग्य-उपन्यासों की सूची भी उसने डॉ. मदालसा व्यास की पुस्तक से उद्धृत की है (पृ. 32)। इस ‘ईमानदारी’ के लिए क्या शोधकर्ता की प्रशंसा नहीं की जानी चाहिए!

 

प्रबंध का मूल विषय ‘हरिपाल त्यागी की व्यंग्य-दृष्टि’ होने के बावजूद इस विषय को ऐतिहासिक विकास-क्रम के 29 पृष्ठों की तुलना में केवल 65 पृष्ठ आबंटित किए गए हैं। हालाँकि इन 65 पृष्ठों में भी कुछ ठोस होता, तो स्वीकार्य हो जाता, लेकिन प्रबंध के इस केंद्रीय भाग में तो मामला सारी सीमाओं का अतिक्रमण कर गया है। कैसे?….

1. पुनरावृत्तियाँ : लंबे-लंबे अनुच्छेद शब्दश: दुहराए गए हैं—

* पृ. 9 की अंतिम पंक्ति से शुरू होनेवाला 11 पंक्तियों का अनुच्छेद पृष्ठ 14, 105 व 109 पर यथावत।

* पृ. 12 का अनुच्छेद : ”व्यंग्य विसंगतिपूर्ण…..सृजनात्मक खोज है” यथावत पृ. 109 पर भी।

* पृ. 14 का अनुच्छेद : ”हरिपाल त्यागी की …. और प्रभावी हैं” यथावत पृ. 105 व 109 पर भी।

* पृ.105-106 का “हीरालाल नागर के अनुसार….प्रस्तुत करने में सक्षम है” पृ. 110 पर भी।

* पृ. 68 का ”कोई मामूली-सा….वह आदमी है” पृ. 87 पर भी।

* पृ. 68 का ”यह भविष्यवाणी सौ फीसदी….ज्यादा वास्तविक होती” पृ. 87 पर भी।

* पृ. 68 का ही “हिंदी के सबसे ज्यादा पैदल….पूजा अर्चना की जाए” पृ. 90 पर भी।

उपर्युक्त उदाहरणों में से अंतिम तीन उदाहरणों का संबंध एक और गंभीर गड़बड़ी से है, जो शोधकर्ता द्वारा हरिपाल त्यागी की पुस्तक महापुरुष का विवेचन दो स्थानों पर करने से उत्पन्न हुई। इसका विश्लेषण आगे किया जाएगा।

2.   जीवन-वृत्त के नाम पर अनावश्यक जानकारियों का अंबार : शोधकर्ता ने प्रबंध की भूमिका में लिखा है, ”किसी भी रचनाकार को उसके परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए उसके जीवन-वृत्त का बड़ा योगदान होता है।” उसकी यह प्रस्थापना एकदम सही है, लेकिन जीवन-वृत्त में से क्या लिया जाए और क्या छोड़ दिया जाए—इसका विवेक तो रखना ही पड़ेगा। विचारणीय है कि माता-पिता व भाई-बहनों और पहली व दूसरी पत्नी के साथ-साथ उनके बच्चों के विस्तृत परिचय-वृत्त हरिपाल त्यागी के रचना-कर्म को समझने में क्या सचमुच कोई भूमिका अदा करते हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो इन जानकारियों का अंबार क्यों लगाया गया? लेकिन बात ऐसे विवरण देने तक ही सीमित नहीं रही, शोधकर्ता यहाँ भी पुनरावृत्ति से बाज नहीं आया। इस संदर्भ में पृ. 41 का अंतिम अनुच्छेद और पृ. 47 द्रष्टव्य हैं। यही नहीं, बचपन में हरिपाल त्यागी को पढऩे के लिए ”अपने ताऊजी के पास (हिंदी के सुप्रासिद्ध व्यंग्यकार रवींद्रनाथ त्यागी के पिता के घर, नहटौर) जाना पड़ा”—इस घटना का विवरण पृ. 42 पर है और पृ. 48 पर भी।

जीवन-वृत्त में दुहराव एक और स्तर पर भी हुआ है। हरिपाल त्यागी का आत्मकथात्मक उपन्यास है अधूरी इबारत—उन दो आधार-ग्रंथों में से एक, जिनकी बुनियाद पर शोधकर्ता ने अपने प्रबंध का महल खड़ा किया। चूँकि यह उपन्यास आत्मकथात्मक है और प्रथम पुरुष में लिखा गया है, तो स्वाभाविक है कि इसमें उस जीवन-वृत्त की काफी बातें समाहित हैं, जिसका विस्तृत लेखा-जोखा  शोधकर्ता ने प्रबंध के दूसरे अध्याय में दिया है। अत: तीसरे अध्याय में जब वह इस उपन्यास का कथासार प्रस्तुत करता है, तो कई घटनाओं की पुनरावृत्ति होनी थी और हुई, उसे रोका नहीं जा सकता था। लेकिन इस उपन्यास के प्रसंग में एक और बड़ा गोलमाल  शोधकर्ता ने किया है। भूमिका में वह लिखता है : ”सर्वप्रथम उपन्यास की कथा-वस्तु को संक्षेप में बताया गया है। तत्पश्चात उनके व्यंग्य के लक्ष्य को समझने का प्रयास करते हुए अभिव्यक्ति के तौर-तरीके और सौंदर्यबोध तथा शैली का अध्ययन करने का प्रयास हुआ है।” इस कथन का पूर्वार्ध तो ठीक है”—उसने उपन्यास का कथासार प्रस्तुत किया है, लेकिन कथन का उत्तरार्ध? उसके कथनानुसार,  ‘व्यंग्य के लक्ष्य को समझने का प्रयास करते हुए अभिव्यक्ति के तौर-तरीके और सौंदर्यबोध तथा शैली का अध्ययन’ इस उपन्यास पर ही केंद्रित होना चाहिए था, किंतु वह किया गया है दूसरे आधार-ग्रंथ महापुरुष  को केंद्र में रखकर। इससे दो तरह के नुकसान हुए—एक तो यह कि पाठक उपन्यास के व्यंग्य-सौंदर्य तथा शैलीगत विवेचन का आनंद प्राप्त करने से वंचित रह गया; और दूसरा यह कि शोधकर्ता को इस अध्याय की महापुरुष-विषयक काफी बातें चौथे अध्याय में दुहराने के लिए विवश होना पड़ा, इस दुहराव से वह बच नहीं सकता था, क्योंकि चौथा अध्याय सिर्फ और सिर्फ महापुरुष  पर केंद्रित है। अकारण नहीं है कि महापुरुष  में त्यागी ने जिन लेखकों-साहित्यकारों के व्यंग्य-शब्दचित्र दिए हैं, उनकी नामावली चार स्थानों पर ‘अवतीर्ण’ होकर पाठकों को ‘कृतार्थ’ करती है। लेकिन इस पुस्तक के लंखक हरिपाल त्यागी द्वारा स्वयं अपने ऊपर लिखे गए शब्दचित्र के अलावा पुस्तक में कितने साहित्यकारों के शब्दचित्र शामिल हैं—आठ के या नौ के—स्पष्ट नहीं होता। पृ. 14 पर उनकी संख्या 9 बताई गई है, किंतु चार स्थानों पर ‘आविर्भूत’ नामावली में केवल 8 नाम गिनवाए गए हैं।

अंत में यही कि मात्र 112 पृष्ठों के लघु शोध-प्रबंध में ऐसी पुनरावृत्तियाँ और भ्रामक जानकारियाँ शोभनीय नहीं हैं।  पुनरावृत्तियाँ  कहीं इसलिए तो नहीं कि हरिपाल त्यागी की व्यंग्य-दृष्टि पर कहने के लिए शोधकर्ता के पास कहने के लिए कुछ खास नहीं था, और फिर भी वह चाहता था कि प्रबंध का आकार कुछ सम्मानजनक हो जाए? और क्या इस तरह के शोध-प्रबंध को एम. फिल. की उपाधि के लिए स्वीकृति देना शोध-निर्देशक और शोध-प्रबंध के परीक्षकों पर भी कई तरह के प्रश्नचिह्न नहीं लगाता?

 

चर्चाधीन पुस्तक : हरिपाल त्यागी की व्यंग्य-दृष्टि                                                                                                                                         लेखक : गणशेटवार साईनाथ नागनाथ                                                                                                                                                           प्रकाशक : आकृति प्रकाशन,एफ-29, सादतपुर एक्स., दिल्ली-110 093                                                                                                         प्रथम संस्करण : 2014, पृष्ठ संख्या : 112; मूल्य : 250 रुपए

 

साभार: ज्ञानोदय

(नोट: उक्त लेख ज्ञानोदय मार्च 2016 अंक में प्रकाशित है)

 

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