सुब्रमण्यम स्वामी सिर्फ राज्यसभा की सीट से संतुष्ट नहीं होने वाले ?

हाल ही में केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति के द्वारा राज्यसभा में नामित किए जाने के लिए जिन लोगों के नाम की अनुशंसा की, उनमें से सुब्रमण्यम स्वामी के नाम को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं. स्वामी भाजपा के नेता हैं लेकिन पार्टी की आंतरिक राजनीति में उनकी स्थिति अच्छी नहीं रही है. ऐसे में स्वामी को राष्ट्रपति के कोटे से राज्यसभा भेजने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति के कई मायने निकाले जा रहे हैं.

सुब्रमण्यम स्वामी पुराने जनसंघी हैं. इसका मतलब यह हुआ कि जब भारतीय जनता पार्टी नहीं थी और जनसंघ था तो उस वक्त भी सुब्रमण्यम स्वामी इसके हिस्से थे. उस दौर में भी जनसंघ के बड़े नेता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भी बड़े नेता यह मानते थे कि स्वामी में काफी संभावनाएं हैं. उस दौर में तो संघ के कुछ नेता उनमें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की संभावनाएं भी देखते थे.


उस दौर के जनसंघ की राजनीति को जानने वाले लोग बताते हैं कि स्वामी में धैर्य का अभाव था. इसी वजह से उन पर अटल बिहारी वाजपेयी हमेशा भारी रहे. एक दौर ऐसा भी आया जब स्वामी जनसंघ से बाहर हो गए. वाजपेयी जनसंघ और फिर भाजपा में रहे और भारत के प्रधानमंत्री बने. वाजपेयी से स्वामी की प्रतिद्वंदिता उस दौर में भी चली जब वे भारत के प्रधानमंत्री बने.

13 महीने में वाजपेयी सरकार का गिराने का श्रेय भी स्वामी को ही जाता है. दरअसल 1998 में जब भाजपा को सरकार बनाने के लिए सहयोगियों की जरूरत थी तो स्वामी ने ही जयललिता और भाजपा के बीच मध्यस्थता की थी. उनकी पार्टी तमिलनाडु में एआईएडीएमके की सहयोगी थी और मदुरै से सांसद स्वामी दिल्ली में जयललिता के प्रतिनिधि हुआ करते थे. कहा जाता है कि जयललिता का समर्थन जुटाने के एवज में संघ और भाजपा नेतृत्व ने स्वामी को कोई बड़ी जिम्मेदारी देने का वादा किया था. लेकिन जब केंद्र में वाजपेयी की अगुवाई में सरकार बनी तो यह वादा नहीं निभाया गया. जब स्वामी को यह लगा कि अब यह सरकार उनके लिए कुछ नहीं कर सकती तो उन्होंने अन्नाद्रमुक प्रमुख जयललिता और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की एक मुलाकात कराई. इसके बाद जयललिता ने वाजपेयी सरकार ने समर्थन वापस लिया और सिर्फ 13 महीने की यह सरकार गिर गई.

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