Story of Baba Jai gurudev in hindi : क्या आपने कभी ऐसा नज़ारा देखा है जब लोग सड़कों पर कपड़ों की जगह टाट पहन के अपनी मांगों के लिए आन्दोलन कर रहे हों। किसी मसाला फिल्म का सीन लगने वाला यह दृश्य एक हकीकत है। गौहत्या करने वालों के लिए फांसी की मांग, जीवों के हित में बात और  जय गुरुदेव (Jai Gurudev) के नाम के उद्घोष इस भीड़ की पहचान बन चुकी थी। मगर सवाल आता है कि ये जय गुरुदेव (Jai Gurudev) कौन हैं और उनके भक्त टाट क्यों पहन रहे थे?

दरअसल बाबा जय गुरुदेव ने ही अपने भक्तों को वस्त्रों का त्याग करने के लिए बोला था क्योंकि उनका मानना था कि ये वहीँ वलकल वस्त्र  हैं, जो राम-लक्ष्मण ने वनवास जाने पर पहने थे। हालाँकि इसका कोई प्रमाण है भी या नहीं, ये भी नहीं पता, पर बाबा गुरु जयदेव ने बोल दिया तो भक्तों के लिए वो बात प्रमाणित हो गयी। आइए खुलासा डॉट इन में जानते हैं ऐसे ही बाबा जय गुरुदेव की कहानी जिनके भक्त सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में हैं।

दुनिया भर में 20 करोड़ से ज्यादा भक्त है जय गुरुदेव (Jai Gurudev) के

आपको बता दे कि वर्ष 2012 में जय गुरुदेव के इस मोहमाया से भरे संसार को त्याग देने के बावजूद उनकी याद में जगह-जगह हजारों लोग जुट जाते हैं तथा अनुमानित है कि दुनियाभर में उनके 20 करोड़ भक्त हैं। बाबा तो दुनिया से चले गए पर अपने पीछे एक विवाद छोड़ गए। दरअसल 18 मई 2012 की रात स्थल मथुरा में जय गुरुदेव ने अपनी अंतिम सांस ली और छोड़ गए करीबन 4000 करोड़ रुपए की संपत्ति। जिसमे नगद 100 करोड़ रुपए और 150 करोड़ की 250 लग्जरी गाड़िया शामिल थीं। इस बात ने सबको चौका दिया था कि त्याग और आध्यात्मिक साधना की बात करने वाला करोड़ों का मालिक कैसे बन सकता है ? इसके लिए हमे इनके अतीत के पन्नों को पलटना पड़ेगा।

रामवृक्ष यादव का था जय गुरुदेव (Jai Gurudev) से रिश्ता

ramvriksh yadav mathura kand

आपको 2 जून 2016  मथुरा का जवाहरबाग़ कांड तो याद होगा। जिसमें पुलिस को रामवृक्ष यादव से ज़मीन खाली कराने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ा था। तकरीबन 270 एकड़ ज़मीन पर कब्ज़ा ज़माकर रामवृक्ष यादव अपनी ही सत्ता का आनंद ले रहा था। जब पुलिस वहां ज़मीन खाली कराने पहुंची तो उसके भक्तों ने हमला कर दिया, जिसमे दो पुलिस अफसरों की मौत भी हो गई थी। जवाबी कारवाही में 27 लोग मारे गए। अब आप सोच रहे होंगे इस बात का जय गुरुदेव से क्या नाता है? तो आपको बता दे कि रामवृक्ष यादव जय गुरुदेव को अपना गुरु मानते था।

इटावा में हुआ था जय गुरुदेव (Jai Gurudev) का जन्म

who is popularly known as Baba Jai Gurudev ji Maharaj

जय गुरुदेव का जन्म कब हुआ इसकी किसी को कोई प्रमाण नहीं है, हालाँकि उनके भक्त मानते है कि यूपी का इटावा ही वो जगह है जहाँ उनका जन्म 1896 में हुआ था। उनके बचपन का नाम तुलसीदास था तथा उनके गुरु का नाम श्री घूरेलाल जी थे। वो कई सालों तक अपने गुरु के पास अलीगढ़ के चिरौली ग्राम में रहे। उनके भक्तों के अनुसार गुरुदेव के गुरु घूरेलाल ने उनसे मथुरा में किसी एकांत जगह पर अपना आश्रम बनाकर ग़रीबों की सेवा करने के लिए कहा था। 1948 में घूरेलाल ने शरीर को छोड़ दिया, जिसके बाद वर्ष 1953 में गुरुदेव ने मथुरा के कृष्णा नगर में चिरौली संत आश्रम की स्थापना की। वर्ष 1962 में मथुरा के मधुवन क्षेत्र में डेढ़ सौ एकड़ ज़मीन उन्होंने ख़रीद ली, जो कि आगरा-दिल्ली हाईवे पर स्थित थी। इस भूमि पर जय गुरुदेव आश्रम के नाम पर एक एक अलग ही दुनिया का निर्माण किया गया।

जयगुरुदेव (Jai Gurudev) ने अपने गुरु की याद में बनवाया मंदिर

Jai gurudev temple mathura

वर्ष 1973 में जय गुरुदेव ने अपने गुरु घूरेलाल की याद में एक मंदिर बनवाना शुरू किया और उसे नाम दिया योग साधना मंदिर। 160 फुट ऊंचे इस मंदिर के निर्माण में सफेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया जिसके चलते यह बिलकुल ताजमहल जैसा दिखता है।  29 साल की मेहनत के बाद वर्ष 2002 में यह मंदिर बनकर तैयार हुआ | यह मंदिर देखने में मंदिर-मस्जिद का मिलाजुला रूप लगता है। माना जाता है कि गुरुदेव मुस्लिम और हिंदू दोनों को अपना भक्त बनाने की कोशिश के चलते ऐसा किया था और हिन्दुओं की ही तरह मुस्लिम भी उनकी शरण में न आ सके।

जयगुरुदेव (Jai Gurudev) ने खुद को किया सुभाषचंद्र बोस (Subhas Chandra Bose) घोषित

13 जनवरी 1975 को कानपुर के फूलबाग के नानाराव पार्क में एक रैली होनी थी, जिसकी तैयारी कई महीनों से चल रही थी। जय गुरुदेव ने दावा किया था कि इस रैली में खुद नेताजी सुभाष चंद्र बोस आ रहे हैं। नेताजी के लिए माना जाता है कि प्लेन क्रैश में उनकी अकाल मृत्यु हो चुकी है। पर जब लोगों ने इस तरह का दावा सुना तो वो खुद को पार्क तक जाने से रोक नहीं पाए। मंच पर जय गुरुदेव के आने के बाद सबकी निगाहें नेताजी को ढूंढने लगी तभी गुरुदेव ने दोनों हाथ उठाकर कहा कि मैं ही हूं सुभाष चंद्र बोस। इस तरह की बचकानी हरकत ने लोगों के गुस्से को भडकाने का काम किया। मंच पर चप्पल और पत्थर की बरसात होने लगी। गुस्साई भीड़ पर काबू पाने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया, जिसका फायदा उठा कर बाबा वहां से भाग खड़े हुए। इस नौटंकी के बावजूद उनके प्रति लोगों की आस्था कम नहीं हुई।

इमरजेंसी (Emergency) के दौरान जाना पड़ा जेल

29 जून 1975 को  इमरजेंसी के दौरान जय गुरुदेव को जेल जाना पड़ा। पहले आगरा जेल और फिर बरेली की सेंट्रल जेल में गुरुदेव को रखा गया। जेल के बाहर भक्तों की भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी, जिसके चलते उसे एक बार फिर शिफ्ट करते हुए बैंगलोर की जेल में भेजना पड़ा और उसके बाद दिल्ली की तिहाड़ जेल में शिफ्ट कर दिया गया। 23 मार्च 1977 को 3 बजे रिहा हुए। उसके बाद से प्रतिवर्ष उनके भक्त इस दिन को मुक्ति दिवस के रूप में मनाते है तथा 3 बजे तक व्रत रखते हैं।

जयगुरुदेव (Jai Gurudev) ने बनाई दूरदर्शी नामक पार्टी

24 मार्च 1980 को जय गुरुदेव ने दूरदर्शी नामक एक पार्टी बनाते हुए वर्ष 1989 के लोकसभा चुनावों में 12 राज्यों की 298 सीटों पर अपने उमीदवार को उतारा। उन्होंने खुद भी चुनाव लडा, पर हर क्षेत्र में उन्हें मुंह की खानी पड़ी। आलम यह था कि वर्ष 1997 में इस पार्टी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया गया।

जयगुरुदेव (Jai Gurudev) के दामन पर भी हैं कई दाग

अन्य बाबाओं की तरह जय गुरुदेव के दामन में कई दाग है जैसे साल 2000 में उत्तर प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (यूपी एसआईडीसी) ने उन पर सैकड़ों एकड़ औद्योगिक जमीन हड़पने का आरोप लगाते हुए यूपी एसआईडीसी ने 16 केस मथुरा कोर्ट में दर्ज कराये थे। इतना ही नहीं आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के मुताबिक जय गुरुदेव के भक्तों ने 14 ऐसे टीलों को नुकसान पहुंचाया जो ऐतिहासिक तौर पर महत्व रखते थे।  मथुरा के पूर्व डीएम संजीव मित्तल के अनुसार उनके आश्रम द्वारा किसानों की जमीनों पर अवैध कब्जा करने की 23 शिकायतें मिली थीं।

जयगुरुदेव (Jai Gurudev) के वारिसाना हक के लिए बने दो गुट

जब वर्ष 2012 में गुरुदेव ने इस दुनिया को अलविदा कहा तो उनकी संपत्ति पर हक़ ज़माने के लिए दो गुटों का निर्माण हुआ जिसमे एक गुट बाबा के ड्राइवर पंकज यादव का और  दूसरा गुट उमेश तिवारी का था। जय गुरुदेव की तेरहवीं की शाम बाबा के एक प्रमुख भक्त फूल सिंह ने सबके सामने एक चिट्ठी पढ़कर सुनाई। उसका दावा था कि ये चिट्ठी खुद गुरुदेव ने लिखी थी। इस चिट्ठी के अनुसार 20 जुलाई 2010 को बाबा ने इटावा की सिविल कोर्ट में लिखित में दिया था कि उनके बाद पंकज यादव को उनका वारिस बनाया जाए। इस चिट्टी ने कई विवादों को जन्म दिया परन्तु आखिर में पंकज उत्तराधिकारी बने। तभी एक तीसरा गुट सामने आया जो कि रामवृक्ष यादव का था।

जयगुरुदेव (Jai Gurudev) की मौत की आड़ में रामवृक्ष यादव ने कब्जाई थी जमीन

मथुरा के जवाहरबाग़ में धरना देने के लिए रामवृक्ष यादव ने दो दिन के लिए सरकारी ज़मीन मांगी थी क्योंकि वो बाबा गुरुदेव की मौत का सर्टिफिकेट मांग रहा था। इसके बाद यादव ने धीरे-धीरे वहां की 270 एकड़ ज़मीन कब्जा ली और अपने समर्थकों के साथ एक अलग ही दुनिया का निर्माण कर दिया। जब जब पुलिस जगह खाली कराने वहां गयी उसने बड़ी चालाकी से हमेशा औरतों बच्चों, बुजुर्गों को आगे कर दिया। आखिरकार पुलिस से संघर्ष हुआ और गुरुदेव के चेले को हमेशा हमेशा के लिए मिटटी में मिला दिया गया।

Baba Jai Guru Dev : बेनाम बाबा की ‘सत्‍यकथा’

 

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