भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ ने परीक्षण का एक और दौर पार करते हुए भारतीय नौसेना की ताकत को कई गुना बढ़ा दिया है। हाल ही में नौसेना के स्वदेशी विध्वंसक पोत ‘स्टील्थ डिस्ट्रॉयर आईएनएस चेन्नई’ से इस मिसाइल परीक्षण के दौरान अरब सागर में एक लक्ष्य पर निशाना साधा गया और ‘ब्रह्मोस’ ने उसे बेहद सटीकता से भेद दिया। इससे पहले 30 सितम्बर को भी उड़ीसा के चांदीपुरा में ब्रह्मोस के सतह से सतह पर मार करने वाले नए प्रारूप का सफल परीक्षण किया गया था।

ब्रह्मोस भारत के लिए सामरिक दृष्टिकोण से कितनी महत्वपूर्ण है, यह इसी से स्पष्ट है कि दुनिया का सबसे बेहतरीन ऑटोमेटिक इलैक्ट्रॉनिक गाइडेड मिसाइल इंटरसेप्ट सिस्टम भी 20-30 ब्रह्मोस मिसाइलों को अकेले नहीं रोक सकता। डीआरडीओ के मुताबिक ब्रह्मोस एक ‘प्राइम स्ट्राइक वेपन’ है, जिससे हमारे जंगी जहाजों को लंबी दूरी तक सतह से सतह पर वार करने में मदद मिलेगी।

ब्रह्मोस की शक्ति का अहसास इससे भी हो जाता है कि चीनी सेना कहती रही है कि भारत द्वारा अरूणाचल सीमा पर ब्रह्मोस की तैनाती किए जाने से उसके तिब्बत और यूनान प्रांत पर खतरा मंडराने लगा है। यह देश की सबसे आधुनिक और दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइल मानी जाती है, जो पहाड़ों की ओट में छिपे दुश्मन के ठिकानों को भी निशाना बना सकती है। भारत जिस प्रकार पिछले कुछ दिनों से एक के बाद सफल मिसाइल परीक्षण कर रहा है, वह टाइमिंग के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है और इसे भारत-चीन के बीच गहरा रहे सीमा विवाद के समय में चीन को कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय वायुसेना और नौसेना के बेड़े में शामिल चुनिंदा सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल ब्रह्मोस के सफल परीक्षणों के बाद तो भारत की सामरिक ताकत काफी बढ़ गई है। यह अमेरिका की टॉम हॉक मिसाइल के मुकाबले करीब चार गुना तेजी से हमला कर सकती है। टॉम हॉक के मुकाबले इसकी प्रारंभिक गतिज ऊर्जा करीब 32 गुना अधिक है।

दुश्मन के लिए बेहद खतरनाक मानी जाने वाली ब्रह्मोस भारत-रूस के संयुक्त प्रयासों द्वारा विकसित की गई अब तक की सबसे भरोसेमंद आधुनिक प्रक्षेपास्त्र प्रणाली है, जिसने भारत को मिसाइल तकनीक में अग्रणी देश बना दिया है। इसे राफेल तथा सुखोई-30एमकेआई के अलावा नौसेना के मिग-29के में भी तैनात किया जा सकता है। ब्रह्मोस को रूस के एनपीओ मैशिनोस्ट्रोनिया (एनपीओएम) के साथ मिलकर भारत के डीआरडीओ ने तैयार किया है। रूस द्वारा इस परियोजना में प्रक्षेपास्त्र तकनीक उपलब्ध कराई जा रही है जबकि उड़ान के दौरान मार्गदर्शन करने की क्षमता डीआरडीओ द्वारा विकसित की गई है। ब्रह्मोस की रेंज पहले 290 किलोमीटर तक थी, जिसे बढ़ाकर 400 किलोमीटर से ज्यादा कर दिया गया है। पलक झपकते ही दुश्मन के ठिकानों को नष्ट करने के लिए ब्रह्मोस को पनडुब्बी, युद्धपोत, लड़ाकू विमान या जमीन से अर्थात् कहीं से भी दागा जा सकता है। यह प्रमुख रूप से पनडुब्बियों, जहाजों और नौकाओं को निशाना बनाने में मददगार साबित होगी। ब्रह्मोस रैमजेट सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ध्वनि की रफ्तार से भी तीन गुना तेजी से अपने लक्ष्य पर वार कर सकती है। इसकी रफ्तार करीब 3457 किलोमीटर प्रति घंटा है और इसकी बड़ी विशेषता यह है कि यह आसानी से दुश्मन के रडार से बच निकलने में सक्षम है। ‘ब्रह्मोस’ नाम दो नदियों, भारत की ब्रह्मपुत्र नदी के ‘ब्रह्म’ और रूस की मोस्क्वा नदी के ‘मोस’ को मिलाकर बना है।

यह मध्यम दूरी तक मार करने वाली रैमजेट इंजन युक्त सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। अभी तक चीन और पाकिस्तान के पास भी ऐसी क्रूज मिसाइलें नहीं हैं, जिन्हें जल, थल और नभ तीनों जगहों से दागा जा सकता है। क्रूज प्रक्षेपास्त्र वे होते हैं, जो कम ऊंचाई पर भी बहुत तेज गति से उड़ान भरते हैं और दुश्मन देशों के रडार की नजरों से बचे रहते हैं। ब्रह्मोस 10 मीटर की ऊंचाई पर भी उड़ान भर सकती है और यह रडार के साथ-साथ किसी भी अन्य मिसाइल पहचान प्रणाली को धोखा देने में सक्षम है, इसीलिए इसे मार गिराना लगभग असंभव है। डीआरडीओ रूस के सहयोग से ब्रह्मोस की मारक दूरी बढ़ाने के साथ इन्हें हाइपरसोनिक गति पर उड़ाने पर भी कार्य कर रहा है। यह दो सैकेंड के भीतर 14 किलोमीटर की ऊंचाई हासिल कर सकती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हवा में ही रास्ता बदल सकती है और फिर भी अपने निर्धारित लक्ष्य को सटीकता से भेद सकती है। यह अपने लक्ष्य के करीब पहुंचने से महज 20 किलोमीटर पहले अपना रास्ता बदल सकने वाली तकनीक से लैस है। ध्वनि के वेग से करीब तीन गुना अधिक 2.8 मैक गति से अपने लक्ष्य पर जबरदस्त प्रहार करने में सक्षम यह दुनिया में अपनी तरह की ऐसी एकमात्र क्रूज मिसाइल है, जिसे सुपरसॉनिक गति से दागा जा सकता है। इसके दागे जाने के बाद दुश्मन को संभलने का मौका ही नहीं मिलता क्योंकि यह पलक झपकते ही दुश्मन के ठिकाने को नष्ट कर सकती है।

रैमजेट इंजन की मदद से इसकी मारक क्षमता को तीन गुना तक बढ़ाया जा सकता है। यदि किसी मिसाइल की क्षमता 100 किलोमीटर दूरी तक है तो उसे इस इंजन की मदद से बढ़ाकर 320 किलोमीटर तक किया जा सकता है। आम मिसाइलों के विपरीत ब्रह्मोस हवा को खींचकर रैमजेट तकनीक से ऊर्जा प्राप्त करती है और 1200 यूनिट ऊर्जा पैदा कर अपने लक्ष्य को तहस-नहस कर सकती है। ब्रह्मोस की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि इसे पारम्परिक प्रक्षेपक के अलावा वर्टिकल अर्थात् नौसैनिक प्लेटफार्म से लंबवत और झुकी हुई दोनों ही अवस्था में दागा जा सकता है और ये हवा में ही मार्ग बदलकर चलते-फिरते लक्ष्य को भेदने में भी सक्षम है।

ब्रह्मोस के दागे जाने के बाद लक्ष्य तक पहुंचते-पहुंचते उसका लक्ष्य अपना मार्ग बदल ले तो यह मिसाइल भी उसी के अनुरूप अपना मार्ग बदल लेती है और उसे आसानी से निशाना बना लेती है। बहरहाल, नई तकनीक से विकसित ब्रह्मोस के नए संस्करणों के सफल परीक्षण के बाद भारतीय सेना के तीनों अंगों की मारक क्षमता और बढ़ गई है और अब ब्रह्मोस की बदौलत भारत जल, थल तथा नभ तीनों ही जगह अपने लक्ष्य को सटीकता के साथ भेदने की क्षमता हासिल करते हुए दुश्मन के ठिकानों को पलक झपकते ही नेस्तनाबूद करने में सक्षम हो गया है।

-योगेश कुमार गोयल

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