चार्ल्स डार्विन जिन्हें विकास वाद के सिद्धांत के लिए संसार भर में जाना जाता है। वैसे तो डार्विन तामाम उम्र सभी तरह के धर्मों का खुलकर विरोध करते हैं। उनके लेखों व कई किताबों में उनके द्वारा ईसाइयत का विरोध साफ तौर पर नजर आता है। मगर आपको जानकर आश्चर्य होगा कि डॉर्विन का विकास वाद का सिद्धांत हिंदुओं के पुराणों में दिए गए दशावतारों के काफी निकट है। आप को जानकर हैरानी होगी कि डॉर्विन के विकास वाद का सिद्धांत और पुराणों में वर्णित दशावतार के सिद्धांतों में समानता की चर्चा विवेकानंद ने भी की।

द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़ : बाय मीन्स ऑफ नैचुरल सलेक्शन  तथा मंकी ट्रायल

नवबंर 1859 में डार्विन ऐतिहासिक किताब ‘ऑन द ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़ : बाय मीन्स ऑफ नैचुरल सलेक्शन’ प्रकाशित हुयी जिसने मानव जीवन के रहस्यों परत दर परत खोल के रख दिया था तथा इस किताब को जैव विकास से जुड़े विज्ञान की बुनियाद माना जाने लगा | किताब जब छप कर लोगो के बीच पहुची तो हर तरफ डार्विन का जमकर विरोध होने लगा, जिससे डार्विन इतने आहत हुए कि उन्होंने इस अनुभव की तुलना नर्क से की थी | जब लोगो ने इस बात को पढ़ा की वो वानर का वंशज हैं तो अमेरिका औऱ यूरोप के कई लोग बुरी तरह प्रभावित हुए तथा परिणामस्वरूप यूरोप के स्कूल-कॉलेजों में डार्विन की थ्योरी पढ़ाने पर पाबंदी लगा दी गई थी और अमेरिका के एक अध्यापक पर डार्विन के सिद्धांत को पढ़ाने के मद्देनज़र अदालत ने केस चलाया था जो मंकी ट्रायल के नाम से जाना जाता है और इतिहास के चर्चित केसों में से एक है |

ईसाइयत के प्रति विरोधी विचार धारा

डार्विन ताउम्र धर्म के बारे में कुछ खुलकर बोलने से बचते रहे, मगर उनके लिखे कई पत्रों और उनकी कई किताबों में ईसाइयत के प्रति उनके विरोधी विचार बिलकुल साफ नज़र आते हैं | डार्विन ने अपनी जीवनी में भी लिखा था, “जिन चमत्कारों का समर्थन ईसाइयत करती है उन पर यकीन करने के लिए किसी भी समझदार आदमी को प्रमाणों की आवश्यकता जरूर महसूस होगी | उस समय का इंसान हमारे मुकाबले कहीं ज्यादा सीधा और अनभिज्ञ था जब इन चमत्कारों के बारे में बताया गया था | डार्विन ने ईसाइयत से जुड़े शुरुआती साहित्यों पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा था, “इस किताब में लिखे वर्णनों और चमत्कारों की कहानियों में भी मुझे विरोधाभास नज़र आता है| जैसे-जैसे इन विरोधाभासों का प्रभाव मुझ पर बढ़ता गया ‘रेवेलेशन’ के रूप में ईसायत पर से मेरा विश्वास भी उठता चला गया |”

डार्विन हमेशा से नास्तिक नहीं थे

चार्ल्स डार्विन हमेशा से नास्तिक नही थे | एक वक़्त था जब युवा डार्विन ने पादरी बनने की पूरी तैयारी कर ली थी, जिसका जिक्र अपनी जीवनी में करते हुए कहते हैं, “मेरे पिता ने मुझसे कहा कि मैं पादरी बन जाऊं तो बेहतर होगा | मैंने सोचने के लिए मोहलत मांगी ताकि चर्च ऑफ इंग्लैंड के सभी धर्मसूत्रों के प्रति अपने मन में विश्वास पैदा कर सकूं | इसी क्रम में मैंने ईसाइयों के कई धर्मग्रंथ बेहद सावधानी के साथ पढ़े| उस समय तो बाइबिल के प्रत्येक शब्द में वर्णित सत्य का कड़ा और अक्षरश: पालन करने में मुझे कोई संदेह नहीं रह गया था | मैं जल्द ही इस बात को मानने लगा कि ईसाई मतों के सिद्धांतों का पूरी तरह से पालन होना चाहिए|” धर्मग्रंथ के विचार डार्विन पर कदर हावी थे कि अपनी शुरूआती दोनों समुद्री यात्राओं पर वे अपने साथ बाइबिल ले गए थे, परन्तु डार्विन नहीं जानते थे कि इस यात्रा के हर पड़ाव के साथ वे धीरे-धीरे ‘विज्ञान’ के पास और ‘धर्म’ से दूर होते चले जाएंगे | डार्विन लिखते हैं, “इन दो सालों (अक्टूबर 1836 से जनवरी 1839) के दौरान मुझे धर्म के बारे में ढंग से सोचने का मौका मिला. जब मैंने बीगल पर अपनी यात्रा की शुरूआत की थी मैं धर्म को लेकर घोर कट्टरवादी था. मुझे याद है कि जब मैं नैतिकता से जुड़े कई मुद्दों पर बाइबिल को किसी अकाट्य संदर्भ की तरह पेश करता था तो किस तरह जहाज के कई अधिकारी मुझ पर हंसा करते थे |” जैसे-जैसे डार्विन शोधकार्य आगे बढ़ाते गए, उनका भरोसा  धर्म पर कम होता चला गया |

बेटी ऐनी  की मौत के बाद विचारो का बदलना

ऐसा कहा जाता है कि अपनी बेटी ‘ऐनी’ की मौत के बाद डार्विन में पूरी तरह से अपने आप को शोध कार्यों में व्यस्त कर लिया था और इसी दौरान धीरे-धीरे बाइबिल और जीसस क्राइस्ट पर से उनका विश्वास उठता चला गया | 24 नवंबर,1880 को लिखे एक ऐतिहासिक खत में इस बात का जिक्र उन्होंने किया था | डार्विन ने साफ-साफ लिखा था, “मुझे आपको यह बताने में खेद है कि मैं बाइबिल पर पवित्र रेवेलेशन के तौर पर भरोसा नहीं करता. यही कारण है कि मुझे जीसस क्राइस्ट के ईश्वर की संतान होने पर भी विश्वास नहीं है|”  ये बात बहुत कम लोग जानते है कि 2015 में न्यूयॉर्क में नीलामी के दौरान इस पत्र की बोली 197,000 यूएस डॉलर लगाई गई थी |

चर्च और ईसाई धर्मगुरूओं का डार्विन के प्रति विरोध

सिर्फ डार्विन ही धर्म के खिलाफ थे, ये जंग दोनों तरफ से बराबर छिड़ी हुई थी, परन्तु चर्च और ईसाई धर्मगुरूओं का डार्विन के प्रति विरोध कहीं ज्यादा प्रबल और व्यापक था | चर्च और उनके अनुयायियों को डार्विन के मानव विकास के सिद्धांत बिल्कुल मान्य नहीं थे, क्योंकि उनका मानना था कि ये सिद्धांत मनुष्य और जानवरों के बीच के अंतर को ही खत्म कर देगी |

हिंदू मान्यताओं से सम्बन्ध

एक तरफ जहाँ पाश्चत्य संस्कृति व सभ्यता डार्विन के सिद्धांतों का मजाक उड़ा रही थी तो दूसरी तरफ पूरब में हिंदू धर्म ऐसी कई कहानियों गवाह था जो डार्विन के विकासवाद की पुष्टि करती थे | डार्विन ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में एक जगह जिक्र किया है कि वे बीगल पर अपनी यात्रा की शुरूआत में हिंदू धर्म से जुड़े साहित्य का गहराई से अध्य्यन कर चुके थे | हिंदू पौराणिक मान्यताओं में भगवान विष्णु के दस अवतारों का जिक्र मिलता है तथा मत्स्य पुराण में लिखा है-

मत्स्य: कुर्मो वराहश्च नरसिंहोSथ वामन:

रामो रमश्च कृष्णश्च बुद्ध: कल्कि च ते दश।।

 

ये अवतार डार्विन के विकासवाद के कई चरणों से हूबहू मिलते थे अगर ऐसा कहा जाए तो गलत नही होगा | हिंदू संस्कृति और डार्विन के विकासवाद की आपसी समानता का जिक्र स्वामी विवेकानंद से लेकर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक कई चर्चित हस्तियों ने भी किया है |

तो क्या हिंदू पुराणों के अध्ययन के उपरान्त ही डार्विन के दिमाग में विकासवाद की अवधारणा ने जन्म लिया था?

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