भारत में कोरोना के मामलों में इजाफा जारी है, लेकिन राहत की बात यह है कि इस दौरान वायरस से उबरने वाले मरीजों की संख्या भी इसी रफ्तार से बढ़ रही है। सोमवार को भारत ने कोविड-19 रोगियों के ठीक होने की संख्या के मामले में ब्राजील को पीछे छोड़ दिया है। देश में अब तक 37 लाख 80 हजार 107 लोग संक्रमण से उबर चुके हैं।

दुनिया भर में अब तक कुल तीन करोड़ से ज्यादा लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं, जिनमें से एक करोड़ 96 लाख 25 हजार 959 लोग ठीक हो चुके हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार भारत में संक्रमण से मुक्त होने की दर 78 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो दर्शाता है कि भारत में संक्रमित तेजी से ठीक हो रहे हैं।

कोरोना महामारी से निपटने की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। हर दिन संक्रमण और संक्रमण से होने वाली मौतों के आंकड़े नई ऊंचाई छू रहे हैं। कहा जा रहा है कि जांच में तेजी आने के कारण संक्रमितों की पहचान भी तेजी से हो रही है, इसलिए आंकड़े कुछ बढ़े हुए दर्ज हो रहे हैं। पर कुछ लोगों को शिकायत है कि जांच में अपेक्षित गति नहीं आ पा रही है। खुद केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने भी असंतोष व्यक्त किया है कि कुछ राज्यों ने जांच के मामले में मुस्तैदी नहीं दिखाई, जिसके चलते वहां संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े। जब जांच में तेजी नहीं आ पा रही तब कोरोना के मामले दुनिया के अन्य देशों की तुलना में हमारे यहां चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रहे हैं, तो इसमें और तेजी आने पर क्या स्थिति सामने आएगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। पिछले एक सप्ताह में भारत में कोरोना के मामले दुनिया में सबसे अधिक दर्ज हुए। अमेरिका, ब्राजील जैसे उन देशों को भी पीछे छोड़ कर हम आगे बढ़ गए हैं, जहां दुनिया में अभी तक सबसे अधिक मामले दर्ज हो रहे थे। यह निस्संदेह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

लॉकडाउन और सामाजिक दूरी के पालन को लेकर सख्ती आदि उपाय आजमाए जा चुकने के बाद भी संक्रमण तेजी से फैल रहा है, तो इस पर काबू पाने के लिए कोई नई और व्यावहारिक रणनीति बनाने पर विचार होना चाहिए। यह सही है कि जांच में तेजी आएगी, तो संक्रमितों की पहचान भी जल्दी हो सकेगी और उन्हें समय पर उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा। मगर जांच के मामले में राज्य सरकारों का रवैया कुछ ढीला-ढाला ही नजर आ रहा है।

दिल्ली सरकार ने जरूर इजाजत दे दी है कि अब बिना डॉक्टर की पर्ची के भी लोग खुद जांच करा सकते हैं। दिल्ली में जांच के केंद्र कुछ अधिक हो सकते हैं, पर दूसरे राज्यों में जांच की सुविधा इतनी उपलब्ध नहीं है कि लोग उनका लाभ उठा सकें। दूर-दराज के उन गांवों के लोगों की परेशानियों का अंदाजा लगाया जा सकता है, जो इस वक्त बाढ़ की विभीषिका झेल रहे हैं या फिर जिन गांवों तक सड़क भी नहीं पहुंची है और लोगों को मरीज को चारपाई पर ढोकर अस्पताल ले जाना पड़ता है। वे तो इसी आस में हैं कि सरकारी सहायता मिले और उनकी मुफ्त जांच हो सके।

दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में संक्रमितों के स्वस्थ होने की रफ्तार अधिक और मौतों का आंकड़ा बेशक हमारे यहां कम हो, पर इस आधार पर लापरवाही बरतने का मौका नहीं मिल सकता। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि आरटीपीसीआर जांच सबसे बेहतर है। मगर इसके साथ त्वरित एंटीजेंट परीक्षण भी चल रहे हैं। यह परीक्षण भरोसेमंद नहीं है। इस परीक्षण में अगर नतीजा नेगेटिव आता है, तो उसका आरटीपीसीआर जांच कराना जरूरी है।

मगर राज्य सरकारें इसे गंभीरता से नहीं लेती देखी जा रहीं। कई राज्य सरकारों का कहना है कि इस महामारी से पार पाने के लिए उनके पास पर्याप्त धन नहीं है। उन्होंने केंद्र सरकार से भी इसके लिए गुहार लगाई थी, पर निराशा ही हाथ लगी। ऐसे में, यह ठीक है कि स्वास्थ्य के मोर्चे पर राज्य सरकारों को ही अगली कतार में लडऩा है, पर उन्हें जरूरी संसाधन और सहयोग उपलब्ध कराने के मामले में केंद्र को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

-सिद्धार्थ शंकर

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