Farmers protest delhi : Virtual freedom vs Farmers movement? : तकनीकी विकास ने अभिव्यक्ति की आजादी को नया मुकाम और आयाम दिया है। आज की दुनिया में सोशल मीडिया अभिव्यक्ति की आजादी का नया मंच बन गया है। इंटरनेट ने वैचारिक आजादी का नया संसार गढ़ा है। अब अपनी बात कहने के लिए अखबारों और टीवी के कार्यालयों और पत्रकारों की चिरौरी नहीं करनी पड़ती है। उसका समाधान खुद आदमी के हाथों में है।

वर्चुअल प्लेटफॉर्म खुद खबर का जरिया और नजरिया बन गया है। टीवी और अखबार की दुनिया वर्चुअल मीडिया के पीछे दौड़ रहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कुछ भी लिखा- पढ़ा जा सकता है। किसी को रोक-टोक नहीं है। लेकिन यह किस दिशा की तरफ़ जा रहीं है कहना मुश्किल है। किसान आंदोलन में भी सोशलमीडिया पर बहुत कुछ लिखा- पढ़ा जा रहा है।

सोशल मीडिया पर बदले दौर में सबकी निगाहें टिकी रहती हैं। इंटरनेट और आधुनिक मोबाइल फोन ने सब कुछ सम्भव बना दिया है। टीवी पत्रकारिता का अधिकाँश कार्य वर्चुअल मंच और गूगल कर देता है। राजनेता और सेलिब्रेटी के ट्विट करने भर की देर है बाकि का काम टीवी पत्रकारिता कर देती है। टीवी एंकर तत्काल इस तरह के ट्विट चलाने लगते है। ट्विट पर वाक्युद्ध छिड़ जाता है जिसके बाद टीवी वालों को ब्रेकिंग ख़बर मिल जाती है। फ़िर लगातार उसी ट्विट पर हो रहे वार और पलटवार को प्रसारित किया जाता है।

विचार के नाम पर ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सप, इंस्टाग्राम और न जाने कितनी अनगिनत सोशल साइटों पर कुछ लोगों की तरफ से गंदगी फैलाई जा रही है। अनैतिक बहस और विचारों के शाब्दिक युद्ध को देख एक अच्छा व्यक्ति कभी भी सोशल मीडिया पर कुछ कॉमेंट नहीं करना चाहेगा। वर्चुअल मंच पर विचारों का द्वंद देखना हो तो किसी चर्चित मसले पर ट्विटर और फेसबुक के कॉमेंट्स आप देख सकते हैं।

इसमें कोई दो राय नहीँ कि वर्चुअल प्लेटफ़ॉर्म ने लोगों को बड़ा मंच उपलब्ध कराया है, लेकिन उसका उपयोग सिर्फ़ सामाजिक, राजनैतिक और जातिवादी घृणा फैलाने के लिए किया जा रहा है। इतने भ्रामक और आक्रोश फैलाने वाले पोस्ट डाले जाते हैं कि जिसे पढ़कर दिमाग फट जाता है। समाज में जिन्होंने अच्छी प्रतिष्ठा, पद और मान हासिल कर लिया है उनकी भी वॉल पर कभी-कभी कितनी गलत पोस्ट की जाती है। आजकल पूरी राजनीति वर्चुअल हो गई है। कोरोना संक्रमण काल में यह और तीखी हुई है। सत्ता हो या विपक्ष सभी ट्विटर वार में लगे हैं। तकनीकी के बदले दौर में सारी लड़ाई सोशलमीडिया पर हो गई है। राजनीति में यह प्रचलन अधिक तेजी से चला है। क्योंकि वर्चुयल मंचन पर कहीँ गई बात अधिक तेजी से प्रसारित होती है। जिसकी वजह से राजनेताओं और सेलिब्रिटी की पहली पसंद आजकल ट्विटर बन गया है। जब भी किसी व्यक्ति को भड़ास निकालनी होती है तो वह सोशलमीडिया पर आ जाता है।

सोशल मीडिया पुरी तरह सामाजिक वैमनस्यता फैलाने का काम कर रहा है। हालांकि वर्चुअल प्लेटफ़ॉर्म पर देश की नामी-गिरामी सामाजिक, राजनैतिक, साहित्यिक, फिल्मकार, संगीतकार, अधिवक्ता, पत्रकार, चिंतक, वैज्ञानिक और समाज के हर तबके के लोग जुड़े हैं। लोग सकारात्मक टिप्पणी करते हैं। लोगों के अच्छे विचार भी पढ़ने को मिलते हैं। इस तरह का तबका काफी है। उनकी बातों का असर भी व्यापक होता है। लेकिन इंसान की जिंदगी बाजारवाद बन गई है, जिसकी वजह से बढ़ती स्पर्धा, सामंती सोच हमें नीचे धकेल रही है। अपना स्वार्थ साधने के लिए मुट्ठी भर लोग विद्वेष फैला रहे हैं।

दिल्ली सीमा में चल रहे किसान आंदोलन पर भी सोशल मीडिया (Social Media) पर गलत और भ्रामक टिप्पणियाँ की जा रहीं हैं। किसानों के आंदोलन को गलत दिशा देने की कोशिश की गई। वर्चुयल मंचन पर किसानों के आंदोलन को खालिस्तानी तक कहा गया जिसकी वजह से किसानों को गहरी चोट पहुँची। सोशल मंच पर एक धड़ा पूरे किसान आंदोलन को गलत दिशा देना चाहता है, यह गलत बात है। किसानों को खालिस्तानी कहना कहाँ का न्याय है। लोकतंत्र में सबको अपनी माँग रखने का अधिकार है इसका क्या मतलब अगर हम सरकार से अपनी माँग रहे हैं तो वह गलत है। हम राजनीति में अपना विवेक और विचार दोनों खो चुके हैं। हमें लगता है कि सरकार जो फैसला करती है वह वह ठीक है ऐसी बात नहीँ है। हमें किसानों की मांगो पर गौर करना चाहिए। हो सकता है कुछ लोग किसान आंदोलन की आड़ में अपनी सियासी रोटी सेंकना चाहते हों, लेकिन इसका यह मतलब नहीँ कि किसान खालिस्तान का एजेंडा चला रहें हों।

सोशलमीडिया ने हमें विचारों का नया मंच उपलब्ध कराया है, लेकिन अगर मंच पर अपनी बात रखने के बजाय निजी हमले किए जाएँ तो कितना जायज है। किसान हमारा पेट भरता है पूरे लॉकडाउन में किसानों की वजह से सरकार ने मुफ्त में अनाज बाँटा है। पंजाब, हरियाणा और देश का किसान अगर अन्न न उपजाता तो लोग भूखों मर जाते लेकिन हमारे किसानों की वजह से कोरोना संक्रमण काल में भुखमरी की समस्या नहीँ पैदा हुई अगर ऐसा होता तो लाखों लोग भूख से मर जाते यह मौत कोरोना से मरने वालों से अधिक होती। लोग सवाल उठाते हैं कि पंजाब का किसान ही क्यों आंदोलन कर रहा है इसका सीधा जवाब है कि सरकार से पंजाब का किसान अधिक लाभ कमाता है। जिसकी वजह से वह आंदोलनरत है। देश में एमएसपी का सिर्फ छह फीसदी किसान लाभ उठाता है जिसमें सबसे अधिक पंजाब और हरियाणा के किसान शामिल हैं, फ़िर आंदोलन कौन करेगा।

सोशलमीडिया पर किसानों का मजाज बनाया गया और किसान आंदोलन को खालिस्तान, काँग्रेस, वामपंथ, शाहिनबाग से जोड़ दिया गया। कितने शर्म की बात है। क्या यही हमारी अभिव्यक्ति है। दूसरों को अपमानित करना क्या हम अपनी वौचारिक जीत समझते हैं। यह किसानों के आंदोलन को कमजोर करने की साजिश है। किसान पंजाब, हरियाणा या पश्चिमी यूपी का हो। वह किसान किसानों को गाली देकर अपने को गौरवांवित समझने वालों को इस बात को समझना होगा। देश का किसान मजबूत और खुशहाल होगा तभी देश आगे बढ़ेगा। हम किसानों को गाली देकर या अपमानित कर भला क्या हासिल कर सकते हैं। आंदोलन लोकतंत्र का हिस्सा रहा है और रहेगा। संविधान ने लोगों को खुद अधिकार दिए हैं। लेकिन यह आंदोलन देश के खिलाफ नहीँ होना चाहिए।

सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आड़ में नंगई देखी गई है। किसी विचार से सहमत होना न होना यह आपका निजी विषय है। आप किस विचारधारा के समर्थक हैं यह भी अलग विषय है, लेकिन कोई आपके विचारधारा के खिलाफ बात करे तो गलत है यह धारणा बिल्कुल गलत है। आप सरकार के समर्थक हो सकते हैं, लेकिन इसका कत्तई यह मतलब नहीँ कि सरकार सिर्फ आपकी है और उस पर आपका हक है। दूसरे लोग सरकार के खिलाफ या उसकी नीतियों के खिलाफ अपनी बात नहीँ रख सकते हैं। उस तरह की सोच बिल्कुल गलत है।

सरकार विचारधारा की नहीँ देश की होती है। वह समाज और देश को साथ लेकर चलती है, लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीँ है कि सरकारें जो फैसला करती हैं वह उचित करती हैं। अगर ऐसा होता तो देश का किसान सड़क पर क्यों उतरता। पंजाब और दूसरे हिस्से का किसान कड़ाके की सर्द में दिल्ली की सीमा में क्यों आंदोलन करता। हमें इसका ख़याल रखना होगा। हम यह नहीँ कह सकते हैं कि सरकार सही और किसान गलत हैं। सरकार को किसानों से संवाद जारी रखना चाहिए। किसानों की बात सरकार को सुननी चाहिए। लेकिन अभिव्यक्ति की आड़ में वर्चुयल मंच पर किसानों को को अपमानित करना गलत बात है। हमारी आजादी की सीमा वहीँ तक है जहाँ दूसरों की आजादी प्रभावित न हो। हमें वर्चुयल मंच पर इस तरह की तथ्यहीन बातों से बचना चाहिए। किसान देश का निर्माता है। उसके खिलाफ गलत प्रचार से बचना होगा।

-प्रभुनाथ शुक्ल

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