क्या ‘चक्रवर्ती सम्राट’ बनने का स्वर्णिम स्वप्न देखने वाले देश में सत्तारूढ़ दल ने अब प्रतिपक्ष को नाकारा सिद्ध करने के बाद देश के मीडिया और न्यायपालिका को निशाने पर ले लिया है? क्योंकि देश की सबसे वृद्ध कांग्रेस पार्टी जहां ‘वेंटिलेटर’ पर अंतिम सांस लेने की तैयारी कर रही है, वहीं अन्य प्रतिपक्षी दलों को राष्ट्रीय स्तर पर कोई वजूद नहीं है, ऐसे मौके का सत्तारूढ़ दल भरपूर फायदा उठा ही रहा है, किंतु उसकी अब मुख्य परेशानी न्यायपालिका द्वारा दिए जा रहे सरकार विरोधी फैसले और देश के मीडिया या खबरपालिका द्वारा सत्तारूढ़ दल व सरकार की समय-समय पर की जा रही तीखी आलोचना है, अब वह येन-केन-प्रकारेण इन दोनों अवरोधों पर लगाम लगाकर अपना ‘चक्रवर्ती सम्राट’ का मार्ग प्रशस्त करना चाहती है।

अपने इस उद्देश्य में उसे सबसे अधिक परेशानी न्यायपालिका को अपने कब्जे में लेकर उस पर अंकुश लगाने में आ रही है, इसके उपाय खोजने के लिए गोपनीय रूप से कानूनविदों की एक सीमित गठित कर दी है जो संविधान को उलट-पटल कर कुछ उपाय खोजेगी, जिससे न्यायपालिका पर अंकुश लगाने के प्रयास किये जा सके, किंतु चूंकि हमारे संविधान ने स्पष्ट रूप से लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को स्वतंत्रतापूर्वक निर्बाध काम करने के अधिकार दिए है, इसलिए कानूनविदों के लिए भी यह कार्य दुरूह प्रतीत हो रहा है, किंतु सत्तारूढ़ दल चाहता है कि साम-दाम-दण्ड-भेद किसी भी तरीके से न्यायपालिका पर अंकुश के मार्ग खोजना जरूरी है और इसलिए इस दिशा में प्रयास भी जारी है।

अब जहां तक मीडिया या प्रेस का सवाल है, उस पर अंकुश लगाना इसलिए काफी सरल है, क्योंकि हमारे संविधान में मीडिया या प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सिर्फ एक धारा-19ए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलावा कोई प्रावधान ही नही है, यह इसलिए हुआ क्योंकि हमारे संविधान की रचना ब्रिटिश संविधान की नकल करके की गई थी और ब्रिटिश सरकारें तो भारत हो या ब्रिटेन हर जगह मडिया या प्रेस विरोधी रही है, भारत में भी अपने शासनकाल में अंग्रेजों ने दर्जनों बार प्र्रेस को कुचलने और प्रतिबंध लगाने की कार्यवाही की थी और हमारे संविधान में प्रेस की आजादी सम्बंधी काई कानून नहीं है, इसलिए आपातकाल में प्रेस पर कठोर प्रतिबंध लगाया जा सका था और अब वही चलन आज तक भी सरकार विरोधी लेखन पर सरकार का जारी है। ताजी घटना मुम्बई के रिपब्लिकन टी.व्ही. की है। सिर्फ संविधान में मीडिया की सुरक्षा का प्रावधान नहीं होना ही नहीं भारतीय मीडिया तो सीआरपीसी की धारा-179 से भी काफी परेशान है, जिसके तहत मीडियाकर्मी या सम्पादक को किसी भी खबर का स्त्रोत बताना अनिवार्य है, अब सरकार व प्रशासन इसी धारा के तहत भारतीय प्रेस को उसकी खबरों के स्त्रोत बताने को मजबूर कर रहा है तथा नहीं बताने को मजबूर कर रहा है तथा नहीं बताने पर इसी धारा के प्रावधानांे के तहत कानूनी कार्यवाही कर रहा है, इससे भारतीय मीडिया काफी परेशान है, मुम्बई में रिपब्लिकन टी.व्ही. पर भी इसी धारा के तहत कार्यवाही की गई। इस प्रकार सीआरपीसी की धारा-79 ने संविधान के अभिव्यक्ति की आजादी के प्रावधान को प्रभावहीन कर दिया।

इस प्रकार कुल मिलाकर भारतीय मीडिया आज से नहीं अंग्रेजों के शासनकाल से ही निशाने पर रहा है, जो आज भी है और इसका एकमात्र कारण हमारे संविधान में मीडिया की सुरक्षा के कोई संवैधानिक प्रावधान शामिल नहीं करना है, इसीलिए मीडिया को भी कई बार सरकार या सत्तारूढ़ दल से तालमेल करके चलने को मजबूर होना पड़ता है, जिसे लोग ‘चमचागिरी’ की संज्ञा देते है।

इस प्रकार कुल मिलाकर लोकतंत्र के घोषित रूप से तीन स्तंभों में सदा से दो स्तंभों कार्यपालिका-विधायिका के बीच तालमेल रहा है, किंतु न्यायपालिका इस तालमेल से सदा दूर रही, किंतु अब उस पर भी तालमेल को डोरे डालने के गंभीर प्रयास के रास्ते खोजे जा रहे है और जहां तक बैचारे मीडिया या खबरपालिका का सवाल है वह तो अघोषित चौथा स्तंभ है, जिसकी सुरक्षा का ही संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए उस पर अक्सर हमले की शिकायतें सामने आती रहती है और इसी कारण मीडिया के कुछ अंग ‘आत्मसमर्पण’ को मजबूर भी हो जाते है।

-ओमप्रकाश मेहता

 

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