होली के अवसर पर यह खबर आई कि कांग्रेस के दिग्गज नेता सिंधिया परिवार के राजकुमार ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया है। चूंकि होली के अवसर पर इस प्रकार की ख़बरों का उत्तर भारत में बाज़ार गरम रहता है। बाद में 22 विधयाकों के त्याग पत्र व राजकुमार ज्योतिरादित्य सिंधिया की भाजपा में जाने की खबरे व मध्य प्रदेश से कमलनाथ सरकार की जाने खबरें टी वी की सुर्खिया बन गई। टी वी पर यह नारा भी गर्माने लगा कि मध्य प्रदेश तो झांकी है राजस्थान व गुजरात बाकी है।

दरअसल इस समय ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिरा कर कांग्रेस को बड़ा झटका दिया है। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस के अंदर कोई ऐसा भूकंप आया है जिसकी तीव्रता के बारे में कांग्रेस के वैज्ञानिक अंदाजा लगा नहीं पा रहे थे और इस भूकंप के केंद्र के बारे में भी कांग्रेस के तथाकथित आलाकमान को पता नहीं चल पा रहा था। लोग कयास लगाने लगे हैं कि कांग्रेस के अंदर उठे भूकंप के झटके क्या व राजस्थान में भी लोग महसूस करने वाले हैं। गहलोत सरकार में उपमुख्यमंत्री का पद संभाल रहे सचिन पायलट के पास भी क्या कोई रणनीति है जिससे वह मुख्यमंत्री बन जाए।

पायलट खेमे से आप पूछे तो उनका कहना है कि बस इंतजार कीजिए जल्दी ही कोई धमाका होने वाला है। सचिन पायलट मुख्यमंत्री नहीं बन पाए इसका मलाल उनके चेहरे और उनके हावभाव के अलावा उनके वक्तव्यों और क्रियाकलापों से देखा जा सकता है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के रास्ते में उन्होंने कई दिनों तक रोड़ा अटकाया जिसे अब तक अशोक गहलोत आसानी से पचा नहीं पाते हैं। यह सच है कि 5 सालों तक सड़कों पर संघर्ष करने वाले सचिन पायलट राजस्थान में खून का घूंट पीकर काम चला रहे हैं। अशोक गहलोत उन्हें सत्ता में बराबरी का भागीदार नहीं बनाना चाहते हैं।

अगर ऐसा है तो फिर सचिन पायलट के पास किस तरह के कौन-कौन से विकल्प है। कुछ लोगों का कहना है कि बहुत जल्दी अमित शाह और नरेंद्र मोदी से मिलकर सचिन पायलट राजस्थान में गैर कांग्रेसी और गैर बीजेपी सरकार बना सकते हैं।फिलहाल पिछले 3 दिनों से सचिन पायलट दिल्ली में है और कहा जा रहा है कि दिल्ली में बैठकर वह राजस्थान में बड़ा राजनीतिक विस्फोट करने की तैयारी कर रहे हैं। इसे भांपते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी अब से लगातार विधायकों से संपर्क में है और अपने सारे सिपहसालारों को राजस्थान के एक एक विधायकों के पीछे लगा दिया है।

हालांकि हमें लगता है कि सचिन पायलट को हड़बड़ी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ जो गए हैं उन्होंने भिंड मुरैना का पानी पीया है जबकि राजस्थान के लोगों का मिजाज अलहदा है। पायलट कहते हैं कि जब आलाकमान ने मुख्यमंत्री बनने के लिए वोटिंग कराई थी तो उनके पास 100 में से 44 विधायक थे मगर उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। जब कांग्रेस राजस्थान में 21 सीटों पर समय सिमट गई थी तब कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उस वक्त राहुल सचिन पायलट को विजयी भवः कहकर राजस्थान भेजा था। लिखित तो नहीं मगर एक मूक सहमति बनी थी कि राजस्थान में सरकार बनी तो नेतृत्व युवा हाथों में होगी। पायलट खेमे का कहना है कि वह लगातार कांग्रेस को जिताने के लिए मेहनत करते रहे और गांधी परिवार के नजदीकी अशोक गहलोत अपनी गोटियां बैठाने में लगे रहे।30 सालों से ज्यादा समय तक राजस्थान में सक्रिय रहे अशोक गहलोत के पास ज्यादा अनुभव के साथ ज्यादा संबंध भी हैं लिहाजा उनके पास कुछ विधायक ज्यादा हो सकते है।

मगर गांधी परिवार को अपना वीटो इस्तेमाल कर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए था। सचिन पायलट उपमुख्यमंत्री तो बन गए मगर अशोक गहलोत उनकी हैसियत एक मंत्री से ज्यादा कभी नहीं होने दिए।जब मंत्री पद का शपथ दिलाया जा रहा था तो पायलट को राज्यपाल के साथ अपनी कुर्सी लगवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा था, तभी तय हो गया था कि राजस्थान में यह किस्सा कुर्सी का चलता रहेगा।विधानसभा जाने के लिए सचिन पायलट मुख्यमंत्री के अंदर जाने के दरवाजे से चले गए तो मार्शल ने उन्हें रोक लिया और कहा कि आप इधर से नहीं जा सकते।

पायलट ने तब उप मुख्यमंत्री बनने के बाद अपमान का पहला घुटता पिया था।राजनीति के जानकर लोगों का कहना है कि जब तक मध्य प्रदेश का मामला गरम है सचिन पायलट को इंतजार करना चाहिए। जानकारों की माने तो फिलहाल पायलट के पास 20 के आसपास ऐसे विधायकों की फौज है कि उनके कहने पर उनके साथ दिल्ली कूच कर जाएं लेकिन पायलट को उन सभी विधायकों को भी साथ लेना होगा जो किसी ने किसी कारणवश अशोक गहलोत से नाराज चल रहे हैं। पायलट अगर ऐसा कर पाते हैं तो राजस्थान में पायलट की स्थिति मजबूत हो सकती है।

-अशोक भाटिया

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