Kanche aur Postcard Short Film 2015: में रिलीज़ हुई रिदम जानवे द्वरा निर्देशित फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’ बच्चों के नाम पर बनाई जाने वाली सर्वथा उपयुक्त फ़िल्म है.

रिदम की फ़िल्म अपने ननिहाल में छुट्टियां मनाने आये 10 साल के विपिन के इर्द गिर्द घूमती है जिसे कंचों से खेलना बहुत पसंद है लेकिन विपिन के मनहूस मामा और उसे अच्छा बच्चा बनाने वाली नानी उसे कंचे खेलने से हमेशा मना करते हैं. उन्हें यह लगता है कि कंचे खेलना गन्दा काम है और इस तरह उनका बच्चा भी आवारा बच्चों की जमात में शामिल हो जाएगा.

विपिन के मामा एक असफल और चिड़चिड़े वकील हैं जो अपनी निम्न मध्यवर्गीय बसावट से बाहर निकलने के लिए बहुत बैचेन भी.कंचे खेलना इस निम्न मध्यवर्गी यबसावट से उनके भांजे और इस तरह उन्हें बहुत गहरे जोड़ देता है इस कारण भी वह विपिन को किसी भी कीमत पर कंचे नहीं खेलने देते. दस वर्षीय विपिन के लिए कंचे खेलना सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि इसके बहाने अपने ननिहाल के मजेदार पड़ोस के बच्चों से दोस्ती गांठने का एक अवसर भी है.

एक चाल नुमा बहुमंजिला मकान का आँगन इन बच्चों के खेल का मैदान बन जाता है. हर रोज वहां कंचे का खेल शुरू हो जाता है. स्थानीय बच्चे खेल को मजेदार बनाने के लिए क्रिकेट के प्रोफेशनल कमेंटरों की तरह कमेंटरी भी करते हैं. विपिन के मामा खेल के इन सब मजों से काटकर विपिन को एक खाली स्टेडियम में फ़ुटबाल खिलाना चाहते हैं.

लेकिन विपिन का मन हमेशा कंचों में ही रमता है. एक दिन किस्मत से उसकी नानी उसे पोस्टकार्ड खरीदने के लिए भेजती हैं. उसे 50 पैसे के पांच पोस्टकार्ड खरीदने हैं जबकि उसे दस रुपये मिले हैं. बचे हुए साढ़े सात रुपयों सेवह पंद्रह कंचे खरीद लेता है. कंचे लौटकर घर आता हुआ नन्हा विपिन ऐसा लगता है जैसे उसने कोई बड़ी जीत फतह कर ली हो. घर आते हुए उसका उत्साह हवा हो जाता है जब उसे अपने मनहूस मामा की आवाज सुनाई देती है. वह कंचों को छिपाकर कमरे के अन्दर दाखिल होता है. नानी द्वारा बाकी रुपयों का हिसाब मांगने पर उसे एक झूठ खड़ा करना होता है कि बाकी पैसे उसे पोस्ट ऑफिस वाले ने दिए ही नहीं. मामा और नानी द्वारा जिद करने और अपनी चालाकी की पोल खुलने की डर से विपिन भागकर दुकानदार के पास जाता है जो काफी हील-हुज्जत करने के बावजूद कंचे वापिस लेकर पैसे नहीं देता. बाल मन के निश्छल विपिन के लिए यह दुहरे संकट का समय है. एक तो उसे मुश्किल से हासिल किये हुए अपने कंचे लौटाने हैं दूसरा अपनी चोरी पर भी पर्दा डालना है.

अब उसे किसी भी तरह रुपये लेकर घर जाना है. नन्हे विपिन के लिए रुपये का एकमात्र विकल्प मंदिर है जहां उसने अपनी नानी के साथ एकबार कुछ रूपये पड़े हुए देखे थे. एक ईमानदार सौदे के बतौर वह नन्हा बच्चा साढ़े सात रुपये उठाकर मंदिर में कंचे रख देता है. बदहवासी में दौड़ते हुए घर लौटकर अपने मामा की घुड़की से बचने के लिए विपिन अपने सपनीले कंचों की बलि दे देता है.

दुपहर में नानी के साथ आराम करते हुए विपिन अपनी सारी कारगुजारियों को स्वीकार कर अपना मन भी हल्का कर लेता है.

30 मिनट की इस छोटी सी फिल्म से हम एकबार फिर अपने बचपन में प्रवेश कर पाते. बिना कोई नसीहत वाला संवाद बोले ही यह फिल्म हमें काफी गहराई से बच्चों की दुनिया से संवाद करा देती है.

https://youtu.be/DRnd7F4aRGg

 

 

अम्मा अरियन : सफल प्रयोग की कहानी

कुतर्की समय की कुछ तार्किक बातें

रोहितवेमुला के बहाने नागेश्वर राव की कहानी

Read all Latest Post on खेल sports in Hindi at Khulasaa.in. Stay updated with us for Daily bollywood news, Interesting stories, Health Tips and Photo gallery in Hindi
Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए khulasaa.in को फेसबुक और ट्विटर पर ज्वॉइन करें