लोकसाहित्य लोक संस्कृति एवं लोक रंग किसी भी देश-प्रदेश की धड़कनों के परिचायक होते हैं। लोक मानस सैकड़ों वर्षों के अनुभवों, आचार-व्यवहार की अंतरंग सम्पृक्ति, काल के निकष पर प्रतीति से निर्मित एवं संचालित होता है। लोक कथा हो, लोक गीत हों, लोक गाथाएं हों, कहावतें एवं लोकोक्तियां हों, या लोक रंग के अन्य क्रियाकलाप हों, धार्मिक विश्वास या आस्थाएं हों, सभी लोकसाहित्य की जीती-जागती धाराएं होती हैं।

प्रसिद्ध लोक तत्त्व मनीषी जान ड्ंिकवाटर ने तो यह स्वीकार किया है कि मानव की प्रवृत्तियां सार्वभौमिक होती हैं, भले ही स्थान, देश, परिवेश के कारण उनके रंगों में किंचित परिवर्तन आ जाए। हिमाचल भी इसका अपवाद नहीं है। भारत के अनेक प्रदेशों ने अपने-अपने लोकसाहित्य की सम्पदा को संरक्षित रखने के प्रयास किए हैं। राजस्थान में जैसे किसी समय में डा. सत्येंद्र शर्मा ने, पंजाब में देवेंद्र सत्यार्थी, संतोख सिंह धीर ने तथा और बहुत से विद्वानों ने लोकसाहित्य को समेटने-संरक्षित करने का काम किया, उसी प्रकार हिमाचल में भी मौलूराम ठाकुर, डा. गौतम शर्मा व्यथित, डा. बंशी राम शर्मा, डा. खुशीराम गौतम, प्रो. नरेंद्र अरुण व डा. श्रीराम शर्मा आदि ने भी हिमाचल के लोकसाहित्य को संग्रहित, संपादित एवं सहेजने का काम किया।

फिर जैसे लहर आती है, हिमाचल के विश्वविद्यालयों में पीएचडी उपाधि के लिए बहुत से छात्रों ने लोकसाहित्य पर शोध कार्य करके उपाधियां अर्जित कीं। स्वाभाविक है कि अधिकांश थीसिस विभिन्न जिलों के लोक गीतों पर थे, यथा मंडयाली के लोकगीतों का अध्ययन एवं विश्लेषण, लाहुल-स्पीति के लोक गीतों का अध्ययन एवं विश्लेषण, सिरमौर के लोक गीत व चंबा के लोक गीत आदि। और बहुत अच्छा शोध भी सम्पन्न हुआ। लेकिन आज इंटरनेट के युग में सुविधाओं का दुरुपयोग भी हो रहा है। कट एंड पेस्ट की प्रवृत्ति के कारण मौलिकता कहीं गायब हो गई है। वास्तव में लोकसाहित्य की किसी भी विधा पर अनुसंधान के लिए वर्षों तपस्या करनी पड़ती है, सामग्री का सार संग्रहण वैज्ञानिक ढंग से करना पड़ता है। मौखिक परंपराओं को कलमबद्ध या रिकार्ड करना पड़ता है और फिर उसका विश्लेषण। विश्लेषण भी ऐसा कि हर जिले की स्थितियां, परिवेश एवं परंपराएं किंचित भिन्न और बोली एवं भाषा का संस्कार भी कतिपय अलग होने के कारण तुलनात्मक स्तर पर जाकर अध्ययन एवं उसका परीक्षण-निरीक्षण करना पड़ता है। आधुनिक सुख-सुविधाओं के युग में मौखिक परंपराएं सिमट रही हैं और इन मौखिक ज्ञानकोषों के संवाहक सिकुड़ चुके हैं। ऐसी स्थिति में अधिकांश लोग यहां-वहां से जो भी मिले, उसे लेकर अपना ही समझते हुए उसे अपने ढंग से प्रचारित-प्रसारित कर देते हैं। इससे बहुत हानि होती है क्योंकि किसी का गीत किसी के नाम, कोई कॉपीराइट थोड़े है न।

यही कारण है कि आपको बहुत से ऐसे लेखक या गीतकार मिल जाएंगे जो कहते हैं कि अमुक-अमुक लोकगीत तो मैंने लिखा-गाया था, परंतु प्रकाशित नहीं हुआ था और पहले ही किसी दूसरे ने उसे अपना कह कर गाना, प्रचारित करना शुरू कर दिया। यह अन्याय है और इसका समाधान इतना सहज नहीं। एक और घातक प्रवृत्ति देखने में आती है कि लोगों ने अपने-अपने ढंग से लोक कथाओं का संकलन एवं संपादन प्रस्तुत कर दिया है, परंतु समग्र रूप से हिमाचल की लोक कथाओं का संग्रह फिलहाल तो मार्किट में दिखाई नहीं देता। सन् 1962 में संतराम वत्स्य जी ने ‘हिमाचल की लोक कथाएं’ शीर्षक से एक संग्रह आत्मा राम एंड संस से प्रकाशित करवाया था, परंतु उसमें भी लोक कथाएं अधिकांशतः कांगड़ा की ही थीं। वह प्रारंभिक प्रयास था, लेकिन एक मार्गदर्शक था। आज एक और प्रवृत्ति घर कर गई है कि मार्किटिंग प्रमुख हो गई है। जैसे कुछ वर्ष पूर्व पेड न्यूज का सिलसिला चला था, उसी प्रकार प्रकाशन में भी भ्रम पैदा करके साहित्यिक चीजों को बेचने की प्रवृत्ति दिखाई देती है लोक साहित्य में भी। मुझे हिमाचल के लोक गीतों पर कोई पुस्तक आलोचनार्थ मिली। मैं बड़ा प्रसन्न हुआ कि एक ही स्थान पर पूरे हिमाचल के लोक गीत मिल जाएं तो इससे बढि़या बात क्या हो सकती है, परंतु जब मैंने अनुक्रमणिका देखी तो उसमें मात्र कांगड़ा और ऊना के लोक गीत थे। कोई भी अनुसंधान तब तक पूरा नहीं होता जब तक आप स्रोत तक नहीं पहुंचते और लोकसाहित्य में तो इसका होना और भी महत्त्वपूर्ण है।

सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में उसे देखना-परखना आवश्यक होता है। पका-पकाया माल हज़म करने की अपेक्षा लोक अवधारणाओं की जड़ तक पहुंचना और उसके समकक्ष उपलब्ध सामग्री को तुलनात्मक रूप से तोलना लाभदायक हो सकता है। शोध में पिष्टपेषण के लिए भी कोई स्थान नहीं। आप कुछ नया नहीं ढूंढ सकते तो सारी प्रक्रिया बेकार हो जाती है। दूसरे प्रदेशों के लोकसाहित्य की धाराओं को तुलनात्मक अध्ययन के रूप में लिया जा सकता है। जैसे अभी बीकानेर विश्वविद्यालय से बड़सर कालेज में हिंदी की सहायक आचार्य डा. शकुंतला राणा ने राजस्थान एवं हिमाचल के लोक गीतों का तुलनात्मक अध्ययन कर पीएचडी की उपाधि अर्जित की है। हिमाचल के लोकसाहित्य में खोज खबर की अभी भी बहुत संभावनाएं हैं और लोकसाहित्य के समुद्र में बहुत से सीप-मोती विद्यमान हैं जिन्हें वे ही लोग ढूंढ सकते हैं जो प्राणपण से लोकसाहित्य को समर्पित हैं।

-डा. सुशील कुमार फुल्ल

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