• दिल्ली की जीबी रोड़ इलाके में गुरुवार को लगी थी भीषण आग

  • आग के साथ वहां काम कर रही बहुत सी यौनकमियों के सपने भी स्वाह हो गए

  • पुलिस ने करीब पचास महिलाओं को नगर निगम के बंद पड़े स्कूल में ठहराया है

नई दिल्ली, 08 नवंबर (एजेंसी)। दिल्ली के रेडलाइट इलाके जीबी रोड पर कोठा नंबर 58 में गुरुवार को लगी भीषण आग से भले ही कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन वहां रहने वाली यौनकर्मियों के बच्चों को बेहतर जीवन देने के सपने उनके सामने ही जलकर खाक हो गए। किसी ने बेटी के लिए शादी का जोड़ा खरीदकर रखा था तो किसी ने दिवाली पर बच्चों को भेजने के लिए नए कपड़े सिलवाए थे। इनके साथ ही वर्षों की जमा पूंजी भी जल गई। शॉर्ट सर्किट से लगी आग के बाद स्थानीय पुलिस ने यहां रहने वाली करीब 50 महिलाओं और दस बच्चों को पास ही दिल्ली नगर निगम के बंद पड़े एक स्कूल में ठहराया है, जहां मदद के दम पर इनका गुजारा चल रहा है।

जौनपुर की रहने वाली माया (बदला हुआ नाम) ने कहा , मैं दस साल से यहां अकेली रहती हूं। बच्चे गांव में नानी के पास हैं और मेरी लड़की की जनवरी में शादी होनी है। उसके लिए शादी का जोड़ा, कुछ जेवर, गद्दे और बच्चों के कपड़े खरीदकर रखे थे। दिवाली पर घर जाना था लेकिन सब कुछ मेरी आंखों के सामने स्वाहा हो गया।

आंध्र प्रदेश की रहने वाली शैला (बदला हुआ नाम) की 18 और 14 साल की दो लड़कियां हैं, जिन्हें रुपये भेजने थे लेकिन अब उनके पास अपने एक कपड़े के अलावा कुछ नहीं बचा। उन्होंने कहा, मेरा कुछ सामान आग में जल गया तो कुछ चोरी हो गया। शरीर पर एक नाइटी के अलावा कुछ नहीं बचा। तीन दिन से नहाई तक नहीं हूं। स्कूल में बाथरूम नहीं है और पानी भी नहीं। ठंड में ओढ़ने-बिछाने के लिए भी कुछ पास नहीं है। खाने-पीने की तो अभी तक मदद मिल गई है लेकिन रोज 50 लोगों को भी कोई कब तक खिलाएगा।

पिछले 16 साल से यहां रह रही एक महिला ने कहा कि अधिकतर के बैंक में खाते नहीं हैं। अपनी कमाई को हम गुल्लक, पेटी या बर्तन में जमा करते हैं और समय-समय पर कुछ रुपये घर भेजते रहते हैं। सभी के पास पहचान पत्र भी नहीं। इससे भी खाता खुलवाने में मुश्कित आती है। कई की तो 20-30 साल की जमा पूंजी चली गई जो बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए बचाकर रखी थी।

करीब 27 साल से यहां रह रही सुनीला (बदला हुआ नाम) को महामारी के दौर में कोठा मालिक ने सात महीने का मोटा किराया वसूलने के लिए नोटिस भेजा था। नोटिस का जवाब देने के लिए वकील को देने के लिए कुछ रुपये रखे थे लेकिन अब पास में कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा , मैं कहां से इतना किराया दे पाऊंगी। अब तो कुछ नहीं बचा। कोठा मालिक कोठे की मरम्मत तो दूर मलबा हटाने को भी तैयार नहीं है। अब हम कहां जाएं और क्या करें, कुछ समझ में नहीं आ रहा।

कुछ और काम करने या पुनर्वास की सलाह पर पिछले तीन दशक से यहां रह रही साहिबा (परिवर्तिन नाम) ने कहा, ये सब सिर्फ बोलने की बातें होती हैं लेकिन हमें यहां से निकाल दिया गया तो हम कहां जाएंगे और क्या खाएंगे। बच्चे कैसे पालेंगे। कौन हमें काम देगा। क्या हमारा अतीत हमारा पीछा छोड़ देगा। इनमें से एक महिला ने कहा, कई बार काम दिलाने के नाम पर एनजीओ ले भी जाते हैं लेकिन सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ देते हैं। ऐसे में किस पर भरोसा करें। हमें बच्चे पालने हैं जिन्हें नहीं पता कि उनकी मां क्या काम करती है लेकिन हम चाहते हैं कि वे पढ़-लिखकर इस दुनिया से दूर रहें।

स्थानीय पुलिस और कुछ गैर सरकारी संगठनों ने अग्निपीड़ित इन यौनकर्मियों के लिए मदद जुटाई है लेकिन इन्हें अब स्थायी मदद और सिर पर छत की जरूरत है। स्कूल के छोटे से परिसर में ना तो ये कोरोना से बचाव के लिए जरूरी दूरी ही रख पा रही हैं और ना ही इनके पास सेनेटाइजर या साबुन आदि है। पानी की कमी के कारण बार-बार हाथ धोने का सवाल ही नहीं उठता। छोटे बच्चे हाथ में खाली दूध की बोतल लेकर रो रहे हैं और इन्हें इंतजार है कि कोई मददगार इनके लिए कुछ खाने का सामान और कपड़े लेकर आएगा।

 

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