कुछ लोगो का मानना है कि जैनों के 24वें तीर्थंकर वर्धमान महावीर के बाद श्रीमद राजचंद्र ही जैनों के 25वे तीर्थंकर थे | गाँधी जी इनसे बहुत प्रभावित थे, जिस कारण वो इनसे अध्यात्मिक विषयों पर विचार-विमर्श व पत्राचार किया करते थे |

लक्ष्मीनंदन व रायचंद से राजचंद्र तक

ऐसा माना जाता है कि गांधी जीवन की दोनों विशेषताए अहिंसा और ब्रह्मचर्य में, श्रीमद राजचंद्र का बहुत योगदान  था | धार्मिक प्रवृति के श्रीमद राजचंद्र का जन्म नवंबर 1867 में मोरबी के निकट एक जौहरी परिवार में हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि इन्हें अपने पिछले कई जन्मों की बातें याद थीं | जन्म के समय इनका नाम लक्ष्मीनंदन रखा गया जिसे उनके पिता ने चार साल की उम्र में बदलकर रायचंद कर दिया था | मगर  बाद में वे खुद को रायचंद के संस्कृत रूप राजचंद्र से खुद के नाम को सम्बोधित करने लगे | गांधी जी श्रीमद राजचंद्र को प्यार से रायचंद भाई पुकारा करते थे |

हिटलर जैसा शख्स भी करता थाा इनकी बहुत इज्जत

प्रारम्भिक जीवन

कुछ समय तक राजचंद्र जी ने परिवार के दबाव में आकर मोतियों का कारोबार किया जबकि उनके रिश्तेदार चाहते थे कि वे मुंबई चले जाएँ परन्तु राजचंद्र जी ऐसा करने को तैयार नहीं हो रहे थे | 20 वर्ष की उम्र में उनकी शादी ज़बकबेन से हो गयी थी तथा उनके चार बच्चे भी थे परन्तु इसके विपरीत श्रीमद राजचंद्र का पूरा ध्यान आत्मा-परमात्मा के रहस्यों को समझने में ही उलझा रहता था | कहा जाता है कि राजचंद्र को अपने पिछले कई जन्मों की बातें याद थीं साथ ही साथ उनकी स्मरण शक्ति भी बहुत तेज़ थी | परन्तु उनकी पहचान परंपरागत जैन धर्म के मुनि के तौर पर नहीं बल्कि आत्म-साक्षात्कार का ज्ञान देने वाले संत के रूप में हुयी |

एक जमाने में इस लेखक के उपन्यास पाकिस्तान और भारत में ब्लैक में बिकते थे

महात्मा गाँधी के अनुसार सर्वश्रेष्ठ भारतीय

गाँधी जी इनसे इतने प्रभावित थे कि अफ्रीका प्रवास के समय गांधी जी अंगरेज़ी जानने वालों को टॉल्सटॉय की किताबे तथा गुजराती भाइयों को रायचंद भाई की ‘आत्म सिद्धि’ पढ़ने की सलाह देते रहते थे | गांधी ने अपने मित्र हेनरी पॉलक को लिखा था कि मैं राजचंद्र को अपने समय का सर्वश्रेष्ठ भारतीय मानता हूँ | गाँधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’  में गाँधी ने लिखा है कि 1891 में गांधी और श्रीमद राजचंद्र की मुलाक़ात हुई थी और गाँधी जी उनके शास्त्रों के ज्ञान और गहरी समझ से बहुत प्रभावित हुए थे|

पुराणों से मेल खाता है डार्विन का विकास वाद का सिद्धांत

गांधी के अनुसार, “उन्होंने मुझे समझाया कि मैं जिस तरह के धार्मिक विचार अपना सकता हूँ वो हिंदू धर्म के भीतर मौजूद हैं, आप समझ सकते हैं कि मेरे मन में उनके लिए कितनी श्रद्धा है|” थॉमस वेबर ने अपनी किताब में लिखा है कि राजचंद्र ने ही गांधी को समझाया था कि वे किस तरह विवाहित रहकर भी ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हैं |

पशु का दूध पीकर पाशविक प्रवृत्तियाँ समाप्त नहीं हो सकतीं

वेबर अपनी किताब में उल्लेख किया है कि राजचंद्र के गाँधी जी को यह कहते हुए दूध पीना छोड़ने की सलाह दी कि “पशु का दूध पीकर पाशविक प्रवृत्तियाँ समाप्त नहीं हो सकतीं” जिसका गाँधी जी ने पूर्ण रूप से समर्थन किया | 20 अक्तूबर, 1894 को गांधी ने अपने प्रिय ‘रायचंद भाई’ को एक लंबा पत्र लिखा, जिसमें अध्यात्मिक जिज्ञासा से भरे 27 सवाल थे, जैसे, आत्मा क्या है? क्या कृष्ण भक्ति से मोक्ष मिल सकता है? ईसायत के बारे में आपकी राय क्या है?

33 वर्ष की आयु में सन 1901 को श्रीमद राजचंद्र का निधन राजकोट में हुआ तथा इतफाकन इसी वर्ष से गांधी जी ने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया था |

 

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