विश्व में सनातन धर्म को पुन: प्रतिष्ठित करेगा पैगन आंदोलन

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पैगन आंदोलन विश्व के शुभ भविष्य का निर्धारक तत्व है। विश्व में सनातन धर्म की पुन: प्रतिष्ठा करेगा। इसके महत्व को समझना भारतीयों यानी हिन्दुओं के लिए अत्याधिक आवश्यक है क्योंकि पूरी दुनिया के पैगन आज उसकी ओर आस लगाए देख रहे हैं। पैगन शब्द का प्रयोग क्रिश्चियन्स ने ग्यारहवी शताब्दी ईसवी के यूरोप में तिरस्कार भावना के साथ किया। वह स्वयं को दिव्य प्रकाश रूपी ईसाइयत के ध्वजवाहक बताते थे और प्राचीन यूरोपीय अद्धैतवादियों को बहुदेवतावादी, प्रकृतिपूजक आदि बताकर निरस्त करते थे। जो अद्धैतवादी होगा वह बहुदेवतावादी जरूर होगा क्योंकि वह सर्वत्र एक ही परम चैतन्य सत्ता का प्रकाश देखेगा- वृक्ष में जल में, वन में, भूमि में, अंतरिक्ष में, आकाश में सर्वत्र। सभी जगह उसे एक ही परमेश्वर की महिमा और मूर्ति दिखेगी। इस प्रकार असंख्य देव मूर्तियां, प्रतिमाएं, असंख्य प्रकाशपूंज – प्रतिमाएं वह जानेगा। इसे ही क्रिश्चियन और मुसलमान बहुदेवपूजा मान लेते हैं।

दूसरी ओर, ईसाइयों का दावा है कि परमसत्ता का  नाम गॉड है, जो एक सयाने पुरुष हैं। उन्होंने आज तक केवल एक बेटा पैदा किया और वह इकलौता बेटा जोसुआ मसीह यानी जीसस है। गॉड ने प्रेम की भावना की अधिकता के कारण इकलौता बेटा भेजा। संसार में आत्मा केवल मनुष्यों में है। सभी मनुष्य एडम और ईव की संतान है। ईव के कहने पर एडम ने काम – भाव को बढ़ाकर स्त्री पुरुष मिलन का ज्ञान रहस्य देने वाला फल खा लिया था। गॉड इससे नाराज हो गए कि तुमने यह ज्ञान का फल क्यों खाया ? ज्ञान का फल चखना मूल पाप है। नर – नारी के मिलने के सुख का रहस्य जानना मूल पाप है। अत: गॉड ने एडम और ईव को शाप दिया कि तुम धरती पर जाओ। तब से संसार का प्रत्येक मनुष्य जनम से पापी है। जब वह गॉड के इकलौते बेटे जीसस की शरण में आकर चर्च की सेवा में जीवन लगाने का संकल्प लेता है, तभी वह पवित्र हो पाता है। दुनिया में चर्च का साम्राज्य फैलाने के लिए अपना समय, धन, जीवन लगाना ही पाप से मुक्ति का मार्ग है। जो चर्च के लिए जीवन समर्पित करता है, वही प्रकाश से भरा है। शेष सब लोग अधंकार ग्रस्त है। जो जीसस को गॉड का इकलौता बेटा नहीं मानता है, जो चर्च की सेवा में अपना धन और जीवन नहीं लगता है, वह जन्म से प्राप्त मूल पाप को ढोता रहता है। अत: वह पापी है, अंधकारग्रस्त है, पैगन है। पैगनवाद पाप है, अंधकार है।


देखा जाए तो मुसलमान जिन्हें काफिर कहते हैं, ईसाई उन्हें ही पैगन कहते हैं। पन्द्रहवीं शताब्दी ईस्वी तक इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल, हालैंड आदि में पैगनों की बहुलता थी। पैगन शब्द सबसे पहले प्राचीन भवनों के लिए ईसाइयों ने इस्तेमाल किया। पैगन लोग स्वयं को भारतीय सम्राट ऐल का वंशज मानते हैं और स्वयं को हेला कहते हैं। आज भी ग्रीस का अधिकृत नाम हेला गणराज्य (हेलेनिक रिपब्लिक) है। हेला या हेले की परिभाषा है – ऐसा व्यक्ति जो समस्त श्रेष्ठ साहित्य का अध्येता हो, उसे हेला कहते हैं। ईसाईयों ने उन्हें ही पैगन कहा, क्योंकि वे मानते थे कि जो केवल बाइबिल पढें, अन्य न पढे, वहीं श्रेष्ठ हैं। इसीलिए सभी प्राचीन पुस्तकालय उन्होंने जला दिए – यह कहकर कि इनमें पैगन साहित्य है जो हेरेसी (विधर्म) है। इस प्रकार प्राचीन श्रेष्ठ साहित्य का अध्येता ही पैगन है, क्योंकि वह बाइबिल को ज्ञान की एकमात्र पुस्तक नहीं मानता।

पैगनों का व्यापक संहार ईसाई पारदियों और अनुयायी लोगों द्वारा यूरोप में किया गया है। कई जगह दबाव में घिरकर लाखों पैगन ईसाई बन गये। कुछ हजार यहूदी भी ईसाई बन गये। मजबूरी में ईसाई बने सम्पन्न यहूदियों ने इटली में प्राचीन चित्रकला की आड़ में  रेनेसां (प्राचीन का पुनर्जन्म) अभियान चलाया। शीघ्र ही वह रेनेसां फ्रांस, जर्मनी होता हुआ ब्रिटेन तक पहुंच गया।

यह पैगनों का पुनर्जन्म था। चर्च के विशाल आतंक तले पिस रहे पैगनों ने रात दिन परिश्रम एवं तप कर वैज्ञानिक खोजें कीं, वैचारिक नवोन्मेष किये, कलात्मक ऊंचाइयां हासिल कीं। इटली के रेनेसां का संरक्षक व प्रेरक एक पुराना व धनी यहूदी व्यक्ति था। फ्रांस, जर्मनी में भी यही हुआ। तब ईसाई पादरियों ने पूरे यूरोप में यहूदियों के विरूद्ध प्रचण्ड घृणा फैलायी और उन्हें जिन्दा चलाने या मार डालने की प्रेरणा दी। जो पैगन स्त्रियां परम्परागत जडी बूटियों तथा चिकित्सा की जानकार थीं या पूजा पाठ, हवन की जानकार थीं उन्हें डायन  प्रचारित कर ईसाई पादरियों ने भीड के नेतृत्व में लाखों की संख्या में यातनाएं दीं – जिन्दा जलाया, खौलते तेल की कड़ाही में डूबोकर मार डाला या पत्थरों की बौछार कर मार डाला क्योंकि चर्च चाहता था कि पादरियों को ही डॉक्टर माना जाये। भले ही उसे तब तक डॉक्टरी आती नहीं थी। ऐसे नीम- हकीम डॉक्टर पादरियों से लोग इलाज कराने से डरते थे और पैगन चिकित्सक स्त्रियों का सहारा लेते थे। इसलिए ऐसी सभी स्त्रियों को डायन बताकर मार डाला गया।

पैगनों के मंदिरों को ईसाइयों ने नष्ट कर डाला। इटली में चौथी शती ईसवी में सैंकडों पैगनों की हत्या की गयी। यह कार्य मकदूनिया में किया गया। फरवरी 391 में पैगनों की अपनी पद्धति से पूजा करने पर इटली व मकदूनिया में रोक लगा दी गई, क्योंकि वे लोग सूर्य, गुरू, शुक्र, इन्द्र, मित्र, वरूण, दुर्गा आदि  देवी देवताओं की पूजा करते थे। पैगनों के उत्सव प्रतिबंधित कर दिए गए। उनके मेल ठेलों पर रोक लगा दी गयी। यज्ञ, हवन, पवित्र ग्रंथों का पाठ सब प्रतिबंधित कर दिया गया। सिकन्दरिया का विशाल पुस्तकालय अप्रैल 392 ईसवी में जला डाला गया। वहां कई दिनों तक आग जलती रही। उसी महीने सिकन्दरिया में पैगनों का जो एक भव्य विशाल मंदिर था, पादरी थिऑफिलुस के नेतृत्व में ईसाइयों ने उसे जलाकर नष्ट कर दिया। देव प्रतिमा को तोड डाला।

इसके बाद पैगन मंदिरों को तोडने लूटने, नष्ट करने का क्रम पूरी ग्रीस एवं मकदूनिया में चल पडा। पैगन देवताओं को ईविल स्पिरिट यानी दुष्टात्माएं प्रचारित कर मंदिर नष्ट किए गए। ईसाई पैगन परिवारों के घरों में घुसकर जबरन तलाशी लेते और देव प्रतिमाएं मिलने पर पूरा घर लूट कर उजाड देते। भयंकर तबाही मचाई गयी। ग्रीस और मकदूनिया में मशालें जलाकर ओलम्पिक खेल कई दिन खेले जाते थे। ईसाइयों ने उसे पैगन उत्सव कहकर 393 ईसवी में उस पर प्रतिबंध लगा दिया। अब बीसवीं शताब्दी में वे पुन: शुरू किये गये हैं ये प्राचीन उत्सव वहां ईसा पूर्व 1000 से चल रहे थे, जिन्हें चौथी शती में जबरन रूकवा दिया गया।

अंतहीन यातनाएं एवं यंत्रणाएं सहते हुए पैगनों ने वैज्ञानिक वैचारिक तथा कलात्मक आविष्कारों के द्वारा यूरोप में चर्चतंत्र की धज्जियां उडा दीं। आज यूरोप के प्रत्येक देश में आस्थावान ईसाइयों की स ंख्या कहीं 20 प्रतिशत कहीं 40 प्रतिशत कहीं 50 55 प्रतिशत है जो लोग आस्थावान ईसाई बिलीविंग क्रिश्चियन नहीं है, उन्हें चर्च और पादरी लोग एथीइस्ट कहते हैं, जिन्हें अज्ञानवश भारत में नास्तिक कहा जाता है। वस्तुत: भारतीय पदावली में उन सभी पादरियों बिलीविंग क्रिश्चियन तथा एकदेववादी ईमान वालों को ही नास्तिक कहा जाएगा, जो सर्वत्र परमेश्वर का प्रकाश नहीं मानते तथा परमेश्वर को सर्वव्यापी नहीं मानते। यूरोपीय चर्च जिन्हें एथीइस्ट कहता है, वे सर्वव्यापी चेतना की सत्ता में श्रद्धा रखने वाले विवेकवान प्राणी है। भारतीय पदावली में उन्हें सच्चा धर्मनिष्ठ कहा जाएगा।

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वे ईश्वर को मानते हैं। किसी एकमात्र साम्प्रदायिक आराध्यदेव को नहीं मानते। आज यूरोप में करोडों की संख्या में विवेकवान नर नारी ईसाइयत के पहले को यूरोपीय उपासना पद्धतियों एवं चेतना की परम्परा को जानना समझना चाहते हैं। ऐसे लोग चेतना के नवोन्मेष का जो अभियान चला रहे हैं उसे ही वहां पैगन मूवमेंट कहा जाता है। बिलीविंग क्रिश्चियन इन पैगनों को आज भी प्रताड़ित करते हैं। उन्हें विश्वविद्यालयों में नौकरियों नहीं करने देते हैं, उन्हें प्रतिष्ठा एवं अवसरों से दूर रखते हैं। पैगनों ने भयंकर उत्पीड़न सहकर अपनी चेतना सुरक्षित रखी। भारत उन्हें वीरता, विवेक, सूझ बूझ तेजस्विता, आत्मरक्षा एवं आत्मगौरव का मार्ग दिखा सकता है। यह कार्य तो धर्म एवं प्रज्ञा के विनम्र साधक ही कर सकते हैं।

पैगनों का संरक्षण श्रेष्ठ भारतीयों का कर्तव्य है। 16वीं से 20वीं शती ईस्वी में पैगनों के प्रभाव से रेनेसां फैला और ईसाइयत यूरोप में सिकुड़ती चली गई। इसीलिए वे लोग एशिया और अफ्रीका में ईसायत के फैलाव की चेष्टाएं कर रहे हैं। जहां भी ज्ञान है, विज्ञान है, अध्यात्म है, सांस्कृतिक चेतना है, वहां ईसाई लोग केवल अंधविश्वास देखते हैं तथा पैगन प्रज्ञा, वैज्ञानिक चेतना एवं उच्चतर कलात्मकता तथा सौन्दर्य के उपायक बन जाते हैं। विज्ञान पैगनों का मित्र है। ईसाइयों की विज्ञान से लड़ाई है। विज्ञान के प्रकार के साथ पैगनवाद विश्व में पुन: प्रबल हो रहा है।

 


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Title: what is a pagan and what do they believe in Hindi  | In Category: खासखबर khaskhabar

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